भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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४२ भाषार्थसहिता-

वर्णबाह्येनसंस्पृष्ट उच्छिष्टस्तुद्विजोत्तमः ॥ २३४ ॥
पंचरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
शुचिगोतृप्तिकृत्तोयं प्रकृतिस्थंमहीगतम् ॥ २३५ ॥
चर्मभाण्डंतुधाराभिस्तथायंत्रोद्ध तंजलम् ।
चाण्डालेनतुसंस्पृष्टः स्नानमेवविधीयते ॥ २३६ ॥
उच्छिष्टस्तुचसंस्पृष्ट स्त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ।
आकराद्गतवस्तूनि नाशुचीनिकदाचन ॥ २३७ ॥
आकराःशुचयःसर्वे वर्जयित्वासुरालयम् ।
भ्रष्टाभ्रष्टयवांश्चैव तथैवचणकाःस्मृताः ॥ २३८ ॥
खर्जूरं चैवकपूर मन्यद्भ्रष्टतरंशुचिः ।
अमीमांस्यानिशौचानि स्त्रीभिराचरितानिच ॥२३९॥
गोकुलेकंदुशालायां तैलयंत्रेक्षुयंत्रयोः ।
अदुष्टाःसंततधारा वातोद्धू ताश्चरेजवः ॥ २४० ॥

उच्छिष्ट ब्राह्मण को वर्णबाह्य (यवन आदि) नीच स्पर्श करलें ॥ २३४ ॥ तो पांच दिन तक उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है जिस जल से गोतृप्तहो सके ऐसा पृथ्वी पर टिका निर्मल जल शुद्ध है ॥२३५॥ चाम के पात्र का जल, निरन्तरधारा पड़ने से, और यंत्र से निकाला जल शुद्ध हैं- चाण्डाल के छू लेने पर स्नान मात्र करै ॥ २३६ ॥ जो उच्छिष्ट को चांडाल छूले तो तीन दिन में शुद्ध होता है । किसी खान से निकली वस्तु कभी भी अशुद्ध नहीं होती ॥ २३७ ॥ मदिरा के स्थान को छोड़ कर अन्य सब खाने वा कारखाने शुद्ध हैं और भुने जौ और चने भी शुद्ध कहे हैं ॥ २३८ ॥ खजूर और कपूर ये दोनों और जो २ भुना पदार्थ हो वह सब शुद्ध है । स्त्रियों ने आचरण किये शौच विचारने योग्य नहीं हैं ॥ २३९ ॥ गौओं के झुण्ड में कंदुशाला (भाड़) में तेल और ईख के कोल्हू में शुद्धि का विचार नहीं भाड़ आदि का भुना अन्नादि सदा शुद्ध मानो-निरन्तर पड़ती हुई जल धारा जो दूषित न हो और वायु से उड़ी रेणु (धूल) ये भी पवित्र हैं ॥ २४० ॥