अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
॥ भाषार्थसंहिता ॥ ९९
कृच्छ्राणां व्रतरूपाणि ॥ ५ ॥ श्मश्रुकेशान्वापयेद्भ्रुवोऽक्षिलोमशिखावर्जं नखान्निक्कृत्यैकवासा अनिन्दितभोजी सकृद्भैक्षमनिन्दितं त्रिषवणमुदकोपस्पर्शी दण्डी सकमण्डलुः स्त्रीशूद्रसंभाषणवर्जी स्थानाऽऽसनशीलोऽहस्तिष्ठेद्रात्रावासीतेत्याह भगवान् वसिष्ठः ॥ ६ ॥ स त्वद्यदेतद्धर्मशास्त्रं नापुत्राय नाशिष्याय नासंवत्सरोपिताय दद्यात् ॥७॥ सहस्रं दक्षिणा ऋषभैकादश गुरुप्रसादो वा गुरुप्रसादो वेति ॥ ८ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
अविख्यापितदोषाणां पापानांमहतांतथा । सर्वेषांचोपपापानां शुद्धिंवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १ ॥ आहिताग्नेर्विनीतस्य वृद्धस्यविदुषोऽपिवा । रहस्योक्तंप्रायश्चित्तं पूर्वोक्तमितरैर्जनाः ॥ २ ॥
के नियम दिखाते हैं ॥ ५ ॥ भौंह, आंखें, उदर-भुजादि के लोम तथा चोटी को छोड़ कर प्रथम दाढ़ी मूंछें और शिर के बालों को मुंडावे । फिर नख कटवाके समान कर एक धोती मात्र पहिने हुए, दिनरात में एकबार शुद्ध अनिन्दित भोजन करे, शुद्ध एकान्त में निवास करे, सायं, प्रातः और मध्यान्ह में तीनों बार स्नान करे, दण्ड कमण्डलु आदि ब्रह्मचारी के चिन्ह रक्खे, स्त्री तथा शूद्रादि नीचों से संभाषण न करे, रहने के स्थान और आसन से दूर कहीं न जावे । दिन में खड़ा होके तथा रात्रि में बैठ कर प्रायः जप करता रहे । यह भगवान् वसिष्ठ महर्षि ने कहा है ॥ ६ ॥ वह अध्यापक ब्राह्मण इस महर्षि वसिष्ठ प्रोक्त धर्मशास्त्र को जो विधिपूर्वक शिष्य नहीं हुआ, वा जो एक वर्ष तक निकट में न रहे वा जो पुत्र न हो, ऐसों को यह शास्त्र न पढ़ावे वा न उपदेश करे ॥ ७ ॥ सहस्र स्वर्ण मुद्रा वा सहस्र गौ अथवा दश गौ एक बैल गुरु को शिष्य दक्षिणा देवे अथवा गुरु वैसे ही सन्तुष्ट हों तो भले ही दक्षिणा न लेवें और अधिकारी शिष्य को शास्त्रों का विद्वान् करें ॥८॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौबीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२४॥
जिन के दोष प्रकट नहीं हुए ऐसे छिपे हुए पापों की, तथ बड़े प्रबल महापापों की, और सब उपपातकों की पूरी २ शुद्धि आगे कहते हैं ॥ १ ॥
नम्रभाव से वर्तने वाला आहिताग्नि (अग्निहोत्री,) वृद्ध, तथा, विद्वान् इन के लिये एकान्त में करने योग्य प्रायश्चित्त पूर्व कहा गया । अन्य लोग ॥२॥
१३
१०० 'वसिष्ठस्मृतिः ॥
प्राणायामैःपवित्रैश्च दानैर्होमैर्जपैस्तथा । नित्ययुक्ताःप्रमुच्यन्ते पातकेभ्योनसंशयः ॥ ३ ॥
प्राणायामाःपवित्राणि व्याहृतीःप्रणवंतथा । पवित्रपाणिरासीनो ब्रह्मैनैत्यकमभ्यसेत् ॥ ४ ॥
आवर्तयेत्सदायुक्तः प्राणायामान्पुनःपुनः । आलोमाग्रान्नखाग्राच्च तपस्तप्यतुउत्तमम् ॥ ५ ॥
निरोधाज्जायतेवायु र्वायोरग्निर्हिजायते । तापेनाऽऽपोऽथजायन्ते ततोऽन्तःशुध्यतेत्रिभिः ॥ ६॥
नतांतीव्रेणतपसा नस्वाऽध्यायैर्नचेज्यया । गतिंगन्तुंद्विजाःशक्ता योगात्संप्राप्नुवन्तियाम् ॥ ७ ॥
योगात्संप्राप्यतेज्ञानं योगोधर्मस्यलक्षणम् । यागःपरंतपोनित्यं तस्माद्युक्तःसदाभवेत् ॥ ८ ॥
प्रणवेनिस्ययुक्तःस्याद् व्याहतीषुचसप्तसु । त्रिपदायांचगायत्र्यां नभयंवैविद्यतेक्वचित् ॥९ ॥
प्राणायाम, पवमान सूक्तादि के अभ्यास, सुपात्रों को दान, होम,गायत्र्यादि के जप, इन कामों में नित्य ही श्रद्धा भक्ति से तत्पर रहते हुए पातकों से छूट जाते हैं इस में सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ हाथ में पवित्री वा कुश ले कर पूर्वाभिमुख बैठा हुआ प्राणायाम करके प्रणव और व्याहृतियों के उच्चारण पूर्वक पवमान सूक्तादि रूप वेद का श्रद्धा से नित्य २ अभ्यास करे ॥ ४ ॥ सदा ही तत्पर रहता हुआ श्रद्धा से प्राणायामों की वार २ नित्य आवृत्ति करे । लोमों के अग्रभाग और नखों के अग्रभाग तक सब शरीर से उत्तम तप करे ॥ ५ ॥ प्राण की गति के रोकने से शरीर में वायु बढ़ता, वायु से अग्नि प्रकट होता वा बढ़ता, और अग्नि के ताप से जल बढ़ता है तिस से तीनों तत्त्वों से अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ तीव्र तप से, नियत वेदाध्ययन रूप स्वाध्याय से, और यज्ञों के करने से ब्राह्मण लोग उस उत्तम गति को प्राप्त नहीं होते कि जिस गति को प्राणायामादि योगाभ्यास से प्राप्त हो सकते हैं ॥७॥ योग से ज्ञान प्राप्त होता, योग धर्म का चिन्ह है, योग नित्य ही परम तप है, तिस कारण अपना हित चाहने वाला प्राणायामादि योग में नित्य तत्पर हो ॥८॥ प्रणव, सात व्याहृति, और तीन पाद की गायत्री, इन के जप में जो ब्राह्मण श्रद्धा भक्ति से निरन्तर नित्य तत्पर रहे उस के लिये कहीं भय नहीं है ॥९॥
