भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 695, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 695

भाषार्थसहिता ॥ ७

तम्मन्येतपितरंमातरंच तस्मै न द्रुह्येत्कतमञ्चनाह ॥ १५ ॥
अध्यापितायेगुरुंनाऽऽद्रियन्ते विप्रावाचामनसाकर्मणावा ।
यथैवतेनगुरोर्भोजनीयास्तथैवतान्नभुनक्तिश्रुतंतत् ॥१६॥
यमेवविद्याःशुचिमप्रमत्तं मेधाविनंब्रह्मचर्योपपन्नम् ।
यस्तेनद्रुह्येत्कतमञ्चनाह तस्मैमांब्रूयानिधिपायब्रह्मन्! ॥१७॥
दहत्याग्नैर्यथाकक्षं ब्रह्मपृष्ठमनादृतम् ।
नब्रह्मतस्मैप्रब्रूयाच्छवयंमानमकुर्वते । इति॥ १८ ॥
षट् कर्माणि ब्राह्मणस्य ॥१९॥ अध्ययनमध्यापनं यजनं-
याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेति ॥२०॥ त्रीणि राजन्यस्य ॥२१॥ अ-
ध्ययनं यजनं दानं च शस्त्रेण च प्रजापालनं स्वधर्मस्तेन
जीवेत् ॥२२॥ एतान्येव त्रीणि वैश्यस्य, कृषिवार्णिज्यं पाशुपा-
ल्यं कुसीदं च ॥ २३ ॥


कान भर देता तथा शिष्य के मानस वाचिक कायिक दोषों को नष्ट कर देता है। उस को पिता माता माने उस से कभी द्रोह न करे। क्योंकि उस ने वेद के साथ क्या उत्तम शिक्षा नहीं कही ? अर्थात् सभी कुछ कह दिया है ॥१५॥ जो पढ़ाये हुए ब्राह्मण शिष्य मन वाणी तथा शरीर से गुरु का आदर नहीं करते वे जैसे गुरु की रक्षा करने योग्य नहीं होते वैसे ही पढ़ा हुआ वेद शास्त्र भी उन की रक्षा नहीं करता है ॥ १६ ॥ हे ब्राह्मण ! जिस को तुम शुद्ध, अप्रमादी, ब्रह्मचर्य से युक्त और बुद्धिमान् जानो और जो तुम से कदापि द्रोह वा विरोध न करे हे ब्रह्मन् उसी विद्या कोश के रक्षक शिष्य के लिये मेरा कथन करो ॥ १७ ॥ जैसे अग्नि घास को जला देता वैसे गुरु का अनादर करने वाले के पृष्ठ को तथा अध्यापक को भी वेद भस्म करता है। इस से यथाशक्ति सम्मान न करने वाले शिष्य को वेद नहीं पढ़ाना चाहिये ॥१८॥ ब्राह्मण के छः कर्म धर्मानुकूल हैं ॥ १९ ॥ वेद का पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञादि कर्म करना, कराना, दान देना, लेना ॥ २० ॥ तीन कर्म क्षत्रिय के हैं ॥ २१ ॥ वेद का पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, और शस्त्रों के द्वारा प्रजा की रक्षा करना क्षत्रिय का निज ( खास ) धर्म है उससे ही अपनी जीविका करे ॥२२ ॥ ये ही वेदाध्ययनादि तीन कर्म वैश्य के धर्मसंचयार्थ हैं और खेती, वाणिज्य, पशुरक्षा, और सूद लेना ये वैश्य के निज कर्म हैं ॥ २३ ॥