भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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॥ भाषार्थसंहिता ॥ ९९

कृच्छ्राणां व्रतरूपाणि ॥ ५ ॥ श्मश्रुकेशान्वापयेद्भ्रुवोऽक्षिलोमशिखावर्जं नखान्निक्कृत्यैकवासा अनिन्दितभोजी सकृद्भैक्षमनिन्दितं त्रिषवणमुदकोपस्पर्शी दण्डी सकमण्डलुः स्त्रीशूद्रसंभाषणवर्जी स्थानाऽऽसनशीलोऽहस्तिष्ठेद्रात्रावासीतेत्याह भगवान् वसिष्ठः ॥ ६ ॥ स त्वद्यदेतद्धर्मशास्त्रं नापुत्राय नाशिष्याय नासंवत्सरोपिताय दद्यात् ॥७॥ सहस्रं दक्षिणा ऋषभैकादश गुरुप्रसादो वा गुरुप्रसादो वेति ॥ ८ ॥

इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

अविख्यापितदोषाणां पापानांमहतांतथा । सर्वेषांचोपपापानां शुद्धिंवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १ ॥ आहिताग्नेर्विनीतस्य वृद्धस्यविदुषोऽपिवा । रहस्योक्तंप्रायश्चित्तं पूर्वोक्तमितरैर्जनाः ॥ २ ॥


के नियम दिखाते हैं ॥ ५ ॥ भौंह, आंखें, उदर-भुजादि के लोम तथा चोटी को छोड़ कर प्रथम दाढ़ी मूंछें और शिर के बालों को मुंडावे । फिर नख कटवाके समान कर एक धोती मात्र पहिने हुए, दिनरात में एकबार शुद्ध अनिन्दित भोजन करे, शुद्ध एकान्त में निवास करे, सायं, प्रातः और मध्यान्ह में तीनों बार स्नान करे, दण्ड कमण्डलु आदि ब्रह्मचारी के चिन्ह रक्खे, स्त्री तथा शूद्रादि नीचों से संभाषण न करे, रहने के स्थान और आसन से दूर कहीं न जावे । दिन में खड़ा होके तथा रात्रि में बैठ कर प्रायः जप करता रहे । यह भगवान् वसिष्ठ महर्षि ने कहा है ॥ ६ ॥ वह अध्यापक ब्राह्मण इस महर्षि वसिष्ठ प्रोक्त धर्मशास्त्र को जो विधिपूर्वक शिष्य नहीं हुआ, वा जो एक वर्ष तक निकट में न रहे वा जो पुत्र न हो, ऐसों को यह शास्त्र न पढ़ावे वा न उपदेश करे ॥ ७ ॥ सहस्र स्वर्ण मुद्रा वा सहस्र गौ अथवा दश गौ एक बैल गुरु को शिष्य दक्षिणा देवे अथवा गुरु वैसे ही सन्तुष्ट हों तो भले ही दक्षिणा न लेवें और अधिकारी शिष्य को शास्त्रों का विद्वान् करें ॥८॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौबीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२४॥

जिन के दोष प्रकट नहीं हुए ऐसे छिपे हुए पापों की, तथ बड़े प्रबल महापापों की, और सब उपपातकों की पूरी २ शुद्धि आगे कहते हैं ॥ १ ॥

नम्रभाव से वर्तने वाला आहिताग्नि (अग्निहोत्री,) वृद्ध, तथा, विद्वान् इन के लिये एकान्त में करने योग्य प्रायश्चित्त पूर्व कहा गया । अन्य लोग ॥२॥

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