भाषार्थसहिता ॥ १०९
प्रणवाद्यास्तथावेदाः प्रणवेपर्यवस्थिताः ।
वाङ्मयं प्रणवः सर्वं तस्मात्प्रणवमभ्यसेत् ॥ १० ॥
एकाक्षरंपरंब्रह्म पावनंपरमंस्मृतम् ।
सर्वेषामेवपापानां संकरेसमुपस्थिते ॥ ११ ॥
अभ्यासोदशसाहस्रः सावित्र्याःशोधनंमहत् ॥ १२ ॥
सव्याहृतिंसप्रणवां गायत्रींशिरसासहा ।
त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यतेसउच्यतइति ॥ १३ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
प्राणायामान्धारयेत्त्रीन्यथाविध्यतन्द्रितः ।
अहोरात्रकृतंपापं तत्क्षणादेवनश्यति ॥ १ ॥
कर्मणामनसावाचा यदन्हाकृतमैनसम् ।
आसीनःपश्चिमां सन्ध्यां प्राणायामैर्व्यपोहति ॥ २ ॥
कर्मणामनसावाचा यद्रात्र्याकृतमैनसम् ।
उत्तिष्ठन्पूर्वसन्ध्यान्तु प्राणायामैर्व्यपोहति ॥ ३ ॥
प्राणायामैर्यआत्मानं संयम्याऽऽस्तेपुनःपुनः ।
प्रणव को आदि ले कर वेद चलते हैं अर्थात् प्रणव से वेदों की उत्पत्ति हुई, प्रणव में ही वेदों की स्थिति है। और वाणी का विषय शब्दमात्र सब प्रणव स्वरूप ही है तिस से प्रणव का निरन्तर अभ्यास करे ॥ १० ॥ सब प्रकार के पापों का घाल मेल होकर बड़ा संघट्ट हो जाने पर, पर ब्रह्मस्वरूप एकाक्षर प्रणव का अभ्यास करना परम पवित्र माना गया है ॥ ११ ॥ दश हजार गायत्री का एकान्त में शुद्धि के साथ श्रद्धा पूर्वक जप करना परम शुद्धि करने वाला है अर्थात् इस से अधिकांश पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १२ ॥ प्रणव, व्याहृति और शिरोमन्त्र इन सब के सहित गायत्री को प्राणगति रोक कर तीन वार पढ़े इसी को प्राणायाम कहते हैं ॥ १३ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पच्चीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
निरालस हो के विधि पूर्वक तीन प्राणायाम नित्य करे तो दिन रात में किया पाप तत्क्षण नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ मन, वाणी तथा शरीर से जो कुछ अपराध दिन भर में किया उस को सायंकाल की सन्ध्या में बैठ कर प्राणायाम करता हुआ नष्ट कर देता है ॥ २ ॥ इसी प्रकार मन, वाणी तथा शरीर से रात्रि में किये दोषों को प्रातःकाल की सन्ध्या में खड़ा हुआ प्राणायामों से नष्ट कर देता है ॥ ३ ॥ जो पुरुष अपने शरीरेन्द्रियों को प्राणायामों की
१०२ | वसिष्ठस्मृतिः ॥
संदध्याच्चाधिकैर्वाऽपि द्विगुणैर्वापरंतुयः ॥ ४ ॥
सव्याहृतिकाःसप्रणवाः प्राणायामास्तुषोडश ।
अपिभ्रूणहनंमासात् पुनन्त्यहरहःकृताः ॥ ५ ॥
जप्त्वाकौत्समपेत्येदद्वासिष्ठंचप्रतीत्यृचम् ।
माहित्रंशुद्धवत्यश्च सुरापोऽपिविशुध्यति ॥ ६ ॥
सकृज्जप्त्वाऽस्यवामीयं शिवसंकल्पमेवच।
सुवर्णमपहृत्यापि क्षणाद्भवतिनिर्मलः ॥ ७ ॥
हविष्पान्तीयमभ्यस्य नतमंहद्वतीतिच ।
सूक्तंचपौरुषंजप्त्वा मुच्यतेगुरुतल्पगः ॥ ८ ॥
अपिवाप्सुनिमज्जांनस्त्रिर्जपेदघमर्षणम् ।
यथाऽश्वमेधावभृथस्तादृशंमनुरब्रवीत् ॥ ६ ॥
आरम्भयज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टादशभिर्गुणैः ।
उपांशुःस्याच्छतगुणः साहस्त्रोमानसःस्मृतः ॥ १० ॥
रस्सी से बांध कर वार २ बैठता है तथा जो अधिक द्विगुण वा और भी अधिक अभ्यास करता ॥४॥ अर्थात व्याहृति और प्रणव के सहित यदि सोलह प्राणायाम नियम से विधि पूर्वक नित्य करे तो एक मास में ब्रह्महत्या का महापातक भी छुटा कर शुद्ध निर्दोष कर देते हैं ॥ ५ ॥ ( अपनः शोशुचदघं० ऋ०मं० १ । सू० ९७ ) यह कौत्स सूक्त ( प्रतित्स्तोमेभिरुषसं० ऋ०५।५।२७) यह वासिष्ठ सूक्त (महित्रोणामवोऽस्तु०ऋ०८।८।४१) यह माहित्र सूक्त (एतोन्विन्द्रं०ऋ०६।६।३१) ये शुद्धवती तीन ऋचा इन का जप करने से मद्यपान के दोष से मुक्त हो जाता है॥६॥ ( अस्यवामस्य० ऋ० मं० १ । सू० १६४ ) सूक्त तथा ( यज्जाग्रतो दूर० यजु०अ०३५।१-६) छः मन्त्र शिवसंकल्प सूक्त के एक बार जप करने से सुवर्ण की चोरी के दोष से शीघ्र ही मुक्त होता है ॥७॥ ( हविष्पाम्त० ऋ० ८।४।१०) सूक्त (नतमंहोनदुरितं०ऋ०८।७।१३) सूक्त (इति वा०ऋ०८।६।२६) सूक्त और (सहस्त्रशीर्षा० ऋ० ८ । ४ । १९) पुरुष सूक्त इन सब का जप करने से गुरु पत्नी गमन के दोष से भी मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ अथवा जल में डुबकी लगा के तीन वार अघमर्षण सूक्त का जप करे । जैसे अश्वमेध यज्ञ का अवभृथ स्नान सर्व पाप नाशक है वैसा ही मनु जी ने अघमर्षण को कहा है ॥ ९ ॥ अग्नि में आरम्भ होने वाले यज्ञों से जप यज्ञ दश गुणा श्रेष्ठ है । धीरे २ उच्चारण किया उपांशु जप सौ गुणा और मानस जप सहस्त्र गुणा उत्तम है ॥१० ॥
