अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषार्थसहिता ॥ ७
तम्मन्येतपितरंमातरंच तस्मै न द्रुह्येत्कतमञ्चनाह ॥ १५ ॥
अध्यापितायेगुरुंनाऽऽद्रियन्ते विप्रावाचामनसाकर्मणावा ।
यथैवतेनगुरोर्भोजनीयास्तथैवतान्नभुनक्तिश्रुतंतत् ॥१६॥
यमेवविद्याःशुचिमप्रमत्तं मेधाविनंब्रह्मचर्योपपन्नम् ।
यस्तेनद्रुह्येत्कतमञ्चनाह तस्मैमांब्रूयानिधिपायब्रह्मन्! ॥१७॥
दहत्याग्नैर्यथाकक्षं ब्रह्मपृष्ठमनादृतम् ।
नब्रह्मतस्मैप्रब्रूयाच्छवयंमानमकुर्वते । इति॥ १८ ॥
षट् कर्माणि ब्राह्मणस्य ॥१९॥ अध्ययनमध्यापनं यजनं-
याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेति ॥२०॥ त्रीणि राजन्यस्य ॥२१॥ अ-
ध्ययनं यजनं दानं च शस्त्रेण च प्रजापालनं स्वधर्मस्तेन
जीवेत् ॥२२॥ एतान्येव त्रीणि वैश्यस्य, कृषिवार्णिज्यं पाशुपा-
ल्यं कुसीदं च ॥ २३ ॥
कान भर देता तथा शिष्य के मानस वाचिक कायिक दोषों को नष्ट कर देता है। उस को पिता माता माने उस से कभी द्रोह न करे। क्योंकि उस ने वेद के साथ क्या उत्तम शिक्षा नहीं कही ? अर्थात् सभी कुछ कह दिया है ॥१५॥ जो पढ़ाये हुए ब्राह्मण शिष्य मन वाणी तथा शरीर से गुरु का आदर नहीं करते वे जैसे गुरु की रक्षा करने योग्य नहीं होते वैसे ही पढ़ा हुआ वेद शास्त्र भी उन की रक्षा नहीं करता है ॥ १६ ॥ हे ब्राह्मण ! जिस को तुम शुद्ध, अप्रमादी, ब्रह्मचर्य से युक्त और बुद्धिमान् जानो और जो तुम से कदापि द्रोह वा विरोध न करे हे ब्रह्मन् उसी विद्या कोश के रक्षक शिष्य के लिये मेरा कथन करो ॥ १७ ॥ जैसे अग्नि घास को जला देता वैसे गुरु का अनादर करने वाले के पृष्ठ को तथा अध्यापक को भी वेद भस्म करता है। इस से यथाशक्ति सम्मान न करने वाले शिष्य को वेद नहीं पढ़ाना चाहिये ॥१८॥ ब्राह्मण के छः कर्म धर्मानुकूल हैं ॥ १९ ॥ वेद का पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञादि कर्म करना, कराना, दान देना, लेना ॥ २० ॥ तीन कर्म क्षत्रिय के हैं ॥ २१ ॥ वेद का पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, और शस्त्रों के द्वारा प्रजा की रक्षा करना क्षत्रिय का निज ( खास ) धर्म है उससे ही अपनी जीविका करे ॥२२ ॥ ये ही वेदाध्ययनादि तीन कर्म वैश्य के धर्मसंचयार्थ हैं और खेती, वाणिज्य, पशुरक्षा, और सूद लेना ये वैश्य के निज कर्म हैं ॥ २३ ॥
८ वसिष्ठस्मृतिः ॥
एतेषां परिचर्या शूद्रस्य ॥ २४ ॥ अनियता वृत्तिः ॥ २५ ॥ अनियतकेशवेशाः सर्वेषां मुक्तशिखावर्जम् ॥२६॥ अजीवन्तः स्वधर्मेणानन्तरां पापीयसीं वृत्तिमातिष्ठेरन् ॥२७॥ न तु कदा- चिज्ज्यायसीम् ॥२८॥ वैश्यजीविकामास्थाय पण्येन जीवन्तो- ऽश्मलवणमणिशाणकौशेयक्षौमाजिनानि च तान्तवं रक्तं सर्वं च कृतान्नं पुष्पमूलफलानि च गन्धरसा उदकं चौषधीनां रसः सोमश्च शस्त्रं विषं मांसं च क्षीरं च सविकारमयस्त्रपु जतु सीसं च ॥२९॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३० ॥ सद्यः पततिमांसेन लाक्षयालवणेन च । त्र्यहेणशूद्रोभवति ब्राह्मणःक्षीरविक्रयात् । इति ॥३१॥ ग्राम्यपशूनामेकशफाः केशिनश्च सर्वे चारण्याः पशवो वयांसि
ब्राह्मणादि द्विजों की सेवा करना शूद्र का कर्म है ॥ २४ ॥ शूद्र की जीविका नियत नहीं है कि यही करे ॥ २५ ॥ केशों के रखने का नियम सभी वर्णों का नहीं है कि कौन कितने केश रक्खे । परन्तु शिखा सब रक्खें । और शूद्र की शिखा खुली रहा करे ॥ २६ ॥ अपने धर्म से जीविका न होसकती हो तो अपने २ से नीचे वर्ण की वह जीविका सब ब्राह्मणादि करें जिस में अधिक पाप न होवे ॥ २७ ॥ परन्तु नीचे २ वर्ण अपने से ऊंचे २ वर्ण की जीविका कदापि न करें ॥ २८ ॥ यदि ब्राह्मणादि आपत्काल में वैश्य वृत्ति का सहारा लेकर दुकान से जीविका करें तो पत्थर, लवण, मणि ( मूगादि, ) शण-रेशम-अलसी के वस्त्र, मृगादि के चर्म, रंगे हुये सूत के वस्त्र, सब प्रकार का पकाया अन्न, फल, पुष्प, मूल, गन्ध (केशरादि, ) रस, ( खटाई आदि, ) जल, ओषधियों के रस, यज्ञादि में सोमलता, शस्त्र, विष ( संखिया हरतालादि,) मांस, दूध, दही, खोयादि, लोहा, रांगा, जस्ता, शीशा, इन सब को ब्राह्मण न बेंचे ॥ २९ ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि-॥ ३० ॥ मांस, लाख, और लवण बेंचने से ब्राह्मण शीघ्र ही पतित हो जाता और दूध या दूध के विकार दही आदि को बेंचने से तीन दिन में पतित होजाता है ॥ ३१॥ गांव के पशुओं में जुड़े खुरों वाले (एकशफ) भेड़ आदि केशों वाले पशु और सब वन के पशु सब पक्षी, बड़ी डाढ़ों वाले
भाषार्थसहिता ॥
दंष्ट्रिणश्च ॥३२॥ धान्यानां तिलानाहुः ॥३३॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥३४॥ भोजनाभ्यञ्जनाद्दानाद् यदन्यत्कुरुतेतिलैः । कृमीभूतः श्वविष्ठायां पितृभिःसहमज्जति । इति ॥३५॥ कामं वा स्वयं कृष्योत्पाद्य तिलान्विक्रीणीरन् ॥३६॥ तस्मात्साण्डाभ्यां सनस्योताभ्यां प्राक्प्रातराशात्कर्मी स्यात् ॥३७ ॥ निदाघेडपः प्रयच्छेत् ॥३८॥ नातिपीडयंल्लाङ्गलं प्रवीरवत्सुशेवं सोमपित्सरु । तदुद्वपति गामविं चाजानश्वातरश्वतरखरोष्ट्रांश्च प्रफव्यं च पीवरीं प्रस्थावद्रथवाहनमिति ॥३९॥ लाङ्गलं प्रवीरवद्वीरवत्सु मनुष्यवदनडुद्वत्सुशेवं कल्याणनासिकं कल्याणीह्यस्य नासिका नासिकयोद्वर्पति दूरेऽपविद्ध्यति, सोमपित्सरु सोमो
