अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 711, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ २३
सगच्छेन्नरकंघोरं तिर्यग्योनिषुजायते । इति ॥२६॥
अनिर्देशाहेपक्वान्नं नियोगाद्यस्तुभुक्तवान् ।
कृमिर्भूत्वासदेहान्ते तद्विष्टामुपजीवति ॥ २७ ॥
द्वादश मासान्द्वादशार्द्धमासान्वाऽनश्नन्संहितामधीयानः
पूतो भवतीति विज्ञायते ॥ २८ ॥ ऊनद्विवर्षे प्रेते गर्भपतने
वा सपिण्डानां त्रिरात्रमाशौचं, सद्यः शौचमिति गौतमः
॥ २९ ॥ देशान्तरस्थे प्रेते ऊर्ध्वं दशाहाच्छ्रुत्वैकरात्रमाशौ-
चम् ॥ ३० ॥ आहिताग्निश्चेत्प्रवसन्म्रियेत पुनः संस्कारं कृ-
त्वा शववच्छौचमिति गौतमः ॥ ३१ ॥ यूपचितिश्मशानर-
जस्वलासूतिकारशुचीनुपस्पृश्यसशिराअभ्युपेयादप इति॥३२॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अस्वतन्त्रा स्त्री पुरुषप्रधाना ॥ १ ॥ अनग्निरनुदक्या वा
घोर नरक भोगने पश्चात् तिर्यग्योनि में जन्म लेता है ॥ २६॥ ब्राह्मण के सूतक में दश दिन बीतने से पहिले जिसने निमन्त्रित होने से पक्वान्न खाया हो वह मरने पर कृमि होकर उस सूतकवाले की विष्ठा को भोगता है ॥ २७ ॥ वह मनुष्य बारह महिने वा छः महिने तक अन्न को छोड़के केवल दुग्धपान करता हुआ वेद की संहिता का पाठ करे तो पवित्र होजाता है ऐसा शास्त्र से जाना है ॥ २८ ॥ दो वर्ष से कम के बालक के मरने वा गर्भपात होने पर सपिण्डों की शुद्धि तीन दिन में होती है । पर गौतम का मत है कि तत्काल शुद्धि कर लेवें ॥ २९ ॥ देशान्तर में मृत्यु होने पर दश दिन के पश्चात् सुने तो एक दिन रात शुद्धिमाने ॥ ३० ॥ आहिताग्नि अग्निहोत्री पुरुष यदि विदेश में गया हुआ मरजावे तो उसकी हड्डियों का फिर से विधिपूर्वक दाह करके मुर्दा के तुल्य सूतक शुद्धि करे यह महर्षि गौतम कहते हैं ॥ ३१ ॥ यूप, चिता, श्मशान, रजस्वला, सूतिका, और अशुद्ध चाण्डालादि का स्पर्श करके शिर डुबोने सहित जल में डुबकी लगावे ॥ ॥३२ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
पुरुष नाम पति के आधीन रहने वाली स्त्री हो स्वतन्त्र न रहे ॥ १ ॥
स्त्री-अग्निस्थापन-अग्निहोत्र तथा जल देने में अनधिकारिणी और मिथ्या