भावार्थसंहिता ॥ १०६
येपाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः । सर्वेतेजपयज्ञस्य कलांनाहन्तिषोडशीम् ॥ ११ ॥ जप्येनैवस्तुसंसिध्येद् ब्राह्मणोनात्रसंशयः । कुर्य्यादन्यन्नवाकुर्य्यान्मैत्रोब्राह्मणउच्यते ॥ १२ ॥ जापिनांहोमिनांचैव ध्यायिनांतीर्थवासिनाम् । नपरिवसन्तिपापानि येचस्नाताःशिरोव्रतैः ॥ १३ ॥ यथाऽग्निर्वायुनाधूतो हविषाचैवदीप्यते । एवंजप्यपरोनित्यं ब्राह्मणःसंग्रहीष्यते ॥ १४ ॥ स्वाध्यायाध्यायिनांनित्यं नित्यंचप्रयतात्मनाम् । जपतांजुह्वतांचैव विनिपातो्नविद्यते ॥ १५ ॥ सहस्रपरमांदेवीं शतमध्यांदशावराम् । शुद्धिकामःप्रयुञ्जीत सर्वपापेष्वपिस्थितः ॥ १६ ॥ क्षत्रियोबाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः । धनेनवैश्यशूद्रौतु जपैर्होमैर्द्विजोत्तमः ॥ १७ ॥
पकाये अन्न से होने वाले देवयज्ञ, भूत यज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ, येचार पाकयज्ञ और अग्निहोत्र दर्शपौर्णमासादि विधियज्ञ ये सब ठीक २ किये जप यज्ञ के षोडशांश के तुल्य भी नहीं हैं ॥ ११ ॥ ब्राह्मण केवल ठीक २ किये जप से ही सिद्ध हो जाता है । वह चाहे अन्य कुछ करे वा न करे वह सब का मित्र होता है ॥ १२ ॥ निरन्तर जप, होम, ध्यान करने वाले, तीर्थों में जाकर बस ने वाले और नित्य नियम से प्रातः स्नान सन्ध्या करने वालों के शरीरेन्द्रियों में पाप नहीं ठहरते ॥ १३ ॥ जैसे वायु और हविष्य घृतादि से प्रज्वलित अग्नि का तेज बढ़ता है वैसे जप के द्वारा ब्राह्मण का तेज नित्य २ बढ़ताजाता है ॥१४॥ जो नित्य जितेन्द्रिय रहते, जो नित्य नियम से विधि पूर्वक वेदाध्ययन करते तथा नित्य २ जप होम करते हैं उन के यहां अकालमृत्यु आदि विपत्ति नहीं आती हैं ॥ १५ ॥ सब पापों में स्थित रहता हुआ भी अधिक से अधिक १००० गायत्री का, मध्यकक्षा में १०० का, और निकृष्ट दशा में १० गायत्री का जप अवश्य ही नित्य २ करता रहे ॥ १६ ॥ क्षत्रिय पुरुष अपने बाहुबल से विपत्तियों से बचे, वैश्य तथा शूद्र धनादि के द्वारा दुःखों को हटावें और ब्राह्मण जप होमों के द्वारा सब दुःखों को हटाता रहे ॥ १७ ॥ जैसे रथ के
१०४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
यथाऽश्वारथहीनाःस्युरथोवाऽश्वैर्विनाथवा । एवंतपस्त्वविद्यस्य विद्यावाऽप्यतपस्विनः ॥ १८ ॥ यथाऽन्नंमधुसंयुक्तं मधुवाऽन्नेनसंस्युतम् । एवंतपश्चविद्याच संयुक्तंभेषजंमहत् ॥ १९ ॥ विद्यातपोभ्यांसंयुक्तं ब्राह्मणंजपनैत्यकम् । सदाऽपिपापकर्माणमेनोनप्रतियुज्यते,एनोनप्रतियुज्यते,इति २० इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे षड्विंशोऽध्यायः ॥२६॥ यद्यकार्यशतंसाग्रं कृतंवेदञ्चधार्यते । सर्वंतत्तस्यवेदाग्निर्दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ १ ॥ यथावातबलोवन्हिर्दहत्यार्द्रानपिद्रुमान् । तथादहतिवेदाग्निः कर्मजंदोषमात्मनः ॥ २ ॥ हत्वाऽपिसइमांल्लोकान् भुञ्जानोऽपियतस्ततः ।
बिना घोड़े वा घोड़ों के बिना रथ व्यर्थ रहता है वैसे ही बिना विद्या के धर्मानुष्ठान वा बिना धर्मानुष्ठान रूप तप के विद्वान् होना मात्र निरर्थक है ॥ १८॥ जैसे मिष्ट मिला हुआ अन्न वा अन्न मिला हुआ शर्करादि मीठा स्वादिष्ट होता वैसे ही तप नाम धर्मानुष्ठान और विद्या दोनों हों तो सब पापों की परम औषध है ॥ १९॥ विद्या और धर्म कर्मानुष्ठान रूप तप से युक्त नित्य जप करने वाले, सदा पाप कर्म करते हुये भी ब्राह्मण को पाप दोष नहीं लगता है (चाहे यों कहलो कि पाप पुण्य दोनों बराबर हो जाने से वह पापी नहीं होता अर्थात संसार में रहते हुए मनुष्य से बहुत बचने पर भी कुछ अपराध अवश्य होते हैं इस से जप होमादि सब हालत में करना अच्छा है । परन्तु पापों से बचता हुआ धर्म करे तो सब से अच्छा है) ॥ २० ॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छब्बीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२६॥ यदि ब्राह्मणादि नये २ अकर्त्तव्य सैकड़ों अपराध भी करता हो पर वेद को नियम से पढ़ता पढ़ाता हो तो उसके उन सब पापों को वेद का ज्ञान रूप अग्नि ईंधन के तुल्य भस्म कर देता है ॥ १ ॥ जैसे वायु से प्रबल हुआ प्रज्वलित अग्नि वन के गीले वृक्षों को भी जला देता है । वैसे ही वेद रूप अग्नि भी कर्मों से हुए अन्तःकरण के दोषों को भस्म कर देता है ॥ २ ॥ इस मनुष्य आदि प्राणियों का हनन कर के भी तथा उचित अनुचित का अन्न खाता हुआ भी ऋग्वेद को
