अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 700, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
अश्रोत्रिया अननुवाक्या अनग्नयो वा शूद्रधर्माणो भवन्ति ॥ १ ॥ मानवं चात्र श्लोकमुदाहरन्ति ॥ २॥
योऽनधीत्यद्विजोवेदमन्यत्रकुरुतेश्रमम् ।
सजीवन्नेवशूद्रत्वमाशुगच्छतिसान्वयः ॥ ३ ॥
नानुग्ब्राह्मणोभवति नवाणिङ्नकुशीलवः ।
नशूद्रप्रेषणंकुर्वन्नस्तेनोनचिकित्सकः ॥ ४ ॥
अव्रताह्यनधीयाना यत्रभैक्षचराद्विजाः ।
तंग्रामंदण्डयेद्राजा चौरभक्तप्रदोहिसः ॥ ५ ॥
चत्वारोऽपित्रयोवापि यद्ब्रूयुर्वेदपारगाः ।
सधर्मइतिविज्ञेयो नेतरेषांसहस्रशः ॥ ६ ॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् ।
जिन ब्राह्मणों ने न पूरा वेद पढ़ा, न उसका अनुवाकादि कुछ भाग पढ़ा और न अग्निस्थापन करके अग्निहोत्र किया वे शूद्रों के तुल्य धर्मों वाले हो जाते हैं ॥१॥ इस पर मनु जी का श्लोक उदाहरण में कहते हैं ॥ २ ॥ जो द्विज मुख्य वेद को न पढ़के अन्य ग्रन्थों में वा अन्य कामों में श्रम करता है। वह अपने जीवित ही कुटुम्ब (स्त्री पुत्रादि) सहित शूद्रवत् हो जाता है ॥३॥ वेद को न पढ़ने जानने, वणिग् व्यापार करने, राजा रईसादि की मिथ्या प्रशंसा करने, (राय भाट आदि के काम करनेवाले) शूद्र रईसों की नौकरी करने, चोरी करने और चिकित्साद्वारा जीविका करनेवाले (ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने पर भी) ब्राह्मण नहीं रहते वा पतितों के तुल्य नीच हो जाते हैं ॥४॥ जिनके सन्ध्यादि कर्म का नियम नहीं और न वेदादि शास्त्र पढ़ते हैं किन्तु ब्राह्मण नाम से भिक्षा मांगकर खाते हैं ऐसे ब्राह्मण जिस गांव में बसते हों वह गांव चोरों को भाग देनेवाला है ऐसा मानकर राजा उस ग्राम को दण्ड देवे ॥ ५ ॥ वेद के तत्त्वज्ञानी चार या तीन भी विद्वान् ब्राह्मण धर्मांश में जो कहें उसको ही धर्म जाने किन्तु अन्य हज़ारों मूर्ख भी मिलकर जिसे अच्छा कहें वह धर्म नहीं है ॥ ६ ॥ वेदादि विद्या (गुणों) और सन्ध्यादि कर्मों से हीन, ब्राह्मणजाति में होनेमात्र से जीविका करनेवाले सहस्रों