आश्वलायन गृह्यसूत्र (अनाविला टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

आश्वलायन गृह्यसूत्र (अनाविला टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Ashvalayana Grihyasutra Hindi
महर्षि आश्वलायन (टीकाकार: हरदत्त आचार्य) द्वारा
स्रोत: Asvalayana Grihya Sutram with Anavila Commentary by Haradatta (उद्गम)
DevanagariHindipublished292 पृष्ठ
पृष्ठ 16, कुल 292 में से
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| सूत्रम्. | विषयः. |
|---|---|
| ९. | समानदेवत्येषु तुल्यकालेषु बर्हिरादीनां तन्त्रत्वेऽपि प्रधानाहुतीनामतन्त्रता। |
| १०. | पूर्वोक्तार्थस्य प्रामाण्यसिद्धये यज्ञगाथोदाहरणम्। |
चतुर्थः खण्डः।
| सूत्रम्. | विषयः. |
|---|---|
| १. | चौलादिकर्मणां कालविधानम्। |
| २. | केषाञ्चिन्मते विवाहस्य सार्वकालिकत्वम्। |
| ३. | आज्यहोमः। |
| ४. | ऋग्भिर्व्याहृतिभिश्च होमविधानम्। |
| ५. | केषाञ्चिन्मते अष्टानामाहुतीनां समुच्चयविधानम्। |
| ६. | अनादेशाहुतिविधानम्। |
| ७. | विवाहे 'त्वमर्यमा अवसी'त्यादिमन्त्रेण चतुर्थ्या आहुतेर्विधानम्। |
| ८. | प्रथमं कुलपरीक्षा। |
| ९. | वरगुणः। |
| १०. | कन्यागुणः। |
| ११. | लक्षणानां दुर्ज्ञेयत्वम्। |
| १२. | क्षेत्राद्याहृतैरष्टभिर्मृत्पिण्डैः कन्यापरीक्षणम्। |
| १३–२०. | कन्यया मृत्पिण्डानां ग्रहणे प्रत्येकं फलकथनम्। |
| २१. | ब्राह्मविवाहः। |
| २२. | ब्राह्मोढायां जातस्योभयकुलपञ्चविंशतिपुरुषोत्तारकत्वम्। |
| २३. | दैवविवाहः। |
| २४. | दैवोढायां जातस्यैकविंशतिपुरुषोत्तारकत्वम्। |
| २५. | प्राजापत्यविवाहः। |
| २६. | प्राजापत्योढायां जातस्य सप्तदशपुरुषोत्तारकत्वम्। |
| २७. | आर्षविवाहः। |
| २८. | आर्षोढायां जातस्य पञ्चदशपुरुषोत्तारकत्वम्। |