भाषाधर्मसंहिता ॥ १०५
ऋग्वेदंधारयन्विप्रो नैनःप्राप्नोतिकिञ्चन ॥ ३ ॥
नवेदबलमाश्रित्य पापकर्मरतिर्भवेत् ।
अज्ञानाच्चप्रमादाच्च दह्यतेकर्मनेतरत् ॥ ४ ॥
तपस्तप्यतियोऽरण्ये मुनिर्मूलफलाशनः ।
ऋचमेकांचयोऽधीते तञ्चतानिचतत्समम् ॥ ५ ॥
इतिहासपुराणाभ्यां वेदंसमुपबृंहयेत् ।
बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥ ६ ॥
वेदाभ्यासोऽन्वहंशक्त्या महायज्ञक्रियाक्रमः ।
नाशयन्त्याशुपापानि महापातकजान्यपि ॥ ७ ॥
वेदोदितंस्वकंकर्म नित्यंकुर्यादतन्द्रितः ।
तद्धिकुर्वन्यथाशक्त्या प्राप्नोतिपरमांगतिम् ॥ ८॥
याजनाध्यापनाद्यौनात्तथैवासत्प्रतिग्रहात् ।
विप्रेषुनभवेद्दोषो ज्वलनार्कसमोहिसः ॥ ९ ॥
कण्ठस्थ पाठ करता हुआ ब्राह्मण किञ्चित् भी पाप को प्राप्त नहीं होता ॥३॥ परन्तु ब्राह्मण वेदाध्ययन के बल का आश्रय लेकर समझ पूर्वक पाप कर्म कदापि न करे कि मेरे पाप वेदाध्ययन के बल से नष्टहो जांयगे । ऐसा भरोसा न रक्खे । क्योंकि अज्ञान वा भूल से किया अपराध वेदाध्ययन से नष्ट होता है अन्य नहीं ॥ ४ ॥ जो पुरुष मूल फल खाता हुआ मौन हो कर वन में तप करता है और जो गांव वा घर में रहता हुआ एक गायत्री मात्र का जप करता है वे दोनों बराबर हैं ॥ ५ ॥ इतिहास पुराणों को देखने द्वारा वेदार्थ ज्ञान को बढ़ावे । क्योंकि अल्पशास्त्रांश देखने जानने वाले से वेद डरता है कि मुझ पर यह मनुष्य प्रहार करेगा ॥ ६ ॥ प्रति दिन नियम से यथा शक्ति वेदाभ्यास करना और क्रम से पञ्चमहायज्ञ करना इतने ही कर्म महापातक सम्बन्धी पापों को भी शीघ्र नाश करते हैं ॥ ७ ॥
वेद में कहे अपने कर्म को ब्राह्मण आलस्य छोड़ के नित्यर करे यथाशक्ति केवल वेदोक्त कर्म को करता हुआ ही परमगति को अन्त में प्राप्त होजाता है ॥ ८ ॥ यज्ञ कराने, वेदादि पढ़ाने, क्षत्रियकन्यादि के साथ विवाह करने और अयोग्य का दान लेने से तपस्वी तेजस्वी विद्वान् ब्राह्मणों को दोष विशेष नहीं लगता क्योंकि ब्राह्मण अग्नि तथा सूर्य्य के समान है ॥ ९ ॥ भोज्य अभोज्य
१०६ वसिष्ठस्मृतिः ॥
शङ्कास्थाने समुत्पन्ने भोज्याभोज्यान्नसंज्ञके ।
आहारशुद्धिं वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥ १० ॥
अक्षारलवणां रूक्षां पिबेद्ब्राह्मीं सुवर्चलाम् ।
त्रिरात्रं शङ्खपुष्पीं च ब्राह्मणः पयसा सह ॥ ११ ॥
पालाशबिल्वपत्राणि कुशान्पद्मानुदुम्बरान् ।
क्वाथयित्वा पिबेदापस्त्रिरात्रेणैव शुध्यति ॥ १२ ॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधिसर्पिःकुशोदकम् ।
एकरात्रोपवासश्च श्वपाकमपि शोधयेत् ॥ १३ ॥
गोमूत्रं गोमयं चैव क्षीरं दधि घृतं तथा ।
पञ्चरात्रं तदाहारः पञ्चगव्येन शुध्यति ॥ १४ ॥
यथान्विधिनोपयुञ्जानः प्रत्यक्षेणैव शुध्यति ।
विशुद्धभावे शुद्धाः स्युरशुद्धे तु सरागिणः ॥ १५ ॥
हविष्यान्प्रातराशांस्त्रीन्सायमाशांस्तथैव च ।
अयाचितं तथैव स्यादादुपवासत्रयं भवेत् ॥ १६ ॥
अथ चेच्चरते कर्तुं दिवसं मारुताशनः ।
अन्न के खा लेने की शंका उत्पन्न हो कर ग्लानि हो जाने पर आहार शुद्धि का विचार कहते हैं सो तुम सुनो ॥१०॥ खार तथा लवण को छोड़ कर रूखी ब्राह्मी सुवर्चला ओषधि को और शंखाहूजी ओषधि को दूध के साथ तीन दिन पीकर व्रत करे ॥११॥ अथवा ढांक, बिल्व (बेल) कमल और गूलरी के पत्तों का काढ़ा कर२ तीन दिन तक पीता हुआ व्रत करे तो शुद्ध हो जाता है ॥१२॥ गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत और कुशों का जल इन सबको एक दिन पीवे और एक दिन उपवास करे यह दो दिन का कृच्छ्र सान्तपन व्रत श्वपाक को भी शुद्ध कर सकता है। अर्थात् अत्यन्त शोधक है ॥ १३ ॥ और अभक्ष्य भक्षण की विशेष अपवित्रता की शंका हो तो गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गो दधि, गो घृत, इन पांच पदार्थों को पांच दिन एक२ को एक २ दिन खाके व्रत करे सो इस पञ्चगव्य से सम्यक् शुद्धि होती है ॥ १४ ॥ विधि के साथ केवल जो खाकर व्रत करे तो प्रत्यक्ष शुद्धि होती है। व्रत करनेवाले का मन शुद्ध हो मन में कुटिलता न हो तो शुद्धि होगी और अपवित्र भाव होगा तो राग सहित की शुद्धि न होगी ॥१५॥ तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल हविष्य अन्न, खार लवण रहित खावे, तीन दिन बिन मांगे जो मिले खावे और तीन दिन उपवास करे ॥ १६ ॥ अब यदि अति शीघ्र ही प्रायश्चित्त
