अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 790, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० 'वसिष्ठस्मृतिः ॥
प्राणायामैःपवित्रैश्च दानैर्होमैर्जपैस्तथा । नित्ययुक्ताःप्रमुच्यन्ते पातकेभ्योनसंशयः ॥ ३ ॥
प्राणायामाःपवित्राणि व्याहृतीःप्रणवंतथा । पवित्रपाणिरासीनो ब्रह्मैनैत्यकमभ्यसेत् ॥ ४ ॥
आवर्तयेत्सदायुक्तः प्राणायामान्पुनःपुनः । आलोमाग्रान्नखाग्राच्च तपस्तप्यतुउत्तमम् ॥ ५ ॥
निरोधाज्जायतेवायु र्वायोरग्निर्हिजायते । तापेनाऽऽपोऽथजायन्ते ततोऽन्तःशुध्यतेत्रिभिः ॥ ६॥
नतांतीव्रेणतपसा नस्वाऽध्यायैर्नचेज्यया । गतिंगन्तुंद्विजाःशक्ता योगात्संप्राप्नुवन्तियाम् ॥ ७ ॥
योगात्संप्राप्यतेज्ञानं योगोधर्मस्यलक्षणम् । यागःपरंतपोनित्यं तस्माद्युक्तःसदाभवेत् ॥ ८ ॥
प्रणवेनिस्ययुक्तःस्याद् व्याहतीषुचसप्तसु । त्रिपदायांचगायत्र्यां नभयंवैविद्यतेक्वचित् ॥९ ॥
प्राणायाम, पवमान सूक्तादि के अभ्यास, सुपात्रों को दान, होम,गायत्र्यादि के जप, इन कामों में नित्य ही श्रद्धा भक्ति से तत्पर रहते हुए पातकों से छूट जाते हैं इस में सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ हाथ में पवित्री वा कुश ले कर पूर्वाभिमुख बैठा हुआ प्राणायाम करके प्रणव और व्याहृतियों के उच्चारण पूर्वक पवमान सूक्तादि रूप वेद का श्रद्धा से नित्य २ अभ्यास करे ॥ ४ ॥ सदा ही तत्पर रहता हुआ श्रद्धा से प्राणायामों की वार २ नित्य आवृत्ति करे । लोमों के अग्रभाग और नखों के अग्रभाग तक सब शरीर से उत्तम तप करे ॥ ५ ॥ प्राण की गति के रोकने से शरीर में वायु बढ़ता, वायु से अग्नि प्रकट होता वा बढ़ता, और अग्नि के ताप से जल बढ़ता है तिस से तीनों तत्त्वों से अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ तीव्र तप से, नियत वेदाध्ययन रूप स्वाध्याय से, और यज्ञों के करने से ब्राह्मण लोग उस उत्तम गति को प्राप्त नहीं होते कि जिस गति को प्राणायामादि योगाभ्यास से प्राप्त हो सकते हैं ॥७॥ योग से ज्ञान प्राप्त होता, योग धर्म का चिन्ह है, योग नित्य ही परम तप है, तिस कारण अपना हित चाहने वाला प्राणायामादि योग में नित्य तत्पर हो ॥८॥ प्रणव, सात व्याहृति, और तीन पाद की गायत्री, इन के जप में जो ब्राह्मण श्रद्धा भक्ति से निरन्तर नित्य तत्पर रहे उस के लिये कहीं भय नहीं है ॥९॥