अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 697, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥
दंष्ट्रिणश्च ॥३२॥ धान्यानां तिलानाहुः ॥३३॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥३४॥ भोजनाभ्यञ्जनाद्दानाद् यदन्यत्कुरुतेतिलैः । कृमीभूतः श्वविष्ठायां पितृभिःसहमज्जति । इति ॥३५॥ कामं वा स्वयं कृष्योत्पाद्य तिलान्विक्रीणीरन् ॥३६॥ तस्मात्साण्डाभ्यां सनस्योताभ्यां प्राक्प्रातराशात्कर्मी स्यात् ॥३७ ॥ निदाघेडपः प्रयच्छेत् ॥३८॥ नातिपीडयंल्लाङ्गलं प्रवीरवत्सुशेवं सोमपित्सरु । तदुद्वपति गामविं चाजानश्वातरश्वतरखरोष्ट्रांश्च प्रफव्यं च पीवरीं प्रस्थावद्रथवाहनमिति ॥३९॥ लाङ्गलं प्रवीरवद्वीरवत्सु मनुष्यवदनडुद्वत्सुशेवं कल्याणनासिकं कल्याणीह्यस्य नासिका नासिकयोद्वर्पति दूरेऽपविद्ध्यति, सोमपित्सरु सोमो
कुत्तादि इन को भी ब्राह्मण न पाले न बेचे ॥ ३२ ॥ धान्यों में तिलों को न बेचे ॥३३॥ इस पर श्लोकका प्रमाण कहते हैं ॥३४॥ भोजन, उबटन और ब्राह्मण को वा श्राद्ध तर्पण होमादि में दान, इन तीन से भिन्न अन्य जो कुछ काम तिलों से जो कोई करता है वह मनुष्य कुत्ते की विष्ठा में कृमि होकर अपने पितरों के सहित डूबता है ॥ ३५ ॥ परन्तु किसान ब्राह्मण स्वयं अपने खेत में उत्पन्न किये तिलों को भले ही बेचा करे ॥ ३६ ॥ तिससे जिन को बधिया न किया गया हो ऐसे अण्ड क्रोशों वाले नाथे हुए बैलों द्वारा मध्यान्ह के भोजन से पहिले खेत को जोता करे ॥ ३७ ॥ ग्रीष्म ( गर्मी वा विशेष घाम ) के दिनों में बीच में भी बैलों को जल पियावे ॥ ३८ ॥ बैलों को अत्यन्त पीडित ( तंग ) न करे ( लाङ्गलं प्रवीर० ) इत्यादि वेद संहिता का मन्त्र है । शुक्ल यजुर्वेद सं० अ० १२ । मं० ७१ भी यही मन्त्र है । पर इसके पाठ से अन्तर है इससे अन्य किसी शाखा का यह मन्त्र यहां लिखा गया है । (रथवाहनम् ) तक मन्त्र का पाठ है ॥ ३९ ॥ उक्त मन्त्र का अर्थरूप ही ४० सूत्रस्थ ब्राह्मण श्रुति लिखी गयी है-यथा ( लाङ्गलम् ) हल ( प्रवीरवत् ) जिसको चलानेवाले मनुष्य और बैल प्रकृष्ट वीर रुष्ट पुष्ट हों ( सुशेवम् ) कल्याण करनेवाला नासिका स्थानी फाला जिसमें लगा है । इस हलकी नासिका (फाल) कल्याण सुख करनेवाली इसलिये है कि उस से अन्नोत्पत्ति द्वारा