भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ११

वार्धुषिंब्रह्महन्तारं तुलयासमतोलयन् ।
अतिष्ठद्भूणहाकोट्यां वार्धुषिर्नव्यकम्पत ॥इति ॥४६॥
कामं वा परिलुप्तकृत्याय पापीयसे दद्याताम् ॥ ४७ ॥
द्विगुणं हिरण्यं त्रिगुणं धान्यम् ॥४८॥ धान्येनैवरसा व्याख्या-
ताः ॥ ४९ ॥ पुष्पमूलफलानि च ॥ ५० ॥ तुलाधृतमष्टगुणम्
॥ ५१ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ५२ ॥
राजानुमतभावेन द्रव्यवृद्धिंविनाशयेत् ।
पुनराजाभिषेकेण द्रव्यवृद्धिंचवर्जयेत् ॥ ५३ ॥
द्विकंत्रिकंचतुष्कंच पञ्चकंचशतंस्मृतम् ।
मासस्यवृद्धिंगृह्णीयाद्वर्णानामनुपूर्वशः ॥५४॥
वसिष्ठवचनप्रोक्तां वृद्धिंवार्धुषिकेशृणु ।
पञ्चमाषास्तुविंशत्या एवंधर्मोनहायते । इति ॥५५॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


भारी होने के कारण हिला भी नहीं । जो अन्य के सुख दुख का कुछ विचार न करके अतिलोभ में ग्रस्त होकर अन्याय से तिगुना चौगुना तक लेता है उसी की यहां निन्दा जानो ) ॥ ४६ ॥ और जो पुरुष धर्म कर्म से हीन पापी हो उसको भले ही ब्राह्मण क्षत्रिय भी वृद्धि (सूट) के लिये धन देवें ॥४७॥ परन्तु सुवर्ण चांदी रुपया पैसा चाहें जितने दिनों वा वर्षों में मिलें दूने से अधिक न लेवें और तिगुना तक अन्न लेवें ॥ ४८ ॥ रसों को भी तिगुने तक ही लेवें ॥ ४९ ॥ पुष्प, मूल, फल भी तिगुने तक ही लेवें ॥ ५० ॥ परन्तु तौलकर दिया घी बहुत काल में आवे तो अष्टगुणा लेवे ॥ ५१ ॥ इसमें श्लोक प्रमाण कहते हैं ॥ ५२ ॥ राजा बहुत भद्र पुरुषों की अनुमतभाव से द्रव्य के सूद को गरीबों पर सर्वथा त्याग देवे । और फिर राजा अभिषेकोत्सव के साथभी धन की वृद्धि ( सूद ) को खैरात में छोड़ देवे ॥ ५३ ॥ ब्राह्मण प्रति सैंकड़ा २) ३) ४) ५) रु० माहना प्रतिमास ब्राह्मणादि वर्णों से क्रमशः सूद ले सकता है । यह मत किन्हीं आचार्यों का है ॥ ५४ ॥ परन्तु वार्धुषिक के लिये महर्षि वसिष्ठ ने जितनी वृद्धि ( सूद ) लेनी कही है सो सुनो कि प्रतिमास प्रत्येक बीशीपर पांच माशे सूद लिया जाय तो धर्म की हानि इस में नहीं है ॥ ५५ ॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में द्वितीयाध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