कुत्तादि इन को भी ब्राह्मण न पाले न बेचे ॥ ३२ ॥ धान्यों में तिलों को न बेचे ॥३३॥ इस पर श्लोकका प्रमाण कहते हैं ॥३४॥ भोजन, उबटन और ब्राह्मण को वा श्राद्ध तर्पण होमादि में दान, इन तीन से भिन्न अन्य जो कुछ काम तिलों से जो कोई करता है वह मनुष्य कुत्ते की विष्ठा में कृमि होकर अपने पितरों के सहित डूबता है ॥ ३५ ॥ परन्तु किसान ब्राह्मण स्वयं अपने खेत में उत्पन्न किये तिलों को भले ही बेचा करे ॥ ३६ ॥ तिससे जिन को बधिया न किया गया हो ऐसे अण्ड क्रोशों वाले नाथे हुए बैलों द्वारा मध्यान्ह के भोजन से पहिले खेत को जोता करे ॥ ३७ ॥ ग्रीष्म ( गर्मी वा विशेष घाम ) के दिनों में बीच में भी बैलों को जल पियावे ॥ ३८ ॥ बैलों को अत्यन्त पीडित ( तंग ) न करे ( लाङ्गलं प्रवीर० ) इत्यादि वेद संहिता का मन्त्र है । शुक्ल यजुर्वेद सं० अ० १२ । मं० ७१ भी यही मन्त्र है । पर इसके पाठ से अन्तर है इससे अन्य किसी शाखा का यह मन्त्र यहां लिखा गया है । (रथवाहनम् ) तक मन्त्र का पाठ है ॥ ३९ ॥ उक्त मन्त्र का अर्थरूप ही ४० सूत्रस्थ ब्राह्मण श्रुति लिखी गयी है-यथा ( लाङ्गलम् ) हल ( प्रवीरवत् ) जिसको चलानेवाले मनुष्य और बैल प्रकृष्ट वीर रुष्ट पुष्ट हों ( सुशेवम् ) कल्याण करनेवाला नासिका स्थानी फाला जिसमें लगा है । इस हलकी नासिका (फाल) कल्याण सुख करनेवाली इसलिये है कि उस से अन्नोत्पत्ति द्वारा
१० वसिष्ठस्मृतिः ॥
ह्यस्य प्राप्नोति, तत्तत्सरु तदुद्वपति गाञ्चाविंचाजा नश्वानश्व- तरखरोष्ट्रांश्च प्रफव्यं च पीवरीं दर्शनीयां कल्याणीं च प्रथमयु- वतीम् ॥४०॥ कथं हि लाङ्गलमुद्वपेदन्यत्र धान्यविक्रयात् ॥४१॥ रसा रसैर्महतो हीनतो वा निमातव्या नत्वेव लवणं रसैः॥४२॥ तिलतण्डुलपक्वान्नं विद्या मनुष्यांश्च विहिताः परिवर्तकेन ॥ ४३ ॥ ब्राह्मणराजन्यौ वार्धुष्यान्नं नाद्याताम् ॥ ४४ ॥ अ- थाप्युदाहरन्ति ॥ ४५ ॥ समर्घधान्यमुद्धृत्य महार्घयःप्रयच्छति । सवैवार्धुषिकोनाम ब्रह्मवादिषुगर्हितः ॥
मनुष्यों तथा पशुओं की जीवन रक्षा होती है यह हल उसी ना- सिका से ( उद्वपति ) पृथवी को खोदता भीतर से वेधन करता उखाड़ता है ( सोमपित्सरु ) सोमयागादि का अवसर भी यजमान को कृषि द्वारा अन्नादि की प्राप्ति से होता है। त्सरु नाम मुठिया ( पकड़ने का स्थान ) दबाने से वह ऊपर को महां उखाड़ता है। वह हल ( गामविमृ० ) गौ, भेड़, बकरी बकरा, घोड़ा, खच्चर, गधा, ऊंटो को ( प्रफर्येचपीवरीम् ) फुर्ती से चलनेवाली पुष्ट अंगों से युक्त मोटी २ प्रथम युवती (ओसर) गौ आदिको तथा ( प्रस्यावद्रथवाहनम् ) अच्छे दौड़नेवाले रथ नाम बग्घी के घोड़े आदि को प्राप्त कराता है ॥ ४० ॥ हलके द्वारा उत्पन्न किये धान्य को बेंचना अच्छा नहीं है ॥ ४१ ॥ अधिक वा कम रसों से रसों को बदला भले ही कर लेंवे । परन्तु किसी भी रस के बदले में लवण का लेन देन न करें ॥ ४२ ॥ तिल, चा- वल, पक्वान्न ( पूरी मिठाई आदि ) विद्या, और मनुष्यों का बदला भले ही कर लेवे । जैसे तिलों के बदले चावल वा चावलों के बदले तिल लेलेवे वा पक्वान्न देकर तिल चावल ले लेवे । किसी प्रकार की विद्या अन्य किसी को सि- खा देंवे उस के बदले अन्य किसी विद्या को सीख लेवे इत्यादि ॥ ४३ ॥ ब्रा- ह्मण, क्षत्रिय, दोनों सूद लेनेवाले का अन्न न खावें ॥४४॥ इस पर श्लोक प्र- माण कहते हैं कि-॥४५॥ जो किसानादि से सस्ता अन्न लेकर फिर उसको महंगा करके देता है वह वार्धुषिक (सूदखोर) कहाता और वह वेदमतावलम्बियों में निन्दित है। सूद लेनेवाला और ब्रह्महत्यारा इन दोनों को तराजू में तौला गया तो ब्रह्म हत्यारा हल्का होने से उठ गया और वार्धुषिक पाप से
भाषार्थसहिता ॥ ११
वार्धुषिंब्रह्महन्तारं तुलयासमतोलयन् ।
अतिष्ठद्भूणहाकोट्यां वार्धुषिर्नव्यकम्पत ॥इति ॥४६॥
कामं वा परिलुप्तकृत्याय पापीयसे दद्याताम् ॥ ४७ ॥
द्विगुणं हिरण्यं त्रिगुणं धान्यम् ॥४८॥ धान्येनैवरसा व्याख्या-
ताः ॥ ४९ ॥ पुष्पमूलफलानि च ॥ ५० ॥ तुलाधृतमष्टगुणम्
॥ ५१ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ५२ ॥
राजानुमतभावेन द्रव्यवृद्धिंविनाशयेत् ।
पुनराजाभिषेकेण द्रव्यवृद्धिंचवर्जयेत् ॥ ५३ ॥
द्विकंत्रिकंचतुष्कंच पञ्चकंचशतंस्मृतम् ।
मासस्यवृद्धिंगृह्णीयाद्वर्णानामनुपूर्वशः ॥५४॥
वसिष्ठवचनप्रोक्तां वृद्धिंवार्धुषिकेशृणु ।
पञ्चमाषास्तुविंशत्या एवंधर्मोनहायते । इति ॥५५॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
भारी होने के कारण हिला भी नहीं । जो अन्य के सुख दुख का कुछ विचार न करके अतिलोभ में ग्रस्त होकर अन्याय से तिगुना चौगुना तक लेता है उसी की यहां निन्दा जानो ) ॥ ४६ ॥ और जो पुरुष धर्म कर्म से हीन पापी हो उसको भले ही ब्राह्मण क्षत्रिय भी वृद्धि (सूट) के लिये धन देवें ॥४७॥ परन्तु सुवर्ण चांदी रुपया पैसा चाहें जितने दिनों वा वर्षों में मिलें दूने से अधिक न लेवें और तिगुना तक अन्न लेवें ॥ ४८ ॥ रसों को भी तिगुने तक ही लेवें ॥ ४९ ॥ पुष्प, मूल, फल भी तिगुने तक ही लेवें ॥ ५० ॥ परन्तु तौलकर दिया घी बहुत काल में आवे तो अष्टगुणा लेवे ॥ ५१ ॥ इसमें श्लोक प्रमाण कहते हैं ॥ ५२ ॥ राजा बहुत भद्र पुरुषों की अनुमतभाव से द्रव्य के सूद को गरीबों पर सर्वथा त्याग देवे । और फिर राजा अभिषेकोत्सव के साथभी धन की वृद्धि ( सूद ) को खैरात में छोड़ देवे ॥ ५३ ॥ ब्राह्मण प्रति सैंकड़ा २) ३) ४) ५) रु० माहना प्रतिमास ब्राह्मणादि वर्णों से क्रमशः सूद ले सकता है । यह मत किन्हीं आचार्यों का है ॥ ५४ ॥ परन्तु वार्धुषिक के लिये महर्षि वसिष्ठ ने जितनी वृद्धि ( सूद ) लेनी कही है सो सुनो कि प्रतिमास प्रत्येक बीशीपर पांच माशे सूद लिया जाय तो धर्म की हानि इस में नहीं है ॥ ५५ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में द्वितीयाध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