भाषार्थसहिता ॥ १०९
रात्रौजलाशयेव्युष्टः प्राजापत्येनतत्समम् ॥ १७ ॥
सावित्र्यष्टसहस्रं तु जपंकृत्वोत्थितेरवौ ।
मुच्यतेपात कैःसर्वैर्यदिनोब्रह्महाभवेत् ॥ १८ ॥
योवैस्तेनःसुरापोवा भ्रूणहागुरुतल्पगः ।
धर्मशास्त्रमधीत्यैव मुच्यतेसर्वपातकैः ॥ १९ ॥
दुरितानांदुरिष्टानां पापानांमहतांतथा ।
कृच्छ्रं चान्द्रायणंचैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २० ॥
एकैकंवर्धयेत्पिण्डं शुक्लेकृष्णेचह्रासयेत् ।
अमावास्यांनभुञ्जीत एवं चान्द्रायणोविधिरेवं
चान्द्रायणविधिः इति ॥ २१ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे सप्तविंशोऽध्यायः ।२७।
नस्त्रीदुष्यतिजारेण नविप्रोवेदकर्मणा ।
कर लेना चाहता हो तो दिन भर कुछ भी अन्न जल न ग्रहण कर वायुमात्र का भक्षण करे और रात्रि भर किसी जलाशय में भीगता रहे तो यह एक दिन रात का व्रत बारह दिन के कृच्छ्र प्राजापत्य व्रत की बराबर माना जायगा ॥ १७ ॥ उस व्रत के एक दिन रात में आठ हजार गायत्री का जप भी करे तो अगले दिन सूर्योदय होते २ ब्रह्महत्या को छोड़के अन्य सब पातकों से एक ही दिन रात में मुक्त हो जाता है ॥ १८ ॥ जो सुवर्ण का चोर वा सुरापीने वाला, ब्रह्महत्यारा और गुरु स्त्री गामी ये सभी धर्म शास्त्रों के आद्योपान्त पढ़लेने पर सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं ॥ १९ ॥ निकृष्टों को यज्ञ कराने सम्बन्धी पापों तथा महापातकादि सब पापों का कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत नाश करता है २० ॥ शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कलाओं के साथ प्रतिपदादि में एक २ ग्रास बढ़ावे अर्थात् शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से चान्द्रायण व्रत का आरम्भ करके प्रतिपदा को एक द्वितीया को दो ऐसे एक २ ग्रास बढ़ाके पौर्णमासी को १५ ग्रास खावे फिर कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से एक २ ग्रास घटा के अमावास्या को निराहार उपवास करे यह कृच्छ्रचान्द्रायण का विधान जानो ॥ २१ ॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सत्ताईसवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
यदि किसी जार (व्यभिचारी) दुष्ट पुरुष ने बलात्कार आदि से वा धोखे में नशादि द्वारा बेहोश करके स्त्री से कुकर्म किया हो तो ऐसी स्त्री, वेदोक्त
१४
१०८ वसिष्ठस्मृतिः ॥
नाऽऽपोमूत्रपुरीषेण नाग्निर्दहनकर्मणा ॥ १ ॥
स्वयंविप्रतिपन्नावा यदिवाविप्रवासिता ।
बलात्कारोपभुक्तावा चौरहस्तगताऽपिवा ॥ २ ॥
नत्याज्यादूषितानारी नास्यास्त्यागोविधीयते ।
पुष्पकालमुपासीत ऋतुकालेनशुध्यति ॥ ३ ॥
स्त्रियःपवित्रमतुलं नैतादुष्यन्तिकर्हिचित् ।
मासिमासिरजोह्यासां दुष्कृतान्यपकर्षति ॥ ४ ॥
पूर्वस्त्रियःसुरैर्भुक्ताः सोमगन्धर्ववन्हिभिः ।
गच्छन्तिमानुषान्पश्चान्नैतादुष्यन्तिधर्मतः ॥ ५ ॥
तासांसोमोऽददच्छौचं गन्धर्वःशिक्षितांगिरम् ।
अग्निश्चसर्वभक्षत्वं तस्मान्निष्कल्मषाःस्त्रियः ॥ ६ ॥
त्रीणिस्त्रियःपातकानि लोकेधर्मविदोविदुः ।
अभिचार ( मारणप्रयोगादि ) से ब्राह्मण, विष्टा मूत्रादि से नद्यादि जलाशय, और अशुद्ध मूर्दादि को जलाने से अग्नि, दूषित नहीं होता है ॥ १ ॥ स्त्री यदि स्वयं विरूद्ध हो कर वा पति आदि के निकाल देने पर कहीं चली जाय उस में कोई दुष्ट वा चोर बलात्कार दुराचार करे ॥ २ ॥ तो इस प्रकार दूषित हुई स्त्री त्याज्य नहीं ऐसी (निरपराध होने से) का त्याग शास्त्र में नहीं कहा है। ऐसी स्त्री रजोधर्महोने से शुद्ध हो जाती है (यह धर्मशास्त्रकार की राय है सो जब जहां लोकव्यवहार के विरुद्ध न हो वहां मान्य होगी और लोकव्यवहार से विरुद्ध होने पर (लोकद्विष्टङ्कुमेवच । मनु० अ० ४ । १७६) के अनुसार धर्मानुकूल विचार भी त्याज्य होगा। तदनुसार दूषित स्त्री का ग्रहण लोक विरुद्ध होने से संप्रति करना उचित नहीं है) ॥ ३ ॥ स्त्रियां अतुल पवित्र हैं इस से कदापि दूषित नहीं होतीं। क्योंकि प्रतिमास निकलने वाला रज उन के दोषों को नष्ट करता रहता है ॥ ४ ॥ पहिले स्त्रियों को सोम, गन्धर्व और अग्नि देवताओं ने भोगा और पीछे मनुष्यों के साथ विवाह हुआ इस से धर्मानुकूल दूषित नहीं होतीं ॥ ५ ॥ सोम देवता ने अपने समय में स्त्रियों को पवित्रता दी, गन्धर्वदेवता ने प्रिय तथा कोमल शिक्षित वाणी दी और अग्नि ने सब कुछ खाने पचाने की शक्ति दी है इस से स्त्रियां स्वाभाविक शुद्ध हैं ॥ ६ ॥ धर्मज्ञ विद्वानों ने स्त्रियों के तीन पातक मुख्यकर माने हैं। एक पति को स्वयं विषादि देके वा अन्यद्वारा मरवा डालना, किसी का गर्भ गिराना, वा अपना गर्भ गिराना (इन से भिन्न अन्य भी स्त्री के पाप
