अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 696, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८ वसिष्ठस्मृतिः ॥
एतेषां परिचर्या शूद्रस्य ॥ २४ ॥ अनियता वृत्तिः ॥ २५ ॥ अनियतकेशवेशाः सर्वेषां मुक्तशिखावर्जम् ॥२६॥ अजीवन्तः स्वधर्मेणानन्तरां पापीयसीं वृत्तिमातिष्ठेरन् ॥२७॥ न तु कदा- चिज्ज्यायसीम् ॥२८॥ वैश्यजीविकामास्थाय पण्येन जीवन्तो- ऽश्मलवणमणिशाणकौशेयक्षौमाजिनानि च तान्तवं रक्तं सर्वं च कृतान्नं पुष्पमूलफलानि च गन्धरसा उदकं चौषधीनां रसः सोमश्च शस्त्रं विषं मांसं च क्षीरं च सविकारमयस्त्रपु जतु सीसं च ॥२९॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३० ॥ सद्यः पततिमांसेन लाक्षयालवणेन च । त्र्यहेणशूद्रोभवति ब्राह्मणःक्षीरविक्रयात् । इति ॥३१॥ ग्राम्यपशूनामेकशफाः केशिनश्च सर्वे चारण्याः पशवो वयांसि
ब्राह्मणादि द्विजों की सेवा करना शूद्र का कर्म है ॥ २४ ॥ शूद्र की जीविका नियत नहीं है कि यही करे ॥ २५ ॥ केशों के रखने का नियम सभी वर्णों का नहीं है कि कौन कितने केश रक्खे । परन्तु शिखा सब रक्खें । और शूद्र की शिखा खुली रहा करे ॥ २६ ॥ अपने धर्म से जीविका न होसकती हो तो अपने २ से नीचे वर्ण की वह जीविका सब ब्राह्मणादि करें जिस में अधिक पाप न होवे ॥ २७ ॥ परन्तु नीचे २ वर्ण अपने से ऊंचे २ वर्ण की जीविका कदापि न करें ॥ २८ ॥ यदि ब्राह्मणादि आपत्काल में वैश्य वृत्ति का सहारा लेकर दुकान से जीविका करें तो पत्थर, लवण, मणि ( मूगादि, ) शण-रेशम-अलसी के वस्त्र, मृगादि के चर्म, रंगे हुये सूत के वस्त्र, सब प्रकार का पकाया अन्न, फल, पुष्प, मूल, गन्ध (केशरादि, ) रस, ( खटाई आदि, ) जल, ओषधियों के रस, यज्ञादि में सोमलता, शस्त्र, विष ( संखिया हरतालादि,) मांस, दूध, दही, खोयादि, लोहा, रांगा, जस्ता, शीशा, इन सब को ब्राह्मण न बेंचे ॥ २९ ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि-॥ ३० ॥ मांस, लाख, और लवण बेंचने से ब्राह्मण शीघ्र ही पतित हो जाता और दूध या दूध के विकार दही आदि को बेंचने से तीन दिन में पतित होजाता है ॥ ३१॥ गांव के पशुओं में जुड़े खुरों वाले (एकशफ) भेड़ आदि केशों वाले पशु और सब वन के पशु सब पक्षी, बड़ी डाढ़ों वाले