अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे सदापुष्पा जड़ीबूटी! तू दिव्य गरुड़ की कनीनिका अर्थात् आंख की पुतली के समान है. तू गरुड़ के नेत्र से निकल कर धरती पर उसी प्रकार उगी है, जिस प्रकार थकान के कारण चलने में असमर्थ वधू सवारी पर बैठ जाती है. (३) तां मे सहस्राक्षो देवो दक्षिणे हस्त आ दधत्. तयाहं सर्वं पश्यामि यश्च शूद्र उतार्थः.. (४) हजार आंखों वाले इंद्र देव ने उस सदा पुष्पा को मेरे दाहिने हाथ में धारण कराया है. तेरे प्रभाव से मैं सब को देखता और वश में करता हूं, चाहे वह शूद्र हो अथवा आर्य अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य. (४) आविष्कृणुष्व रूपाणि मात्मानमप गूहथाः. अथो सहस्रचक्षो त्वं प्रति पश्याः किमीदिनः.. (५) हे ओषधि! तू अपने राक्षस, पिशाच आदि को दूर करने वाले रूप को प्रकाशित कर तथा अपने स्वरूप को मत छिपा. हे जड़ीबूटी! हमारी रक्षा के लिए उन राक्षसों की प्रतीक्षा कर जो छिपे हुए रूप से यह खोजते हुए घूमते हैं कि यह क्या है, यह क्या है? (५) दर्शय मा यातुधानान् दर्शय यातुधान्यः. पिशाचान्त्सर्वान् दर्शयेति त्वा रभ ओषधे.. (६) हे सदापुष्पा जड़ी! मुझे राक्षसों एवं राक्षसियों के दर्शन कराओ. वे गूढ़ रूप से मुझे बाधा न पहुंचा सकें. मैं तुम्हें इसीलिए धारण करता हूं कि तुम मुझे सभी पिशाचों को दिखाओ. (६) कश्यपस्य चक्षुरसि शुन्याश्च चतुरक्ष्याः. वीध्रे सूर्यमिव सर्पन्तं मा पिशाचं तिरस्करः.. (७) हे सदापुष्पा जड़ी! तू महर्षि कश्यप एवं चार आंखों वाली देवशुनी सरमा की आंख है अर्थात् उन की आंख के समान आकृति वाली है. अंतरिक्ष में सूर्य जिस प्रकार विचरण करते हैं, उसी प्रकार चलतेफिरते पिशाचों को तू मुझ से मत छिपा. (७) उदग्रभं परिपाणाद् यातुधानं किमीदिनम्. तेनाहं सर्वं पश्याम्युत शूद्रमुतार्यम्.. (८) खोज करने के लिए घूमते हुए राक्षसों को मैं ने अपनी रक्षा की दृष्टि से वश में कर लिया है. उस पिशाच की सहायता से मैं शूद्र एवं ब्राह्मण जाति वाले ग्रह को देखता हूं. (८) यो अन्तरिक्षेण पतति दिवं यश्चातिसर्पति. भूमिं यो मन्यते नाथं तं पिशाचं प्र दर्शय.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*