२
१२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
अश्रोत्रिया अननुवाक्या अनग्नयो वा शूद्रधर्माणो भवन्ति ॥ १ ॥ मानवं चात्र श्लोकमुदाहरन्ति ॥ २॥
योऽनधीत्यद्विजोवेदमन्यत्रकुरुतेश्रमम् ।
सजीवन्नेवशूद्रत्वमाशुगच्छतिसान्वयः ॥ ३ ॥
नानुग्ब्राह्मणोभवति नवाणिङ्नकुशीलवः ।
नशूद्रप्रेषणंकुर्वन्नस्तेनोनचिकित्सकः ॥ ४ ॥
अव्रताह्यनधीयाना यत्रभैक्षचराद्विजाः ।
तंग्रामंदण्डयेद्राजा चौरभक्तप्रदोहिसः ॥ ५ ॥
चत्वारोऽपित्रयोवापि यद्ब्रूयुर्वेदपारगाः ।
सधर्मइतिविज्ञेयो नेतरेषांसहस्रशः ॥ ६ ॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् ।
जिन ब्राह्मणों ने न पूरा वेद पढ़ा, न उसका अनुवाकादि कुछ भाग पढ़ा और न अग्निस्थापन करके अग्निहोत्र किया वे शूद्रों के तुल्य धर्मों वाले हो जाते हैं ॥१॥ इस पर मनु जी का श्लोक उदाहरण में कहते हैं ॥ २ ॥ जो द्विज मुख्य वेद को न पढ़के अन्य ग्रन्थों में वा अन्य कामों में श्रम करता है। वह अपने जीवित ही कुटुम्ब (स्त्री पुत्रादि) सहित शूद्रवत् हो जाता है ॥३॥ वेद को न पढ़ने जानने, वणिग् व्यापार करने, राजा रईसादि की मिथ्या प्रशंसा करने, (राय भाट आदि के काम करनेवाले) शूद्र रईसों की नौकरी करने, चोरी करने और चिकित्साद्वारा जीविका करनेवाले (ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने पर भी) ब्राह्मण नहीं रहते वा पतितों के तुल्य नीच हो जाते हैं ॥४॥ जिनके सन्ध्यादि कर्म का नियम नहीं और न वेदादि शास्त्र पढ़ते हैं किन्तु ब्राह्मण नाम से भिक्षा मांगकर खाते हैं ऐसे ब्राह्मण जिस गांव में बसते हों वह गांव चोरों को भाग देनेवाला है ऐसा मानकर राजा उस ग्राम को दण्ड देवे ॥ ५ ॥ वेद के तत्त्वज्ञानी चार या तीन भी विद्वान् ब्राह्मण धर्मांश में जो कहें उसको ही धर्म जाने किन्तु अन्य हज़ारों मूर्ख भी मिलकर जिसे अच्छा कहें वह धर्म नहीं है ॥ ६ ॥ वेदादि विद्या (गुणों) और सन्ध्यादि कर्मों से हीन, ब्राह्मणजाति में होनेमात्र से जीविका करनेवाले सहस्रों
भाषार्थसहिता ॥ १३
सहस्रशःसमेतानां परिषत्त्वंनविद्यते ॥ ७ ॥
यंवदन्तितमोमूढा मूर्खाधर्ममतद्विदः ।
तत्पापंशतधाभूत्वा तद्वक्तॄनधिगच्छति ॥ ८ ॥
श्रोत्रियायैवदेयानि हव्यकव्यानिनित्यशः ।
अश्रोत्रियायदत्तंहि पितॄर्न्नातिनदेवताः ॥ ९ ॥
यस्यचैवगृहेमूर्खो दूरेंचैवबहुश्रुतः ।
बहुश्रुतायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ॥ १० ॥
ब्राह्मणातिक्रमोनास्ति मूर्खेवेदविवर्जिते ।
ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य नहिभस्मनिहूयते ॥ ११ ॥
यश्चकाष्ठमयो हस्ती यश्चचर्ममयोमृगः ।
यश्चविप्रोऽनधीयानस्त्रयस्तेनामधारकाः ॥ १२ ॥
विद्वद्भोज्यान्यविद्वांसो येषुराष्ट्रेषुभुञ्जते ।
तान्यनावृष्टिमुच्छन्ति महद्वाजायतेभयम् । इति ॥१३॥
इकट्ठे होने पर भी वह सभा नहीं हो सकती ॥७॥ अज्ञानान्धकार में ग्रस्तधर्म का मर्म न जानने वाले मूर्ख ब्राह्मण जिस धर्म का निर्णय कर कहते हैं वह सैकड़ों प्रकार का पाप होकर उन धर्म वक्ता मूर्खों को प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ देवता और पितरों सम्बन्धी भोजनादि दान नित्यशः सदैव वेदपाठी ब्राह्मणों को ही देना चाहिये । क्योंकि वेदपाठी से भिन्न ब्राह्मणों को दिया भोजनादि पितरों और देवों को प्राप्त नहीं होता ॥ ९ ॥ जिस के घर में वा अति समीप मूर्ख ब्राह्मण वसता हो और बड़ा विद्वान् दूर वसता हो तो विद्वान् को देना चाहिये क्योंकि मूर्ख का उल्लङ्घन वा अपमान नहीं माना जायगा ॥ १० ॥ वेद वेदाङ्गादि न पढ़े मूर्ख ब्राह्मण का उल्लंघन ब्राह्मण के उल्लंघन में नहीं गिना जायगा । क्योंकि जलते हुए अग्नि को छोड़के भस्म में होम नहीं किया जाता है ॥११॥ जो काष्ठ का हाथी जो चाम का हरिण और जो मूर्खब्राह्मण वे तीनों नाम ही मात्र हाथी आदि हैं असल में नहीं हैं ॥ १२ ॥ जिन राज्यों में विद्वानों को भोजन कराने योग्य उत्तम पदार्थों को अविद्वान् मूर्ख लोग भोगते हैं उनमें सूखा पड़ती दुर्भिक्ष होते वा भयंङ्कर दुर्घटना उपस्थित होती हैं॥१३॥
१४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
अप्रज्ञायमानं वित्तं योऽधिगच्छे द्राजा तद्धरेदधिगन्त्रे षष्ठमंशं प्रदाय ॥ १४ ॥ ब्राह्मणश्चेदधिगच्छेत् षट्कर्मसु वर्त्तमानो न राजा हरेत् ॥ १५ ॥ आततायिनं हत्वा नात्र प्राणच्छेत्तुः किंचित्किल्विषमाहुः ॥ १६ ॥ षड्विधास्तत्वाततायिनः ॥१७॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १८ ॥ अग्निदोगरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः । क्षेत्रदारहरश्चैव षडेतेआततायिनः ॥ १९ ॥ आततायिनमायान्तमपिवेदन्तपारगम् । जिघांसन्तं जिघांसीयान्नतेन ब्रह्महाभवेत् ॥ २० ॥ स्वाध्यायिनंकुलेजातं योहन्यादाततायिनम् । नतेनभ्रूणहासस्यान्मन्युस्तंमन्युमृच्छति । इति ॥२१॥
