अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 787, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९७
एतेनैव गर्हिताध्यापकयाजका व्याख्याताः, दक्षिणात्या- गाच्च पूता भवन्तीति विज्ञायते ॥ ३० ॥ एतेनैवाभिश- स्तो व्याख्यातः ॥ ३१ ॥ अथापरं भ्रूणहत्यायां द्वादशरात्रम- ब्भक्षो द्वादशरात्रमुपवसेत् ॥ ३२ ॥ ब्राह्मणमनृतेनाभिशंस्य पतनीयेनोपपतनीयेन वा मासम्बभक्षः शुद्धवतीरावर्तयेत् ॥ ३३ ॥ अश्वमेघाऽवभृथे वा गच्छेत् ॥ ३४ ॥ एतेनैव चा- ण्डालोव्यवायो व्याख्यातः ॥ ३५ ॥ अथापरः कृच्छ्रविधिः साधारणो व्यूढः ॥ ३६ ॥
अहःप्रातरहर्नक्तमहरेकमयाचितम् ।
अहःपराक्तंन्त्रैकमेवंचतुरहौपरी ॥ ३७ ॥
अनुग्रहार्थंविप्राणां मनुर्धर्मभृतांवरः ।
बालवृद्धातुरेष्वेवं शिशुकृच्छ्रमुवाचह ॥ ३८ ॥
अथ चान्द्रायणविधिः ॥ ३९ ॥
वेद पढ़ाने तथा यज्ञ कराने वालों को भी यही प्रायश्चित्त है। और नीचों से दक्षिणा का त्याग करें तो पवित्र हो जाते हैं ऐसा जाना गया है ॥ ३० ॥ इसी के तुल्य निन्दित का प्रायश्चित्त जानो ॥ ३१ ॥ और भ्रूण हत्या करने पर बारह दिन जल मात्र पी कर रहे तथा बारह दिन सर्वथा उपवास करे इस चौबीश दिन के व्रत से भी शुद्ध होता है ॥३२॥ ब्राह्मण की झूठी निन्दा करे तो महापातक वा उपपातक के तुल्य दोष लगता है उस के लिये एक मास तक जलमात्र पीकर व्रत करता हुआ शुद्धवती ( एतोन्विन्द्रं स्तवाम० । सामसं० उत्तरार्चिके प्र० १२ खं० ३ ) इत्यादि तीन ऋचाओं का वार २ जप करे ॥३३॥ अथवा अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान में विद्वानों की आज्ञा लेकर सम्मिलित हो ॥३४॥ इसी के तुल्य चाण्डाली स्त्री के साथ संग करने पर भी प्रायश्चित्त करे ॥३५॥ अब असमर्थ वृद्ध बालकादि के लिये कृच्छ्र व्रत का छोटा साधारण विधान दिखाते हैं ॥३६॥ एक दिन प्रातःकाल, एक दिन सायंकाल, और एक दिन अयाचित भोजन करे तथा एक दिन सर्वथा उपवास करे । ऐसे चार दिन का यह कृच्छ्र व्रत कहाता है इसी के अनुसार तप्त कृच्छ्र और अतिकृच्छ्र भी चार २ दिन के जानो ॥३७॥ धर्म को धारण कर ने वालों में श्रेष्ठ मनु जी ने बालक, वृद्ध, रोगी, और साधारण निर्बल ब्राह्मणों पर कृपा दृष्टि करके यह शिशु कृच्छ्र व्रत कहा है ॥ ३८ ॥ अब चान्द्रायण व्रत का विधान दिखाते हैं ॥३९॥