अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 788, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ वसिष्ठस्मृतिः ॥
मासस्यकृष्णपक्षादौ ग्रासानद्याच्चतुर्दश । ग्रासाऽपचयभोजीस्यात्पक्षशेषंसमापयेत् ॥ ४० ॥ एवंहिशुक्लपक्षादौ ग्रासमेकंतुभक्षयेत् । ग्रासोपचयभोजीस्यात्पक्षशेषंसमापयेत् ॥ ४१ ॥ अत्रैवगायेत्सामानि अपिवाव्याहृतीर्जपेत् । एषचान्द्रायणोमासः पवित्रमृषिसंस्तुतः ॥ ४२ ॥ अनादिष्टेषुसर्वेषु प्रायश्चित्तंविधीयतेविधीयत, इति ॥४३॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ अथातिकृच्छ्रः ॥ १ ॥ त्र्यहं प्रातस्तथासायमयाचितं पराकइति कृच्छ्रः ॥ २ ॥ यावत्सकृदाददीत तावदश्नीयात्पूर्ववत्सोऽतिकृच्छ्रः ॥ ३ ॥ अब्भक्षः स कृच्छ्रातिकृच्छ्रः ॥ ४ ॥
महीने के प्रारम्भ में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को चौदह ग्रास खावे फिर द्वितीयादि तिथियों में एक २ ग्रास घटाता जावे । अमावास्या को निराहार उपवास करे ॥४०॥ इसी प्रकार शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को एक ग्रास खावे फिर द्वितीयादि तिथियों में एक २ ग्रास बढ़ाता जाय पौर्णमासी को १५ ग्रास खाकर व्रत समाप्त करे ॥ ४१ ॥ चन्द्रमा की कलाओं के घटने बढ़ने के साथ ग्रासों को घटाना बढ़ाना कहा है । इस व्रत में सामवेद का गान अथवा व्याहृतियों का जप अवश्य करे । यह चान्द्रायण महीने भर का व्रत ऋषियों ने पवित्र कहा है ॥४२॥ जिन पापों का कोई प्रायश्चित्त न कहा हो उन सब में चान्द्रायण का ही विधान जानो ॥ ४३ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेईशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२३॥
अब अतिकृच्छ्र व्रत का विधान दिखाते हैं ॥ १ ॥ तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल, तीन दिन बिन मांगे जो मिले सो खावे और अन्त में तीन दिन उपवास करे यह तो १२ दिन का पूर्वोक्त कृच्छ्र व्रत कहाता है ॥ २ ॥ इसी क्रम से नौ दिन तक जितना अन्न एक बार में मुख में आसके उतना ही खावे अन्त में तीन दिन उपवास करे वह बारह दिन का अतिकृच्छ्र व्रत कहाता है ॥ ३ ॥ नौ दिन केवल जल पी के रहे और अन्त में तीन दिन निर्जल निराहार रहे यह कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत कहाता है ॥४॥ कृच्छ्र व्रतों