कहीं अज्ञात गड़ा हुआ धन जिस को मिले उस को उस धन का छठा भाग देकर शेष को राजा ले लेवे ॥ १४ ॥ यदि वेदादि को पढ़ने पढ़ाने आदि अपने छः कर्मों में तत्पर ब्राह्मण को अज्ञात धन मिले तो राजा को कुछ नहीं लेना चाहिये ॥ १५ ॥ आततायी को मार डालने पर मारनेवाले को हत्या का कुछ भी पाप नहीं लगता ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥ १६ ॥ छः प्रकार के मनुष्य आततायी होते हैं ॥ १७ ॥ इस पर श्लोक प्रमाण कहते हैं ॥ १८ ॥ १-आग लगाने वाला, २-विष देने वाला, ३-हाथ में शस्त्र लेके मारने को जो आता हो, ४-धन का नाश करने वा छीनने लूटने वाला, ५-खेतका सर्वथा नाश करने वाला और ६-किसी की स्त्री को बलात्कार हरने वा जबरदस्ती से स्त्री का धर्म बिगाड़ने वाला ये छः आततायी कहाते हैं ॥ १९ ॥ आततायी हो कर यदि वेद वेदान्त का पूर्ण विद्वान् ब्राह्मण भी आता हो तो अपने को मार डालना चाहते हुए उस आततायी को बिना विचारे ही मार डाले क्योंकि ऐसी दशा में ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगेगा ॥२०॥ वेदपाठी कुलीन ब्राह्मण आततायी को जो मारडाले तो उस से मारने वाला ब्रह्महत्यारा नहीं होता क्योंकि वहां क्रोध का क्रोध से युद्ध माना जाता है ॥ २१ ॥
भाषार्थसहिता ॥ १५
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णवांश्चतुर्मेधा वाजसनेयी षडङ्गविद्ब्रह्मदेयानुसंतानश्छन्दोगो ज्येष्ठसामगो मन्त्रब्राह्मणविद्यः स्वधर्मानधीते यस्य दशपुरुषं मातृपितृवंशः श्रोत्रियो विज्ञायते विद्वांसः स्नातकाश्चैते पङ्क्तिपावना भवन्ति२२ चातुर्विद्योविकल्पीच अङ्गविद्धर्मपाठकः । आश्रमस्थास्त्रयोमुख्याः परिषत्स्याद्दशावरा ॥ २३ ॥ उपनीय तु यः कृत्स्नं वेदमध्यापयेत्सआचार्यः ॥ २४ ॥ यस्त्वेकदेशं स उपाध्यायो यश्च वेदाङ्गानि ॥२५॥ आत्मत्राणे वर्णसंकरे वा ब्राह्मणवैश्यौ शस्त्रमाददीयाताम् ॥२६॥ क्षत्रियस्य
यजुर्वेद को पढ़ने जानने और उस के नियम व्रतों को करने वाला त्रिणाचिकेत, पञ्चाग्नि-श्रौतस्मार्त्त अग्निहोत्र करने वाला, ऋग्वेद के होतृ कर्म को पढ़ने जानने और तदुक्त नियम व्रतों को करने वाला-त्रिसुपर्णवान्, चारो वेद में जिस की बुद्धि चलती हो, वाजसनेयी संहिता को पढ़ने जानने वाला, वेद के छः अङ्गों का विद्वान्, ब्राह्म विवाह से उत्पन्न, सामवेदी, सामवेद के आरण्यक भाग का विद्वान्-ज्येष्ठसामग, मन्त्र ब्राह्मण दोनों वेदभागों का ज्ञाता, जो अपने वर्ण तथा आश्रम के धर्मों को विशेष कर पढ़ता जानता हो, जिस के माता पिता के वंश में दश पीढ़ी से वेद के पढ़ने की परम्परा चली आयी हो, ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थ बने विद्वान्, ये त्रिणाचिकेतादि ब्राह्मण पङ्क्तिपावन कहाते हैं (जिस पांति में बैठते हैं उसे पवित्र कर देते हैं) ॥ २२ ॥ चारो वेद के पढ़ने जानने वाले चार विद्वान्, नैयायिक, वेदाङ्गों का पढ़ने जानने वाला, मीमांसा वा धर्मशास्त्रों का पढ़ने जानने वाला, अपने २ आश्रम के धर्म को यथावत् सेवन करने वाले ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, ये तीनों मुख्याश्रमी इन दश पुरुषों की दशावरा धर्मसभा कहाती है ॥२३॥ जो यज्ञोपवीत संस्कार करा के पूर्ण वेद को पढ़ावे वह आचार्य कहाता है ॥२४॥ जो वेद के किसी भाग को और व्याकरणादि अङ्गों को पढ़ावे वह उपाध्याय कहाता है ॥ २५ ॥ अपनी रक्षा के लिये वा जब राजादि के अत्याचार से वर्णसंकरता का प्रचार बढ़ता हो तो ऐसे अवसरों में ब्राह्मण तथा वैश्यों को हथियार हाथ में लेना चाहिये ॥ २६ ॥ और प्रजा की रक्षा का भार
| १६ | वसिष्ठस्मृतिः ॥ |
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तु तन्नित्यमेव रक्षणाधिकारात् ॥ २७ ॥ प्राङ्गोदङ्ग्वाऽऽसीनः प्रक्षाल्य पादौ पाणी चाऽऽमणिबन्धनात् ॥२८॥ अङ्गुष्ठमूलस्योत्तरतो रेखा ब्राह्मं तीर्थं तेन त्रिराचामेदशब्दवद् द्विःपरिमृज्यात् ॥२९॥ खान्यद्भिः संस्पृशेत् ॥३०॥ मूर्द्धन्यपो निनयेत् ॥ ३१ ॥ सव्ये च पाणौ व्रजंस्तिष्ठञ्शयानः प्रणतो वा नाऽऽचामेत् ॥३२॥ हृदयङ्गमाभिरद्भिर्बुद्बुदाभिरफेनाभिर्ब्राह्मणः कण्ठगाभिः क्षत्रियः शुचिः ॥३३॥ वैश्योद्भिः प्राशिताभिस्तु स्त्रीशूद्रौ स्पृष्टाभिरेवच ॥३४॥ पुत्रदारादयोऽपि गोस्तर्पणाः स्युः ॥ ३५ ॥ न वर्णगन्धरसदुष्टाभिर्याश्च स्युरशुभागमाः ॥३६॥ न मुख्या विप्रुष उच्छिष्टं कुर्वन्त्यनङ्गे श्लिष्टाः ॥३७॥ सुप्त्वा भुक्त्वा पीत्वा क्षुत्वा रुदित्वा स्नात्वा चाऽऽचान्तः
का अधिकार होने से क्षत्रिय पुरुषों को तो सदा नित्य ही शस्त्र अपने साथ रखने चाहिये ॥ २७ ॥ दोनों पगों और मणि बन्धस्थान ( पहुंचों ) तक दोनों हाथों को धोकर पूर्व वा उत्तर को मुख कर बैठा हुआ ॥ २८ ॥ अंगुष्ठ के मूल के उत्तर भाग में ब्राह्मतीर्थ कहाता है उस ब्राह्मतीर्थ से तीन बार ऐसे आचमन करे जिस में शब्द न हो फिर दोवार जल से मुख को शुद्ध करे ॥ २९ ॥ मुख, नासिका, चक्षु और श्रोत्ररूप छिद्रों का जल हाथ में लगाके स्पर्श करे ॥३०॥ फिर मस्तक पर जल छिड़के ॥ ३१ ॥ चलता, खड़ा, लेटा, वा तिर्छा झुका हुआ और वाम हाथ से आचमन न करे ॥ ३२ ॥ फेन जिस में न हो ऐसे हृदय तक पहुंचने वाले जल के आचमन से ब्राह्मण तथा कण्ठ तक पहुंचने वाले जल के आचमन से क्षत्रिय शुद्ध होता है ॥३३॥ मुख के भीतर तक पहुंचने वाले जल से वैश्य और स्त्री तथा शूद्र ओष्ठों में जल के स्पर्श मात्र आचमन से शुद्ध होते हैं ॥३४॥ स्त्री पुत्रादि भी आचमन तथा इन्द्रिय स्पर्शादि द्वारा इन्द्रियाभिमानी देवताओं को तृप्त करने वाले हों ॥ ३५ ॥ रूप रस तथा गन्ध जिस का बिगड़ा हो वा जो अपवित्र मार्ग से प्राप्त हो ऐसे जल से आचमनादि न करे ॥ ३६ ॥ यदि अंग पर न पड़े तो मुख से झरने वाली थूक की छींटे मनुष्य को उच्छिष्ट वा अशुद्ध नहीं करती हैं ॥३७॥ सोना, खाना, पीना, छींकना, रोना, और स्नान करना