भार्गवसंहिता ॥ १०९
भर्तुर्वधोभ्रूणहत्या स्वस्यगर्भस्यपातनम् ॥ ७ ॥
वत्सःप्रस्रवणेमेध्यः शकुनिःफलपातने ।
स्त्रियश्चरतिसंसर्गे श्वामृगग्रहणेशुचिः ॥ ८ ॥
अजाश्वामुखतोमेध्या गावोमेध्यास्तुपृष्ठतः ।
ब्राह्मणाःपादतोमेध्याः स्त्रियोमेध्यास्तुसर्वतः ॥ ९ ॥
सर्ववेदपवित्राणि वक्ष्याम्यहमतःपरम् ॥
येषांजपैश्चहोमैश्च पूयन्तेनात्रसंशयः ॥ १० ॥
अघमर्षणंदेवकृतं शुद्धवत्यस्तरत्समाः ।
कूष्माण्डानिपावमान्यो दुर्गासावित्रिरेवच ॥ ११ ॥
अभीषङ्गाःपदस्तोमाः सामानिव्याहृतीस्तथा ।
भारुण्डानिचसामानि गायत्रंरैवतंतथा ॥ १२ ॥
पुरुषव्रतंन्यासं च तथावेदव्रतानिच ।
हैं जिन के प्रायश्चित्त पूर्व अ० २१ आदि में कहे हैं पर उन में ये तीन बड़े महापाप हैं ) ॥ ७ ॥ गौ के थनों को चोंखने में बछड़े का मुख शुद्ध है, फल गिराने में पक्षी का मुख शुद्ध, शिकार पकड़ने में कुत्ते का मुख शुद्ध और रति सम्बन्ध में स्त्री शुद्ध है ॥ ८ ॥ बकरा बकरी घोड़ा का मुख, गौ के मल-मूत्र स्थान, तथा ब्राह्मणों के पग पवित्र हैं तथा स्त्रियों का सर्वाङ्ग शुद्ध है ॥ ९ ॥ ( स्त्रियां निर्धन पराधीन होने से भी कम दूषित होती हैं बालककृत अपराध बालक को नहीं लगता है ) सब वेदों के पवित्रांश आगे कहते हैं जिन के जप और होमों द्वारा निःसन्देह मनुष्य पवित्र होते हैं ॥ १०॥ ( ऋतं च सत्यं च०) इत्यादि तीन मन्त्र, (देवकृतस्यैनसो०) इत्यादि छः मन्त्र, (एतोन्विन्द्रं०) इत्यादि तीन शुद्धवती ऋचा, ( तरत्समन्दी० ) इत्यादि चार ऋचा, कूष्माण्ड सूक्त, ऋग्वेद का नवम मण्डल पवमान सूक्त, सविता देवता वाली, दुर्गा की ऋचा, अभीषङ्ग-पदस्तोम- ये साम, सातों व्याहृति, भारुण्ड-गायत्र और रैवत साम, ॥११। १२ ॥ पुरुषव्रत, न्यास, वेदव्रत ये साम, छप शब्दवाले, बृहस्पति शब्दवाले मन्त्र वा सूक्त, ( मधुवाता० ) इत्यादि तीन ऋचा (नमस्तेरुद्र० ) इत्यादि शत रुद्रिय, अथर्वशिरः, त्रिसुपर्ण, महाव्रत, गोसूक्त, अश्व-
११० वसिष्ठस्मृतिः ॥
अब्लिङ्गं वार्हस्पत्यंच वाक्सूक्तंमध्वृचस्तथा ॥ १३ ॥
शतरुद्रियमथर्वशिर-स्त्रिसुपर्णंमहाव्रतम् ।
गोसूक्तंचाश्वसूक्तंच शुद्धःशुद्धेतिसामनी ॥ १४ ॥
त्रीण्याज्यदोहानिरथन्तरञ्च अग्नेर्व्रतंवामदेव्यंबृहच्च ।
एतानिजप्तानिपुनन्तिजन्तू-ञ्जातिस्मरत्वंलभतेयदीच्छेत् ॥ १५ ॥
अग्नेरपत्यंप्रथमंसुवर्णं भूर्वैष्णवीसूर्यसुताश्चगावः ।
तासामनन्तंफलमश्नुवीत यःकाञ्चनं गां चमहींचदद्यात् ॥१६॥
उपरुन्धन्तिदातारं गौरश्वःकनकंक्षितिः ।
अश्रोत्रियस्यांविप्रस्य हस्तंदृष्ट्वानिराकृतेः ॥ १७ ॥
वैशाख्यांपौर्णमास्यांच ब्राह्मणान्सप्तपञ्चवा ।
तिलान्क्षौद्रेणसंयुक्तान् कृष्णान्वायदि वेतरान् ॥ १८ ॥
प्रीयतांधर्मराजेति यद्वामनसिवर्त्तते ।
यावज्जीवकृतंपापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ १९ ॥
सुवर्णनाभंकृत्वातु सखुरंकृष्णमार्गणम् ।
तिलैःप्रच्छाद्ययोदद्यात्तस्यपुण्यफलंशृणु ॥ २० ॥
ससुवर्णगुहातेन सशैलवनकानना ।
सूक्त, शुद्धः-शुद्धा, ये दोनों साम ॥ १३ । १४ ॥ त्रीन् आज्यदोह, रथन्तर, अग्निब्रत, वामदेव, बृहत्, ये साम इन सब का जप करे तो ये जीवों को पवित्र करते हैं और चाहे तो पूर्व जन्म का स्मरण भी हो जाता है ॥ १५ ॥ अग्निदेवता का प्रथम सन्तान सुवर्ण, विष्णुदेव की पृथिवी, और सूर्यनारायण की पुत्री गौ इन तीनों का जो पुरुष दान करता है उस को अनन्त फल प्राप्त होता है ॥ १६ ॥ गौ, घोड़े, सुवर्ण और भूमि ये सब वेदाध्ययन से शून्य ब्राह्मण के हाथ में अपने को जाते देख कर दाता पुरुष को रोकते हैं कि इसे मत दे यह सुपात्र नहीं है ॥ १७ ॥
