अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
प्रत्यापत्तिः ॥ १५॥ पूर्णाब्दात् प्रवृत्ताद्वा काञ्चनं पात्रं माहेयं वा पूरयित्वाऽऽपोहिष्ठेति मन्त्रेणाद्भिरभिषिञ्चति ॥ १६ ॥ स- र्व्वएवाभिषिक्तस्य प्रत्युद्धारः पुत्रजन्मना व्याख्यातो व्याख्यात इति ॥ १७ ॥ इति श्रीवासिष्ठे धर्मशास्त्रे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ अथ व्यवहाराः ॥ १॥ राजमन्त्री सदःकार्याणि कुर्य्यात् ॥ २ ॥ द्वयोर्विवदमानयोर्न पक्षान्तरं गच्छेत् ॥ ३ ॥ यथास- नमपराधो ह्यन्ते नापराधः ॥४॥ समः सर्व्वेषु भूतेषु यथासन- मपराधो ह्याद्यवर्णयोर्विद्यान्ततः ॥५॥ संपन्नं च रक्षदुराज- बालधनान्यप्राप्तव्यवहाराणां प्राप्तकाले तु तद्दद्यात् ॥६॥ लिखितंसाक्षिणोभुक्तिः प्रमाणंत्रिविधंस्मृतम् ।
गुरु आदि की प्रसन्नता से वा भय से निम्नलिखित जानो ॥ १५ ॥ वर्ष की समाप्ति के दिन से वा नये संवत्सर के आरम्भ से व्रत का प्रारम्भ करके सु- वर्ण के वा मट्टी के पात्र को जल से भर के उस से अपना अभिषेक (आपो- हिष्ठा०) मन्त्र पढ़ २ कुशों द्वारा तब तक करे ॥ १६ ॥ कि जब तक उस पात्र का सब जल अभिषेक में चुक जावे इसी से उस के पाप का उद्धार हो जाता है । जिस का व्याख्यान पुत्र जन्म के साथ किया गया जानो ॥ १७ ॥ यह श्रीवासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पन्द्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१५॥
अब व्यवहारों की व्यवस्था कहते हैं ॥ १ ॥ राजा का मन्त्री (दीवान) सभा के कार्य करे ॥ २ ॥ विवाद करने वाले मुद्दई मुद्दाले दोनों में से किसी एक के पक्ष की ओर न झुके ॥ ३॥ धनादि के लोभ से एक पक्ष में झुकना अ- पराध है । पक्षपात के त्याग में अपराध नहीं है ॥ ४ ॥ न्याय कर्त्ता सब प्रा- णियों पर समदृष्टि रक्खे एक का पक्ष करने में पाप लगता है। ब्राह्मण क्ष- त्रिय दोनों वर्षों के न्याय में विद्या पुस्तकों द्वारा विचार करे ॥ ५ ॥ छोटे राजाओं के न रहने पर व्यवहार की मर्यादा से अनभिज्ञ (नाबालिग) राज पुत्रों की धन सम्पत्तियों की रक्षा करता हुआ उन के समर्थ ( १८ वर्ष के ) हो जाने पर उन की सम्पत्ति सौंप देवे ॥ ६ ॥ समन्मुख का लेख होना, कोई