भाषाधर्मसंहिता ॥ १९
पुनराचामेत् ॥३८॥ वासश्च परिधायौष्ठौ च संस्पृश्य यत्राला मकौ न श्मश्रुगतो लेपः ॥३९॥ दन्तवद्दन्तसक्तेषु यच्चान्तर्मुखेभवेत् । आचान्तस्यावशिष्टंस्यान्निगिरन्नेवतच्छुचिः ॥ ४० ॥ परानथाऽऽचामयतः पादौयाविप्रुषोगताः । भूम्यास्तास्तुसमाःप्रोक्तास्ताभिर्नोच्छिष्टभाग् भवेत् ॥४१॥ प्रचरन्नभ्यवहार्य्यपूच्छिष्टंयदिसंस्पृशेत् । भूमौ निक्षिष्यतद्द्रव्यमाचान्तःप्रचरेत्पुनः ॥४२॥ यद्यन्मीमांस्यं स्यात्तत्तदद्भिः संस्पृशेत् ॥ ४३ ॥ श्वहताश्चमृगावन्याः पतितंचखगैःफलम् । बालैरनुपरिक्रान्तं स्त्रीभिराचरितंचयत् ॥ ४४ ॥ प्रसारितंचयत्पण्यं येदोषाःस्त्रीमुखेषुच ।
इन कामों को करके पहिले किया हो तो भी फिर से आचमन करे ॥३८॥ वस्त्र धारण कर, ( बदल के ) तथा जहां बाल नहीं जमते वहां ओठों का स्पर्श करके भी आचमन करे और मूंछों में लगी जूठन वा कफशुद्ध नहीं माना जायगा उस को धोकर भी आचमन करना चाहिये ॥ ३९ ॥ विधि पूर्वक आचमन कर लेने पर दांतों में वा मुख में कहीं खाये हुये शेष अन्नादि का अंश जान पड़े तो उस से वह मनुष्य उच्छिष्ट नहीं माना जायगा किन्तु निगलते ही शुद्ध हो जाता है ॥ ४० ॥ अन्य लोगों को जल पिलाते वा आचमन कराते समय पगों पर जो जल के छींटे पड़ जावें उन को पृथिवी की धूलि के समान कहा है उन से मनुष्य अशुद्ध नहीं होता है ॥४१॥ भोजन करने योग्य पकाये अन्नादि को ले जाते हुये यदि किसी उच्छिष्ट को छूलेवे तो उस भोज्य वस्तु को भूमि पर रख कर आचमन करके फिर लेजावे ॥ ४२ ॥ जिस २ वस्तु के अशुद्ध होने न होने में शंका हो जावे उस २ को शुद्ध जल से स्पर्श वा प्रक्षालन कर लेवे ॥ ४३ ॥ कुत्तों ने मारे वन के मृग, पक्षियों ने उच्छिष्ट करके वृक्षों से गिराये फल, हाथ आदि धोये बिना भी बालकों ने ग्रहण किये-पकड़े भोज्य वस्तु, स्त्रियों ने किये आचरण वा कोई काम, ॥ ४४ ॥ बेंचने के लिये दुकान पर नीच पुरुष ने भी फैलाये पदार्थ, स्त्रियों के मुख में जो दोष हैं, मक्खी तथा मच्छर नील का स्पर्श करके भी जिस भोज्य वस्तु पर बैठ गये
१८ वसिष्ठस्मृतिः ॥
मशकेर्मक्षिकामिश्च नीलीयेनोपहन्यते ॥ ४५ ॥
क्षितिस्थाश्चैवयाआपो गवां तृप्तिकराश्चयाः ।
परिसंख्यायतान्सर्व्वान् शुचीनाहप्रजापतिः । इति ॥ ४६॥
लेपगन्धापकर्षणे शौचममेध्यलिप्तस्याद्भिर्मृदा च ॥ ४७ ॥ तैजसमृन्मयदारवतान्तवानां भस्मपरिमार्जनप्रदा-
हतक्षणनिर्णेजनानि ॥ ४८ ॥ तैजसवदुपलमणीनां मणिव-
च्छङ्खशुक्तीनां दारुवदस्थ्नां रज्जुविदलचर्मणां चैलवच्छौ
चम् ॥ ४९ ॥ गोवालैः फलमयानां गौरसर्षपकल्केन क्षौम-
जानाम् ॥ ५० ॥ भूम्यास्तु संमार्जनप्रोक्षणोपलेपनोल्लेखनै-
र्यथास्थानं दोषविशेषात्प्रायत्यमुपैति ॥ ५१ ॥ अथाप्युदाह-
रन्ति ॥ ५२ ॥
खननाद्दहनाद्वर्षाद् गोभिराक्रमणादपि ।
और उनमें से कुछ खा भी लिया हो, ॥४५॥ शुद्ध एकान्त भूमि में ठहरा जल, और जिस को पीकर गौएं तृप्त हो सकें उतना थोड़ा भी शुद्ध जल, इन कुत्तों ने मारे मृगादि सब को गिन्ती करके प्रजापति नाम ब्रह्मा जी ने शुद्ध कहा है ॥४६॥ अशुद्ध हुए वस्तु की मही और जल से इतनी शुद्धि करे जिस से उस का लेप और दुर्गन्ध सर्वथा मिट जावे ॥ ४७ ॥ अशुद्ध हुये कांसे पीतल आदि तैजस पदार्थों की भस्म से मांज कर धोने से, मिट्टी के पात्रों को फिर से अग्नि में पकाने पर, काष्ठ के पात्रादि का अशुद्धांश छील डालने से, और सूत के वस्त्रादि की धोने से शुद्धि होती है ॥ ४८ ॥ पत्थर और मणि मूंगादि के पात्रादि की शुद्धि तैजस पात्रादि के तुल्य, मणि के तुल्य शंख तथा सीपी की शुद्धि, काष्ठ पात्रादि के तुल्य हाथी दांतादि के पात्रादि की शुद्धि, रस्सी, बेंत और चर्म पात्रादि की शुद्धि सूत के वस्त्रों के तुल्य कही है ॥ ४९ ॥ गौ के बालों से फल रूप पदार्थों की, श्वेत सरसों के औंटाये रस से अतसी के मुकुटादि वस्त्रों की शुद्धि होती है ॥ ५० ॥ झाडू से बुहारने, सींचने, लीपने और अशुद्धांश को खोद कर निकाल देने वा गोड़ देने से भूमि की शुद्धि होती है। अर्थात् जहां जैसा दोष भूमि में लगा हो वैसे ही एक वा कई झाडूने आदि उपायों से पृथिवी ठीक शुद्ध हो जाती है ॥ ५१ ॥ इस पर श्लोक कहते हैं ॥ ५२ ॥ खोदने, अग्नि जलाने, वर्ष ने वा सींचने, गौओं के धसने और पांचवें लीपने से
भाषार्थसहिता ॥ १९
चतुर्भिःशुध्यतेभूमिः पञ्चमाच्चोपलेपनात् । इति ॥५३॥
रजसाशुध्यतेनारी नदीवेगेनशुध्यति ।
भस्मनाशुध्यतेकांस्यं ताम्रमम्लेनशुध्यति ॥ ५४ ॥
मद्यैर्मूत्रैःपुरीषैर्वा श्लेष्मपूयाश्रुशोणितैः ।
संस्पृष्टंनैवशुध्येत पुनःपाकेनमृन्मयम् ॥ ५५ ॥
अद्भिर्गात्राणिशुध्यन्ति मनःसत्येनशुध्यति ।
विद्यातपोभ्यांभूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेनशुध्यति ॥ ५६ ॥
अद्भिरेव काञ्चनं पूयते तथा रजतम् ॥ ५७ ॥ अङ्गुलिक-
निष्ठिकामूले दैवं तीर्थम् ॥५८॥ अङ्गुल्यग्रे मानुषम् ॥ ५९ ॥
पाणिमध्यआग्नेयम् ॥ ६० ॥ प्रदेशिन्यङ्गुष्ठयोरन्तरा पित्र्य-
म् ॥ ६१ ॥ रोचन्तइति सायं प्रातरग्नीनभिपूजयेत् ॥ ६२ ॥ स्व-
