अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंबृहस्पते ब्रह्मणा याह्यर्वाङ् यज्ञो अयं स्वरिदं यजमानाय स्वाहा.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! तुम बृहस्पति देव एवं मंत्रों के साथ इस यज्ञ की वृद्धि करते हुए हमारे सामने आओ. यह यज्ञ यजमान के हेतु कल्याण करने वाला हो. यह आहुति अश्विनीकुमारों एवं बृहस्पति के हेतु उत्तम हो. (१२) सूक्त-२७ देवता—अग्नि ऊर्ध्वा अस्य समिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोचींष्यग्नेः. द्युमत्तमा सुप्रतीकः ससूनूस्तनूनपादसूरो भूरिपाणिः.. (१) अग्नि की समिधाएं ऊंची और वीर्य तेजयुक्त होते हैं. यह अत्यंत प्रदीप्त, सुंदर एवं सूर्य के समान है. प्राणदाता अग्नि का यज्ञों में बहुत सहयोग रहता है. (१) देवो देवेषु देवः पथो अनक्ति मध्वा घृतेन.. (२) अग्नि देव सभी देवों में श्रेष्ठ हैं और मधु से मार्गों का शोधन करते हैं. (२) मध्वा यज्ञं नक्षति प्रैणानो नराशंसो अग्निः सुकृद् देवः सविता विश्ववारः. (३) सुंदर कर्म करने वाले तथा सभी मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय सविता देव तथा संसार के द्वारा वरण करने योग्य अग्नि देव यज्ञ को मधुयुक्त करते हुए व्याप्त होते हैं. (३) अच्छायमेति शवसा घृता चिदीडानो वह्निर्नमसा.. (४) घृत एवं हव्य अन्न के सहित स्तुतियों को प्राप्त करने वाले अग्नि देव सामने से आते हैं. (४) अग्निः स्रुचो अध्वरेषु प्रयक्षु स यक्षदस्य महिमानमग्नेः.. (५) यज्ञों में देवों की संगति करने वाले अग्नि देव इस यज्ञ की महिमा और स्रुवों को अपने से युक्त करें. (५) तरी मन्द्रासु प्रयक्षु वसवश्चातिष्ठन् वसुधातरश्च.. (६) देवों की संगति करने वाले एवं हर्ष उत्पन्न करने वाले यज्ञों में तारक और धन को बढ़ाने वाले वरुण देवता निवास करते हैं. (६) द्वारो देवीरन्वस्य विश्वे व्रतं रक्षन्ति विश्वहा.. (७) eBook converter DEMO Watermarks*