अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 182, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसद् भूम्याः समभवत् तद् यामेति महद् व्यचः. तद् वै ततो विधूपायत् प्रत्यक् कर्तारमृच्छतु.. (६) हे ओषधि! तेरे पास से निकल कर महान् तेज जिस भूमि तक जाता है, वहां गाड़ी गई कृत्या किसी को हानि नहीं पहुंचा सकती. तू अपने स्थान से निकल कर विशेष रूप से प्रज्वलित होती हुई कृत्या के निर्माण करने वाले को पीड़ा पहुंचा. (६) प्रत्यङ् हि संबभूविथ प्रतीचीनफलस्त्वम्. सर्वान् मच्छपथाँ अधि वरीयो यावया वधम्.. (७) हे आत्माभिमुख फल देने वाले अपामार्ग! तू शत्रु के विनाश को मुझ से दूर कर के उसी के पास भेज दे. शत्रु द्वारा मेरे प्रति किए गए हिंसा साधनों और कृत्या को तू मुझ से दूर कर. (७) शतेन मा परि पाहि सहस्रेणाभि रक्ष मा. इन्द्रस्ते वीरुधां पत उग्र ओज्मानमा दधत्.. (८) हे सहदेवी अथवा अपामार्ग! तू सैकड़ों और हजारों उपायों से मेरी रक्षा कर और मुझे कृत्या के दोष से छुड़ा. हे लतारूपी जड़ीबूटियों की स्वामिनी! महा तेजस्वी इंद्र तेरा तेज मुझ में स्थापित करें. (८) सूक्त-२० देवता—जड़ीबूटी आ पश्यति प्रति पश्यति परा पश्यति पश्यति. दिवमन्तरिक्षमाद् भूमिं सर्वं तद् देवि पश्यति.. (१) हे सदापुष्पा नाम की जड़ीबूटी! यह पुरुष तेरी मणि को धारण करने वाला होने से आने वाले भय के कारण को, वर्तमान भय के कारण को तथा भविष्य काल में होने वाले भय के कारण को देखता है और दूर करना जानता है. यह स्वर्ग, अंतरिक्ष एवं पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी प्राणियों को मणि धारण के कारण देखता है. (१) तिस्रो दिवस्तिस्रः पृथिवीः षट् चेमाः प्रदिशः पृथक्. त्वयाहं सर्वा भूतानि पश्यानि देव्योषधे.. (२) हे सदापुष्पा जड़ीबूटी! तेरी मणि को धारण करने के प्रभाव से मैं तीन स्वर्गों, तीन पृथ्वियों, छह प्रदिशाओं, अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे तथा इन सब में रहने वाले सभी प्राणियों को जानता हूं. (२) दिव्यस्य सुपर्णस्य तस्य हासि कनीनिका. सा भूमिमा रुरोहिथ वह्यं श्रान्ता वधूरिव.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*