भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 254

हे ज्वर! तू खांसी और शक्ति क्षीण करने वाले रोगों को हमारा मित्र मत बना. मैं तुझसे बारबार निवेदन करता हूं कि तू उस निचले स्थान से यहां मत आ. (११) तक्मन् भ्रात्रा बलासेन स्वस्रा कासिकया सह. पाप्मा भ्रातृव्येण सह गच्छामुमरणं जनम्.. (१२) हे ज्वर! शक्ति क्षीण करने वाले रोग तुम्हारे भाई और खांसी तुम्हारी बहन है. पाप तुम्हारा भतीजा है. इन सब के साथ तुम दुष्ट पुरुष के पास जाओ. (१२) तृतीयकं वितृतीयं सदन्दिमुत शारदम्. तक्मानं शीतं रूरं ग्रैष्मं नाशय वार्षिकम्.. (१३) हे देव! तिजारी, चौथइया, वर्षा संबंधी, शरद, ग्रीष्मकाल में होने वाले ज्वर के साथसाथ शीत ज्वर का विनाश करो. (१३) गन्धारिभ्यो मूजवद्भ्यो ऽ ङ्गेभ्यो मगधेभ्यः. प्रैष्यन् जनमिव शेवधिं तक्मानं परि दद्मसि.. (१४) हम मूंज वाले स्थान से, अंग देश से, मध्य देश से और गांधार देश से कष्ट वाले रोग ज्वर को भगाते हुए सुखी बनते हैं. (१४) सूक्त-२३ देवता—इंद्र ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती. ओतौ म इन्द्रश्चाग्निश्च क्रिमिं जम्भयतामिति.. (१) द्यावा पृथ्वी, सरस्वती देवी, इंद्र और अग्नि मुझ में ओतप्रोत हैं. वे कृमियों का विनाश करें. (१) अस्येन्द्र कुमारस्य क्रिमीन् धनपते जहि. हता विश्वा अरातय उग्रेण वचसा मम.. (२) हे धन के स्वामी इंद्र! इस बालक के शत्रु रूप कृमियों का विनाश करो. इन्हें मेरे उग्र वचनों के साथ पूरी तरह नष्ट करो. (२) यो अक्ष्यौ परिसर्पति यो नासे परिसर्पति. दतां यो मध्यं गच्छति तं क्रिमिं जम्भयामसि.. (३) जो कृमि आंखों में घूमते हैं जो नाखूनों में चलतेफिरते हैं तथा जो दांतों के मध्य निवास करते हैं, उन कृमियों को हम नष्ट करते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*