दितमिति पित्र्येषु ॥ ६३ ॥ संपन्नमित्याभ्युदयिकेषु ॥ ६४ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अशुद्ध हुई भूमि शुद्ध होजाती है ॥ ५३ ॥ रजोधर्म होजाने पर स्त्री, प्रवाह के वेग से नदी, भस्म से मांजने पर कांसे के पात्र, और खटाई से तांबे के पात्र शुद्ध होजाते हैं ॥५४॥ मद्य, मल, मूत्र, थूक, पीव, और रुधिर ये सब वा कोई जिसमें रक्खे गये हों ऐसा मिट्टी का पात्र फिर से अग्नि में पकाने से भी शुद्ध नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥ शरीर के हाथ पांव आदि अङ्ग जल से, सत्यभाषण करने से मन, विद्याभ्यास और तप करने से सूक्ष्म शरीर वा जीवात्मा और तत्त्वज्ञान होने से बुद्धि शुद्ध होती है ॥ ५६ ॥ सुवर्ण और चांदी के पात्रादि केवल जल से धोने पर शुद्ध होजाते हैं ॥ ५७ ॥ छोटी अंगुलि के मूल में दैव-तीर्थ कहाता है ॥ ५८ ॥ अंगुलियों के अग्र भाग में मनुष्य तीर्थ है ॥ ५९ ॥ हथेली के बीच में आग्नेय तीर्थ है ॥ ६० ॥ प्रदेशिनी और अंगूठा के बीच में पितरों को जल देने का तीर्थ है ॥ ६१ ॥ ( रोचन्ते ) ऐसा कहकर सायं प्रातः काल गार्हपत्यादि अग्नियों का पूजन करे ॥ ६२ ॥ श्राद्धादि पितृ सम्बन्धी कामों में भोजन किये ब्राह्मणों से ( स्वदितम् ) ऐसा कहे ॥ ६३ ॥ आभ्युदयिक विवाहादि कामों में ( संपन्नम् ) ऐसा कहे ॥ ६४ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
३
२० वसिष्ठस्मृतिः ॥
प्रकृतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्यं संस्कारविशेषाच्च ॥ १ ॥ ब्राह्मणोऽस्यमुखमासीद्वाहूराजन्यःकृतः । ऊरूतदस्ययद्वैश्यः पद्भ्यांशूद्रोऽजायत, इति निगमो भवति ॥ २ ॥ गायत्र्या छन्दसा ब्राह्मणमसृजत त्रिष्टुभा राजन्यं जगत्या वैश्यं न केनचिच्छन्दसा शूद्रमित्यसंस्कार्यो विज्ञायते ॥ ३ ॥ सर्वेषां सत्यमक्रोधो दानमहिंसा प्रजननं च ॥ ४ ॥ (पितृदेवतातिथिपूजायां पशुं हिंस्यात् ॥ ५ ॥ मधुपर्के च यज्ञे च पितृदैवतकर्मणि । अत्रैव च पशुं हिंस्यान्नान्यथेत्यब्रवीन्मनुः ॥ ६ ॥ नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित् ।
स्वभाव से नाम जन्म से और गर्भाधानादि संस्कार विशेष से चारो वर्ण ब्राह्मणादि माने जाते हैं ॥ १ ॥ इस विराट् पुरुष के मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पगों से शूद्र उत्पन्न हुआ इस वेद के प्रमाण से उत्पत्ति से ही ब्राह्मणादि वर्ण सिद्ध हैं ॥ २ ॥ गायत्री सावित्री के साथ मुख से ब्राह्मण को, त्रिष्टुप् सावित्री के साथ भुजा से क्षत्रिय को, जगती सावित्री के साथ जंघा से वैश्य को और किसी छन्द के बिना ही पगों से शूद्र को विराट् पुरुष ने उत्पन्न किया इस से शूद्र संस्कार के योग्य नहीं है। और यह भी श्रुति से सिद्ध है कि ब्राह्मणादि का वह २ पृथक् २ स्वभाव सिद्ध भिन्न २ गुरु मन्त्र होना चाहिये ॥ ३ ॥ सत्यभाषण, क्रोध का त्याग, दान देना, हिंसा न करना और किसी को दुःख न देना तथा विवाह करके सन्तानों को उत्पन्न करना ये सत्यभाषणादि चारो वर्ण के सामान्य धर्म हैं ॥ ४ ॥ पितर देवता और अतिथियों की पूजा में शास्त्रोक्त विधि से पशु हिंसा करे (परन्तु यह कलियुग में लोक विक्रुष्टादि दोषहोने से वर्जित है) ॥ ५ ॥ मधुपर्क, यज्ञ, (अग्निष्टोमादि) अष्टका श्राद्धादि पितृ कर्म, और देव कर्म इन्हीं में पशु की हिंसा करे यह मनु जी ने कहा है ॥ ६ ॥ प्राणियों की हिंसा किये बिना कहीं भी मांस प्राप्त नहीं हो सकता और प्राणियों का वध
भाषार्थंसंहिता ॥ २१
नचप्राणिवधःस्वर्ग्यस्तस्माद्यागेवधोऽवधः ॥ ७ ॥
अथापि ब्राह्मणाय वा राजन्याय वाऽभ्यागताय वा महोक्षं वा महाजं वा पचेदेवमस्यातिथ्यं कुर्वन्तीति ॥ ८ ॥
उदकक्रियामशौचं च द्विवर्षात्प्रभृति मृत उभयं कुर्यात् ॥९॥
दन्तजननादित्येके ॥ १० ॥ शरीरमग्निना संयोज्याऽनवेक्षमाणा अपोऽभ्यवयन्ति ॥ ११ ॥ सव्योत्तराभ्यां पाणिभ्यामुदकक्रियां कुर्वन्ति ॥ १२ ॥ अयुग्मा दक्षिणामुखाः ॥ १३ ॥ पितॄणां वा एषा दिग् या दक्षिणा ॥ १४ ॥ गृहान्व्रजित्वा स्वस्तरे त्र्यहमनश्नन्त आसीरन् ॥१५॥ अशक्तौ क्रीतोत्पन्नेन वर्तेरन्, दशाहं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ॥ १६ ॥ मरणात्प्र-
करना दुःख का हेतु है। इस से यज्ञ में पशुओं का वध करना हिंसा नहीं है। और अन्यत्र जहां हिंसा अवश्य है वहां न मारे ॥७॥ और भी श्रुति में लिखा है कि आये हुए ब्राह्मण, वा क्षत्रिय-राजा, वा अतिथि के लिये बड़े बैल, वा बड़े बकरा को पकावे, ऐसे ही इस ब्राह्मणादि का अतिथि सत्कार करते हैं ॥८॥ दो वर्ष से ऊपर आयु वाले बालक के मरने पर अशुद्धि मानना और तिलांजलि देना दोनों काम करें ॥ ९ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि दांत निकलने बाद बालक के मरनेपर शुद्धि माने और तिलांजलि करे ॥ १० ॥ अन्त्येष्टि के समय चिता पर मुर्दा शरीर में अग्नि लगाकर पीछे को न देखते हुए लौटकर जलाशय में स्नान करें ॥ ११ ॥ बायां हाथ दहिने के ऊपर लगा के एक अंजुली जल सूतककेनाम सेजलाशय के तटपर अपसव्य होकर छोड़ें ॥१२॥ जल देते समय एक धोती मात्र वस्त्र हो अंगोछा कन्धे पर न हो और दक्षिण को मुख कर के जल देवें ॥ १३ ॥ यह दक्षिण दिशा पितरों की है ॥ १४ ॥ फिर घर पर जाकर चटाई वा पलाल के बिछौना पर दिन तथा रात में तीन दिन रात कुछ न खाते हुये बैठें किन्तु खटिया पर न बैठें न लेटें ॥१५॥ भोजन किये बिना न रह सकें तो किसी से मूल्यद्वारा खरीदकर खायें स्वयं घर का कोई न पकावे। सात पीढ़ी के मनुष्यों को दश दिन तक सूतक की अशुद्धि माननी कही है ॥ १६ ॥ मरने के समय से लेकर दिनों की गणना करें अर्थात् थोड़ी
२२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