बशाख की पौर्णमासी के दिन सात वा पांच ब्राह्मणों को शहद से संयुक्तकाले वा अन्य तिल (हे धर्मराज ! प्रसन्न हूजिये ऐसा वा जो मनमें हो कहकर) दान करे तो जीवन भर में किया सब पाप क्षण भर में नष्ट होता है ॥ १८ । १९ ॥ ककुन्दनी गन्ध द्रव्य सहित काले बाण को मध्यमें सुवर्ण लगा के तिलों से ढांपकर जो पुरुष दान करता है उसके पुण्य फल को सुनो ॥ २० ॥ सुवर्ण, गुफा, पर्वत बन, जङ्गल और चारों दिशाओं सहित सब भूमि उसने दाम की कि जिसने
भाषार्थसहिता ॥ १११
चतुर्वक्त्राभवेद्दत्ता पृथिवीनात्रसंशयः ॥ २१ ॥
कृष्णाजिनेतिलान्कृत्वा हिरण्यमधुसर्पिषी ।
ददातियस्तुविप्राय सर्वंतरतिदुष्कृतमितिसर्वंतरतिदुष्कृतमिति२२
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे ऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥
दानेन सर्वकामानाप्नोति ॥१॥ चिरजीवित्वं ब्रह्मचा-
री रूपवान् ॥ २ ॥ अहिंस्युपपद्यते स्वर्गम् ॥ ३ ॥ अग्निप्रवे-
शाद् ब्रह्मलोकः ॥ ४ ॥ मौनात्सौभाग्यम् ॥ ५ ॥ नागाधिप-
तिरुदकवासात् ॥ ६ ॥ नीरुजः क्षीणकोशः ॥ ७ ॥ तोयदः स-
र्वकामसमृद्धः ॥ ८ ॥ अन्नप्रदाता सचक्षुः ॥ ९ ॥ स्मृतिमान्मे-
धावी सर्वतोऽभयदाता ॥ १० ॥ गोयुक्ते सर्वतीर्थोपस्पर्शन-
म् ॥ ११ ॥ शय्यासनदानादन्तःपुराधिपत्यम् ॥ १२ ॥ छत्र-
उक्त प्रकार बाण का दान किया इसमें सन्देह नहीं ॥ २१ ॥ काले मृग चर्म पर तिल धरके उन तिलों पर सुवर्ण, शहद और घी धर के जो ब्राह्मण को दान देता है वह सब दुष्कर्मों से पार हो जाता है ॥ २२ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में अठ्ठाईसवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
दान धर्म से मनुष्य की सब मनोकामना पूरी हो जाती है ॥ १ ॥ दान शील पुरुष चिरंजीवी ब्रह्मचारी तथा सुरूपवान् होता है ॥ २ ॥ दयालु हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ दान शील को अग्नि में प्रवेश करने ( विधिपूर्वक मरणान्तदाह ) से ब्रह्मलोक प्राप्त होता ॥ ४॥ मौन धारण करने से सौभाग्य प्राप्त होता ॥५॥ जलमें भींगते हुए जप करने से नागों का अधिपति अर्थात् नागलोक का राजा होता है ॥ ६ ॥ दान में जिसका धन चुक जाय वह नीरोग होता ॥७॥ प्याऊ आदि जलदान करनेवाला सब कामनाओं से युक्त होता ॥ ८ ॥ अन्न दाता चक्षु हीन नहीं होता ॥ ९ ॥ सब प्रकार से अभय देने वाला स्मरण शक्ति युक्त उत्तम बुद्धिवाला होता ॥ १० ॥ बैल युक्त रथ के दान में सब तीर्थों के स्नान का फल होता है ॥ ११ ॥ शय्या दान और उत्तम२ आसनों के दान से स्त्री रणवास की महारानी होती है ॥ १२ ॥ छाता के दान
११२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
दानाद् गृहलाभः ॥ १३ ॥ गृहप्रदो नगरमाप्नोति ॥ १४ ॥ उपानत्प्रदाता यानमासादयति ॥१५॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥१६॥ यत्किंचित्कुरुतेपापं पुरुषोवृत्तिकर्शितः । अपिगोचर्ममात्रेण भूमिदानेनशुध्यति ॥ १७ ॥ विप्रायाऽऽचमनार्थंतु दद्यात्पूर्णकमण्डलुम् । प्रेत्यतृप्तिंपरांप्राप्य सोमपोजायतेपुनः ॥ १८ ॥ अनडुहांसहस्राणां दानानांधुर्यवाहिनाम् । सुपात्रेविधिदत्तानां कन्यादानेनतत्समम् ॥ १९ ॥ त्रीण्याहुरतिदानानि गावःपृथ्वीसरस्वती । आदिदानंहिरण्यानां विद्यादानंततोऽधिकम् ॥ २० ॥ आत्यन्तिकफलप्रदं मोक्षदंबन्धमोचनम् । योगिनांसंमतोविद्वानाचारमनुवर्तते ॥ २१ ॥ श्रद्दधानःशुचिर्दान्तो धारयेच्छृणुयादपि ।
से घर मिलता (घर एक प्रकार का बड़ा छाता जानो) ॥ १३॥ घर देनेवाला नगर का स्वामी होता है ॥ १४ ॥ जूतों का दान करनेवाले को सवारी प्राप्त होती है ॥ १५ ॥ और भी श्लोकों का प्रमाण कहते हैं कि ॥ १६ ॥ जीविका (रोजगार) न मिलने से दुःखित हुआ मनुष्य जो कुछ पाप करता है वह गोचर्म मात्र भूमि के दान से शुद्ध हो जाता है ॥ १७ ॥ आचमन के लिये ब्राह्मण को जो जल से भरा कमण्डलु दान करे वह जन्मान्तर में परम तृप्ति को प्राप्त होकर अग्निष्टोमादि सोमयाग करने वाला होता है ॥ १८ ॥ बलवान् गाड़ी में बोझा ले चलने में समर्थ एक हजार बैलों का दान सुपात्रों को विधिवत् देवे तो कन्यादान के तुल्य पुण्य होता है ॥ १९ ॥
गौ, पृथिवी और विद्या ये तीन दान बड़े हैं । इन में भी सुवर्ण का दान मुख्य है और विद्या का दान सुवर्ण से भी बड़ा है ॥ २० ॥ बन्धन से छुड़ा के मोक्ष देनेवाला होने से विद्या दान अत्यन्त फल देनेवाला है । जो विद्वान् होकर सदाचार पर चलता है वह योगियों का भी मान्य है ॥ २१ ॥ जो धर्म के विचारों को सुने और धारण (स्वीकार) करे आगे वैसा ही करने लगे, मनको
भाषार्थसहिता ॥ ११३
विहायसर्वपापानि नाकपृष्ठेमहीयत,इति ।
