भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषार्थसंहिता ॥ ८५

यआत्मत्यागिनःकुर्यात्स्नेहात्प्रेतक्रियां द्विजः । सतप्तकृच्छ्रसहितं चरेच्चान्द्रायणव्रतम्,इति ॥१४॥ चान्द्रायणं परस्ताद्वक्ष्यामः ॥१५ ॥ आत्महननाध्यवसा- ये त्रिरात्रम् ॥ १६ ॥ जीवन्नात्मत्यागी कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरेत्,त्रिरात्रं ह्युपवसेन्नित्यं स्निग्धेन वाससा प्राणानात्म- नि चाऽऽयम्य त्रिः पठेद्घमर्पणमिति ॥ १७ ॥ अपि वैतेन कल्पेन गायत्रीं परिवर्त्तयेत् । अपित्राऽग्निमुपसमाधाय कू- ष्माण्डैर्जुहुया द्धृतम् ॥१८॥ यच्चान्यन्महापातकेभ्यः सर्वमे- तेन पूयत इत्यथाप्याचामेत् ॥१९॥ अग्निश्चमाममन्युश्चेति प्रातर्मनसापापं ध्यात्वोंपूर्वाः सत्यान्ता व्याहृतीर्जपेदघमर्षणं वा पठेत् ॥२०॥ मानुषास्थिस्निग्धं स्पृष्ट्वा त्रिरात्रमाशौच- मस्निग्धे त्वहोरात्रम् ॥ २१ ॥ शवानुगमने चैवम् ॥ २२ ॥


जो पुत्रादि द्विज पुरुष आत्महत्या करने वाले का स्नेह प्रीति मान के प्रेत कर्म करे वह तप्त कृच्छ्र सहित चान्द्रायण व्रत करे ॥ १४ ॥ चान्द्रायण व्रत आगे कहेंगे ॥ १५ ॥ आत्महत्या करने का निश्चय मात्र किया हो तो तीन दिन व्रत करे ॥१६॥ आत्महत्या के लिये विष खाकर वा फांसी आदि लगा कर भी किसी कारण मृत्यु न हो जीवित ही रहे तो बारह दिन कृच्छ्रव्रत करे पश्चात तीन दिन पृथक् उपवास करे, नित्य गीले वस्त्र पहन कर प्राणायाम करता हुआ तीन बार अघमर्षण सूक्त पढ़े ॥१७॥ अथवा उक्त पन्द्रह १५ दिन व्रत के समय गायत्री का निरन्तर जप करे । अथवा विधि पूर्वक अग्नि को सामने रख के प्रति दिन कूष्माण्ड मन्त्रों द्वारा घी से होम के ॥ १८ ॥ महापातकों से भिन्न जो कुछ अपराध किये हों वे सभी इस (१७। १८ सूत्रों में कहे १५ दिन के ) प्रायश्चित्त से दूर हो जाते हैं। निम्न रीति से प्रति दिन आचमन करे ॥ १९ ॥ मन से पाप का ध्यान करके ( अग्निश्चमा० ) मन्त्र से आचमन करे फिर ओं पूर्वक सात व्याहृतियों को अथवा अघमर्षण सूक्त को पढ़े ॥ २० ॥ मनुष्य की गीली हड्डी का स्पर्श करके तीन दिन अशुद्धि और सूखी हड्डी का स्पर्श करे तो एक दिन रात सूतक के तुल्य अशुद्धि मान कर रहे पीछे सूतक के तुल्य शुद्धि करे ॥ २१ ॥ मुर्दा के साथ मरघट तक जावे तो मुर्दा का स्पर्श करने पर तीन दिन तथा स्पर्श न करने पर एक दिन सूतक माने ॥ २२ ॥