भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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६६ | वसिष्ठस्मृतिः ॥

विप्रस्यचार्थेह्यनृतंवदेयुः पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥३१॥ स्वजनस्यार्थेयदि वार्थहेतोः पक्षाश्रयेणैववदन्तिकार्य्यम् । तेशब्दवंशस्यकुलस्यपूर्व्वान् स्वर्गस्थितांस्तानपिपातयन्ति, अपिपातयन्ति । इति ॥ ३२ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

ऋणमस्मिन् सन्नयति अमृतत्वञ्चगच्छति । पितापुत्रस्यजातस्य पश्येच्चेज्जीवतोमुखम् ॥ १ ॥ (१) अनन्ताः पुत्रिणां लोका नापुत्रस्य लोकोऽस्तीति श्रूयते ॥ २ ॥ प्रजाः सन्त्वपुत्रिणइत्यभिशापः ॥ ३ ॥ प्रजाभिरग्नेऽमृतत्त्वमश्यामित्यपि निगमो भवति ॥ ४ ॥ पुत्रेणलोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते ।


हो वहां, और गौ ब्राह्मण की रक्षाके लिये इन पांच मौकों पर मनुष्य भले ही जानकर भी मिथ्या बोले क्योंकि ये पांचों मिथ्या भाषण पातकों में ऋषि लोगों ने नहीं कहे हैं ॥३१॥ जो लोग अपने स्त्री पुत्रादि के लिये, वा धनादि के लोभ से अथवा पक्षपात के हट से किसी काम को मिथ्या कहते हैं वे लोग वेद के अध्ययनादि जन्य पुण्य से स्वर्ग को प्राप्त हुये अपने पूर्व्वजों को भी स्वर्ग से गिरा देते अर्थात् नरक में पहुंचाते हैं ॥ ३२ ॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१६॥

पिता यदि उत्पन्न हुए अपने जीवित पुत्र का मुख देखलेवे तो परंपरा से चले देव ऋषि पितरों के तीन ऋण चुकाने का भार पिता से उतर के पुत्र पर आजाता और पिता मोक्ष का अधिकारी वा मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ १ ॥ पुत्र वालों को अनन्त स्वर्गलोक प्राप्त होते हैं । निर्बंशी के लिये स्वर्ग प्राप्त नहीं होता यह श्रुति में लिखा है ॥२॥ "तेरी सन्तति वा कुल पुत्र हीन हो" यह शाप श्रुति में लिखा है इससे भी सिद्ध है कि सन्तति के बिना उस के कुल की अधोगति शाप से हो जाती है ॥ ३ ॥ "हे अग्ने ! मैं प्रजा नाम सन्तानों के द्वारा मोक्षानन्द को भोगूं" यह भी वेद मन्त्र का प्रमाण है इस से भी पुत्रोत्पत्ति से मोक्ष होना सिद्ध है ॥ ४ ॥ पुत्र के उत्पन्न होने से स्वर्गादि लोकों को जीत लेता, पौत्र के उत्पन्न होने से अनन्त सुख भोगता और पुत्र का पौत्र अर्थात् प्रपौत्र (पन्ती) उत्पन्न हो जाने से आदित्य मण्डल