अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 211, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअंगार रूप लौकिक अग्नि में प्रवेश कर के देवता रूप अग्नि संचरण करते हैं. अथवा, अंगिरा आदि ऋषियों के पुत्र हमें आरोप के रूप में प्राप्त पाप से बचाएं. मैं नमस्कार के साथ अन्न से तुम्हारे निमित्त हवन करता हूं. हम देवों के भाग हवि को मिथ्या न करें. (९) हृदा पूतं मनसा जातवेदो विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. सप्तास्यानि तव जातवेदस्तेभ्यो जुहोमि स जुषस्व हव्यत्.. (१०) हे जातवेद अग्नि! मैं तुम्हारे लिए हृदय और मन से पवित्र हवि का हवन करता हूं. हे देव! तुम सभी ज्ञानों को जानते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे सात मुख हैं. उन मुखों के लिए मैं घी का हवन करता हूं. तुम मेरे हव्य को स्वीकार करो. (१०) सूक्त-४० देवता—जातवेद ये पुरस्ताज्जुह्वति जातवेदः प्राच्या दिशोऽभिदासन्त्यस्मान्. अग्निमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (१) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु पूर्व दिशा में हवन करते हुए हम पर जादूटोने तथा पूर्व दिशा से हमारी हिंसा करना चाहते हैं, अग्नि में गिर कर हमारे वे विरोधी दुःखी हों. हम उन के द्वारा किए गए जादूटोने को वापस लौटा कर उन्हें मारते हैं. (१) ये दक्षिणतो जुह्वति जातवेदो दक्षिणाया दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. यममृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (२) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान की दक्षिण दिशा में हवन कर के जादूटोना कर रहे हैं, वे दक्षिण दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल जाएं. इन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने को उन्हीं की ओर लौटा कर मारते हैं. (२) ये पश्चाज्जुह्वति जातवेदः प्रतीच्या दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. वरुणमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (३) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान की पश्चिम दिशा में हवन कर के जादूटोना कर रहे हैं, वे पश्चिम दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने को उन्हीं की ओर लौटा कर मारते हैं. (३) य उत्तरतो जुह्वति जातवेद उदीच्या दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. सोममृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (४) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान की उत्तर दिशा में हवन कर के जादूटोना ebook converter DEMO Watermarks*