भृति दिवसगणना सपिण्डता तु सप्तपुरुषं विज्ञायते ॥ १७ ॥ अप्रत्तानां स्त्रीणां त्रिपुरुषं त्रिदिनं विज्ञायते ॥१८॥ प्रत्तानामितरे कुर्वीरंस्तांश्च तेषां जननेप्येवमेव निपुणां शुद्धिमिच्छतां मातापित्रोर्बीजनिमित्तत्वात् ॥१९॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ २० ॥ नाशौचंसूतकेपुंसः संसर्गंचेन्नगच्छति । रजस्तत्राशुचिज्ञेयं तन्नपुंसिनविद्यते ॥ इति ॥ २१ ॥ तच्चेदन्तःपुनरापतेच्छेषेण शुध्येरन् ॥२२ ॥ रात्रिशेषे द्वाभ्यां प्रभाते तिसृभिः ॥ २३ ॥ ब्राह्मणोदशरात्रेण पक्षमात्रेणभूमिपः । विंशतिरात्रेणवैश्यः शूद्रोमासेनशुद्ध्यति ॥ २४ ॥ अत्राप्युदाहरन्ति ॥ २५ ॥ आशौचेशौद्रकेयस्तु सूतकेवापिभुक्तवान् ।
रात्रि शेष रहे मृत्यु हो तो पहिला दिन पूरा गिना जाय और सात पीढ़ी के मनुष्यों में सपिण्डता मानी जाती है ॥१७॥ बिना विवाही कन्याके मृत्यु में तीन पीढ़ी तक सपिण्डता और तीन दिन अशुद्धि माननी चाहिये ॥१८॥ विवाहित कन्याओं के मरण का मृतक पति के कुलवाले मानें । कन्या पुत्रों के जन्म होने पर भी इसी उक्त प्रकार अच्छी शुद्धि चाहते हुए सूतक शुद्धि करें क्योंकि माता पिता दोनों बीज के निमित्त हैं ॥ १९ ॥ इस पर श्लोक भी कहते हैं ॥ २० ॥
जन्म सूतक में पुरुष यदि मृतिका वा उसके पास जाने वालों से संपर्क न करे तो उनको अशुद्धि नहीं लगती क्योंकि मृतिका स्त्री की मलिनता ही वहां अपवित्रता है और वह पुरुष में नहीं है ॥२१॥ यह मरण सूतक वा जन्म सूतक एक के पूरे न होने से पहिले ही द्वितीय मरण वा जन्म होजाय तो पहिले की समाप्ति के साथ दोनों की शुद्धि कर लें ॥ २२ ॥ यदि पहिले सूतक की एक रात्रि शेष हो तो दो दिन और शुद्धि के दिन प्रातःकाल अन्य मरण जन्म हो तो तीन दिन का सूतक बढ़ा देवें ॥ २३ ॥ दश दिन में ब्राह्मण, पन्द्रह दिन में क्षत्रिय, बीश दिन में वैश्य और एक मास में शूद्र शुद्ध होता है ॥ २४ ॥ यहां भी श्लोक का उदाहरण कहते हैं ॥ २५ ॥
शूद्र के जन्म सूतक वा मरण सूतक में जिस न भोजन किया हो वह
द्वादश मासान्द्वादशार्द्धमासान्वाऽनश्नन्संहितामधीयानः
भाषार्थसहिता ॥ २३
सगच्छेन्नरकंघोरं तिर्यग्योनिषुजायते । इति ॥२६॥
अनिर्देशाहेपक्वान्नं नियोगाद्यस्तुभुक्तवान् ।
कृमिर्भूत्वासदेहान्ते तद्विष्टामुपजीवति ॥ २७ ॥
द्वादश मासान्द्वादशार्द्धमासान्वाऽनश्नन्संहितामधीयानः
पूतो भवतीति विज्ञायते ॥ २८ ॥ ऊनद्विवर्षे प्रेते गर्भपतने
वा सपिण्डानां त्रिरात्रमाशौचं, सद्यः शौचमिति गौतमः
॥ २९ ॥ देशान्तरस्थे प्रेते ऊर्ध्वं दशाहाच्छ्रुत्वैकरात्रमाशौ-
चम् ॥ ३० ॥ आहिताग्निश्चेत्प्रवसन्म्रियेत पुनः संस्कारं कृ-
त्वा शववच्छौचमिति गौतमः ॥ ३१ ॥ यूपचितिश्मशानर-
जस्वलासूतिकारशुचीनुपस्पृश्यसशिराअभ्युपेयादप इति॥३२॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अस्वतन्त्रा स्त्री पुरुषप्रधाना ॥ १ ॥ अनग्निरनुदक्या वा
घोर नरक भोगने पश्चात् तिर्यग्योनि में जन्म लेता है ॥ २६॥ ब्राह्मण के सूतक में दश दिन बीतने से पहिले जिसने निमन्त्रित होने से पक्वान्न खाया हो वह मरने पर कृमि होकर उस सूतकवाले की विष्ठा को भोगता है ॥ २७ ॥ वह मनुष्य बारह महिने वा छः महिने तक अन्न को छोड़के केवल दुग्धपान करता हुआ वेद की संहिता का पाठ करे तो पवित्र होजाता है ऐसा शास्त्र से जाना है ॥ २८ ॥ दो वर्ष से कम के बालक के मरने वा गर्भपात होने पर सपिण्डों की शुद्धि तीन दिन में होती है । पर गौतम का मत है कि तत्काल शुद्धि कर लेवें ॥ २९ ॥ देशान्तर में मृत्यु होने पर दश दिन के पश्चात् सुने तो एक दिन रात शुद्धिमाने ॥ ३० ॥ आहिताग्नि अग्निहोत्री पुरुष यदि विदेश में गया हुआ मरजावे तो उसकी हड्डियों का फिर से विधिपूर्वक दाह करके मुर्दा के तुल्य सूतक शुद्धि करे यह महर्षि गौतम कहते हैं ॥ ३१ ॥ यूप, चिता, श्मशान, रजस्वला, सूतिका, और अशुद्ध चाण्डालादि का स्पर्श करके शिर डुबोने सहित जल में डुबकी लगावे ॥ ॥३२ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
पुरुष नाम पति के आधीन रहने वाली स्त्री हो स्वतन्त्र न रहे ॥ १ ॥
स्त्री-अग्निस्थापन-अग्निहोत्र तथा जल देने में अनधिकारिणी और मिथ्या
२४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
अमृतमिति विज्ञायते ॥ २ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३ ॥
पितारक्षतिकौमारे भर्त्तारक्षतियौवने ।
पुत्राश्चस्थाविरेभावे नस्त्रीस्वातन्त्र्यमर्हति ॥ ४ ॥
तस्या भर्तुरभिचार उक्तः प्रायश्चित्तरहस्येषु ॥५॥ मासिमा-
सिरजोह्यासां दुष्कृतान्यपकर्षति ॥६॥ त्रिरात्रं रजस्वलाऽशुचि-
र्भवति, सा नाञ्ज्योन्नाभ्यञ्ज्यान्नाप्सु स्नायात्, अधःशयीत,
दिवा न स्वप्यात्, नाग्निं स्पृशेत्, न रज्जुं सृजेन्न दन्तान्धावयेन्न
मांसमश्नीयान्न ग्रहान्निरीक्षेत, न हसेन्न किंचिदाचरेत्, न ख-
र्वेण पात्रेण पिबेन्नाञ्जलिना वा पिबेत्, लोहितायसेन वा॥७॥
विज्ञायतेहीन्द्रस्त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रं हत्वा पाप्मना गृहीतो म-
हत्तमाधर्मसंबद्धोऽहमित्येवमात्मानममन्यत, तं सर्वाणि भूतान्य-
भ्याक्रोशन् भ्रूणहन्भ्रूणहन्भ्रूणहन्निति, स स्त्रिय उपाधावत्,
है ऐसा श्रुति से जाना जाता है ॥ २ ॥ और भी श्लोक प्रमाण कहते हैं ॥ ३ ॥
बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र लोग रक्षा
करें ऐसे तीनों अवस्था में स्त्री स्वतन्त्र रहने योग्य नहीं है ॥ ४ ॥ उस स्त्री