नाकपृष्ठेमहीयते । इति ॥ २२ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
धर्मंचरतमाऽधर्मं सत्यंवदतनानृतम् ।
दीर्घंपश्यतमाह्रस्वं परंपश्यतमाऽपरम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणोयज्ञो भवत्यग्निर्वै ब्राह्मणइति श्रुतेः ॥ २ ॥
तच्च कथम् ॥३॥ तत्र सतो ब्राह्मणस्य शरीरं वेदिः संक-
ल्पो यज्ञः पशुरात्मा मनो रशना बुद्धिः सदो मुखमाहवनीयं
नाभ्यामुदरोऽग्निर्गार्हपत्यः प्राणोऽध्वर्युर्पानो होता व्यानो
ब्रह्मा समान उद्गाताऽऽत्मेन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि यएवं
विद्वन्निन्द्रियैरिन्द्रियार्थं जुहोतीति ॥ ४ ॥ अपि च काठके
विज्ञायते ॥ ५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ६ ॥
पानित्रातिचदातार-मात्मानंचैवकिल्विषात् ।
वेदेन्धनसमृद्धेषु हुतंविप्रमुखाग्निषु ॥ ७ ॥
वश में रक्खें, पवित्रता से रहे, तथा श्रद्धालु हो वह सब पापों को त्याग के स्वर्ग के सिंहासन पर पूजा जाता है ॥ २२ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में उनतीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥२९॥
धर्म करो अधर्म नहीं, सत्य बोलो मिथ्या नहीं, दीर्घ दर्शी बनो संकुचित विचार वाले नहीं, परम अविनाशी सब अनित्य पदार्थों में नित्य परम तत्त्व रूप ईश्वर को देखो संसार को नहीं ॥ १ ॥ ब्राह्मण यज्ञ का ही रूप है । “अग्नि ही ब्राह्मण है” ऐसा श्रुति में लिखा है ॥ २ ॥ सो कैसे ? ॥ ३ ॥ उस में सत्पात्र ब्राह्मण का शरीर-वेदि, संकल्प-यज्ञ, पशु-आत्मा, मन-रस्सी, बुद्धि-सदःशाला, मुख-आहवनीय, नाभिस्थल में उदर का जाठराग्नि-गार्हपत्य, प्राण-अध्वर्यु, अपान-होता, व्यान-ब्रह्मा, समान-उद्गाता, इन्द्रियां यज्ञपात्र, जो ऐसा जानता है वह इन्द्रियों के साथ शब्द स्पर्शादि विषयों का होमकर देता है ॥ ४ ॥ और भी कठशाख्य श्रुति से जाना जाता है ॥ ५ ॥ और भी श्लोकों का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ६ ॥ दान लेने वाले और दाता पुरुष को वह दान पाप से रक्षा करता है कि जो वेदरूप ईंधन से प्रज्वलित ब्राह्मणों के मुख रूप अग्नि में होम किया जाता है ॥ ७ ॥ न फैजता, न व्यर्थ हो-
११४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
नस्कन्दतेनव्यथते नैनमध्यापतेञ्चयत् । वरिष्ठमग्निहोत्रात्तु ब्राह्मणस्यमुखेहुतम् ॥ ८ ॥ ध्यानाग्निः सत्योपचयनं क्षान्त्यापुष्टिग्न्रवं त्रिः पुरोडा- शमहिंसा च सन्तोषो यूपःकृच्छ्रं भूतेभ्योऽभयदाक्षिण्यं स्म- तिं कृत्वा क्रतुं मानसं याति क्षयं बुधः ॥६॥ जीर्यन्ति जीर्यतःकेशा दन्ताजीर्यन्तिजीर्यतः । जीवनाशाधनाशाच जोर्यतोऽपिनजीर्यति ॥१०॥ यादुस्त्यजादुर्मतिभिर्यान्नजोर्यतिजीर्यतः । योऽसौप्राणान्तिको व्याधिस्तांतृष्णांत्यजतः सुखमिति॥११॥ नमोस्तुमित्रावरुणयोरुर्वश्यात्मजाय शतयातवे वसिष्ठाय वसिष्ठायेति ॥१२॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ समाप्ताचेयं वसिष्ठस्मृतिः ॥
ता, और न किसी प्रकार के अनिष्ट का कारण होता है (अर्थात् अग्निहोत्र में ऐसी अनेक दिक्कतें होती हैं इस कारण) अग्नि होत्र से बहुत अच्छा यह है कि जो ब्राह्मण के मुख में होम किया गया है ॥ ८ ॥ ध्यान रूप अग्नि, सत्य का संचय, क्षमा से पुष्टि अन्न वा पुरोडाश, अहिंसा-दया, सन्तोष यूप-स्तम्भ, प्राणियों के लिये अभयदान रूप कृच्छ्रव्रत, ऐसा स्मरण करके विद्वान् पुरुष संसार के साथ संबन्ध का त्याग करता हुआ मानस यज्ञ को प्राप्त होता है ॥६॥ वृद्धावस्था में बालश्वेत हो जाते, दांत गिर जाते हैं, परन्तु जीवन की और धन की तृष्णा जीर्ण (बुड्डी) नहीं होती ॥१०॥ जो शरीर के जीर्ण होते हुए भी जीर्ण नहीं होती जो निकृष्ट बुद्धि वालों से कदापि त्यागी नहीं जा सकती तथा जो मरण पर्यन्त साथ में लगी पूरी व्याधि है उस तृष्णा को त्याग ने पर ही सुख हो सकता है ॥११॥ मित्रावरुण देवतों द्वारा उर्वशीदिव्याङ्गना से उत्पन्न हुए शतयातु नामक महर्षि वसिष्ठ को बारंबार नमस्कार प्राप्त हो ॥१२॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के ब्राह्मणसर्वस्व सम्पादक पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में तीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ और यह वसिष्ठस्मृति भी समाप्त हुई॥ ओम्-शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ॥
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