अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 750, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें६० वसिष्ठस्मृतिः ॥
चरदार्वाघाटचटकैलातकहारीतखञ्जरीटग्राम्यकुक्कुटशुकसारिकाकोकिलक्रव्यादा ग्रामचारिणश्चाग्रामचारिणश्चेति ॥ ३७ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे चतुर्द्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
(शोणितशुक्रसंभवः पुरुषो मातापितृनिमित्तकः)॥ १ ॥ तस्य प्रदानविक्रयत्यागेषु मातापितरौ प्रभवतः ॥ २ ॥ नत्वेकं पुत्रं दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद्वा ॥ ३ ॥ सहि संतानाय पूर्वेषाम् ॥ ४ ॥ न स्त्री दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद्वाऽन्यत्रानुज्ञानाद्भर्तुः ॥ ५ ॥ पुत्रं प्रतिग्रहीष्यन् बन्धूनाहूय राजनि चावेद्य निवेशनस्य मध्ये व्याहृतिभिर्हुत्वा दूरेबान्धवं बन्धुसन्निकृष्टमेव प्रतिगृह्णीयात् ॥ ६ ॥ संदेहे चोत्पन्ने दूरेबान्धवं शूद्रमिव स्थापयेत् ॥ ७ ॥ विज्ञायते ह्येकेन बहूँस्त्रायत-
कठफारवा, चिड़िया, रैलातक, हारीत, खञ्जुराट, गांव का मुर्गा, तोता, मैना, कोइल, कच्चा मांस खाने वाले तथा गांव वा वन में रहने वाले ये उक्त सब पक्षी अभक्ष्य हैं ॥ ३७ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौदहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१४॥
माता पिताजिस के निमित्त कारण हैं ऐसे रजवीर्य से सन्तान का शरीर बना है ॥ १ ॥ उस सन्तान को किसी के लिये दे देने, बेंच देने और त्याग देने का अधिकार माता पिता को है (परन्तु सन्तान का बेंचना काम अच्छा नहीं किन्तु निन्दित पाप कर्म है । यह बात प्रसंगानुसार धर्म शास्त्रों में लिखी है ) ॥ २ ॥ किसी के एक ही पुत्र होतो उसे पिता किसी को दान करके न देवे और लेने वाला भी न लेवे ॥ ३ ॥ क्योंकि वही आगे पूर्वजों का कुल चलाने वाला होगा ॥ ४ ॥ पति की आज्ञा के बिना माता अपने सन्तान का दान किसी को न देवे और किसी के सन्तान का दान भी न लेवे ॥ ५ ॥ दत्रिम वा दत्तक पुत्र को लेना चाहता हुआ पुरुष राजा के दरबार में आवेदन पत्र ( दरखास्त ) देके, कुटुम्बियों को बुलाकर, घर के बीच कुण्ड में व्याहृतियों से होम करके, उन के कुटुम्बी दूर हों तो कुटुम्बियों के सामने ही उस पुत्र को स्वीकार करे ॥ ६ ॥ जिस के माता पितादि कुटुम्बी दूर देश में हों ऐसे पुत्र को ले लेने पर उस की शुद्ध उत्पत्ति में सन्देह हो जाय तो उसे शूद्र के तुल्य अपने घर में रक्खे ॥ ७ ॥ श्रुति से ज्ञा-