का पति से वियोग प्रायश्चित्त और रहस्य नाम एकान्त में रहने के व्रतों में
कहा है ॥ ५ ॥ प्रत्येक मास में निकलने वाला आस्रव रक्त स्त्रियों के पापों
को नष्ट करता रहता है ॥ ६ ॥ रजस्वला स्त्री तीन दिन तक अशुद्ध रहती है
वह आंखों में अञ्जन, तैल मर्दन और जल में स्नान न करे, पृथिवी पर लोटे
सोवे, दिन को न सोवे, अग्नि का स्पर्श न करे, रस्सी न बटे, दांतों को न
मांजे, मांस न खावे, ग्रह नक्षत्रों को न देखे, न हंसे, न कुछ काम करे, छोटे
पात्र से वा अञ्जलि से जलादि न पीवे, और लाल पात्र से वा लोहे के पात्र
से भी जलादि न पीवे ॥७ ॥ शास्त्र से जाना जाता है कि इन्द्रदेव तीन शिर
वाले त्वष्टा के पुत्र वृत्रासुर को मारके पाप ग्रस्त हो कर महान् अधर्म से
सम्बद्ध मैं हूं ऐसा अपने को मानते हुए। उन इन्द्र से सब प्राणियों ने चि-
ल्ला २ कर कहा कि तुम भ्रूणहा ३ हो ऐसा तीनवार कहा तब वे इन्द्रदेव
स्त्रियों के समीप गये और जाकर कहा कि इस मेरी ब्रह्महत्या का तृतीयांश
भाषार्थसंहिता ॥ २५
अस्यै मे ब्रह्महत्यायै तृतीयं भागंगृह्णीतेति गत्वैवमुवाच,ता अब्रुवन्, किन्नोऽभूदिति, सोऽब्रवीद्वरं वृणीध्वमिति, ता अब्रु- वन्नृतौ प्रजां विन्दामहाइति,काममाविजानितोः संभवामइति (यथेच्छयाऽऽप्रसवकालात्पुरुषेण सह मैथुनभावेन संभवामइति) एषोऽस्माकं वरस्तथेन्द्रेणोक्तास्ताः प्रतिजगृहुस्तृतीयं भ्रूणह- त्यायाः ॥ ८ ॥ सैषा भ्रूणहत्या मासिमास्याविर्भवति ॥ ९ ॥ तस्माद्रजस्वलान्नं नाश्नीयात् ॥ १० ॥ अतश्च भ्रूणहत्याया एतैषा रूपं प्रतिमुच्याऽऽस्ते कञ्चुकमिव ॥ ११ ॥ तदाहुर्ब्रह्म- वादिनः ॥ १२ ॥ अञ्जनाभ्यञ्जनमेवास्या न प्रतिग्राह्यं,तद्धि स्त्रियाअन्नमिति ॥ १३ ॥ तस्मात्तस्यास्तत्र न च मन्यन्ते ॥ १४ ॥ आचारायाश्च योषित इति सेयमुपयाति ॥ १५ ॥ उदक्यास्त्वासातेयेषां येचकेचिदनग्नयः ।
तुम लोग लेलो । तब स्त्रियों ने कहा कि तब हम को क्या फल मिलेगा ? । तब इन्द्रदेवता ने कहा कि वर मांगो । तब स्त्रियों ने कहा कि ऋतुकाल होने पर हमारे गर्भस्थिति द्वारा सन्तान हुआ करें और सन्तानोत्पत्ति होने से पहिले गर्भकाल में भी हम पतिका सहवास संयोग यथेच्छ कर सकें (अर्थात् इच्छा पूर्वक प्रसव काल पर्यन्त पति के साथ मैथुन भाव से संयोग करें रुकावट वा हानि न हो ) यही हम लोगों का वर है । जब इन्द्रदेव ने ऐसा वरदान स्त्रियों को दिया तब उनने इन्द्र की भ्रूणहत्या का तृतीयांश दोष ग्रहण किया ॥ ८ ॥ सो वही भ्रूणहत्या स्त्रियों के मासिक रजोधर्मरूप से प्रतिमास प्रकट होती है ॥ ९ ॥ तिस से रजस्वला स्त्री का अन्न वा उस का छुआ न खावे ॥ १० ॥ इस से यह स्त्री रजोधर्म की समाप्ति में भ्रूणहत्या के कलङ्क को सांप की केंचुली के समान त्याग के निर्मल शुद्ध होती है ॥ ११ ॥ सो ब्रह्मवादी सज्जन महर्षि लोग कहते हैं कि ॥१२॥ इस स्त्रीके अञ्जन और उबटन को पुरुष न लेवे क्योंकि वही स्त्री का अन्न वा भोजन है ॥१३॥ तिस से उस स्त्री का रजोधर्मकाल में मान्य नहीं करते ॥ १४ ॥ आचार वाली शुद्ध हुई स्त्री का मान्य करे तब वह समीप आती है ॥ १५ ॥ जिन घरों में कु-
२६ वसिष्ठस्मृतिः ॥
कुलंचाश्रोत्रियंयेषां सर्वेतेशूद्रधर्म्मिणः । इति ॥१६॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे पञ्चमोध्यायः ॥ ५ ॥
आचारःपरमोधर्मः सर्वेषामितिनिश्चयः ।
हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्यचेहचनश्यति ॥ १ ॥
नैनंतपांसिनब्रह्म नाग्निहोत्रंनदक्षिणाः ।
हीनाचारमितोभ्रष्टं तारयन्तिकथंचन ॥ २ ॥
आचारहीनंनपुनन्तिवेदा यद्यप्यधीताःसहषड्भिरङ्गैः ।
छन्दांस्येनंमृत्युकालेत्यजन्ति नीडंशकुन्ताइवजातपक्षाः ॥३॥
आचारहीनस्यतुब्राह्मणस्य वेदाःषडङ्गास्त्वखिलाःसयज्ञाः ।
कांप्रीतिमुत्पादयितुंसमर्था अन्धस्यदाराइवदर्शनीयाः ॥४॥
नैनंछन्दांसिवृजिनात्तारयन्ति मायाविनंमाययावर्त्तमानम्।
द्वेऽप्यक्षरेसम्यगधीयमाने पुनाति तद्ब्रह्मयथावदिष्टम् ॥५॥
मारी कन्या ऋतुमती होती हो, जिसने अग्निहोत्र नहीं लिया, और जिनके कुलमें कोई श्रोत्रिय न हो वे सब शूद्रधर्मी ब्राह्मण कहे वा मानेजाते हैं ॥१६॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
सब वर्गों के लिये आचार ही परमोत्तम धर्म है यह निश्चय जानो । जिसका अन्तःकरण निकृष्ट आचार से युक्त है वह इस लोक परलोक दोनों में नष्ट होता है ॥ १ ॥ तप करना, वेद पढ़ना, अग्निहोत्र लेना और दान दक्षिणा देना इत्यादि काम धर्म से भ्रष्ट आचार से हीन पुरुष को कदापि दुःख सागर से पार नहीं करते ॥ २ ॥ यदि कही वेदाङ्गों के सहित वेदों को पढ़ा हो तो भी वे वेद आचारहीन पुरुष को पवित्र नहीं करते । पढ़े हुए वेद मृत्यु के समय इसको ऐसे ही त्याग देते हैं कि जैसे पंख निकल आने पर पक्षियों के बच्चे घोंसलों को छोड़के उड़जाते हैं॥३॥ आचार हीन ब्राह्मण को पढ़े जाने हुए कही वेदाङ्ग, और यज्ञ विधि सहित जानेहुए चारों वेद क्या प्रीति वा प्रसन्नता कर सकते हैं ? अर्थात् कुछ नहीं । जैसे अन्धे को अपनी रूपवती पत्नी के रूप से कुछ भी प्रसन्नता वा आनन्द नहीं होता वैसे ही आचार हीन को वेदों से कुछ सुख नहीं मिलता ॥ ४ ॥ छल कपट के साथ बर्ताव करनेवाले मायावी पुरुष को पढ़े हुए वेद पाप से पार नहीं करते । परन्तु शुद्धाचारी पुरुष वेद के दो अक्षर भी सम्यक् श्रद्धा तथा शुद्धि से पढ़े तो वही उसको पवित्र कर देते हैं ॥ ५ ॥ दुराचारी पुरुषलोक में निन्दित, निरन्तर दुःखी'