भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 264

अग्नि की तेजस्विनी लपटें यजमान के व्रत की सभी प्रकार से रक्षा करती हैं. (७) उरुव्यचसाग्नेर्धाम्ना पत्यमाने. आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्तेमं यज्ञमवतामध्वरं न:.. (८) महत्त्व वाले तथा गतिशील अग्नि देव इस यज्ञ में तेज को ऐश्वर्यपूर्ण एवं आहुति की दीप्ति का संपादन करते हैं. (८) दैवा होतार ऊर्ध्वमध्वरं नो ऽ ग्नेर्जिह्वयाभि गृणत गृणता नः स्विष्टये. तिस्रो देवीर्बहिरेिदं सदन्तामिडा सरस्वती मही भारती गृणाना.. (९) हे होताओ! यज्ञ की इस अग्नि की प्रशंसा करो. इस से हमारा कल्याण होगा. पृथ्वी, अग्नि और सरस्वती—ये तीनों देवियां प्रशंसा करती हुई कुश पर विराजमान हों. (९) तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरुक्षु. देव त्वष्टा रायस्पोषं वि ष्य नाभिमस्य.. (१०) हे त्वष्टा देव! हमारे जल, अन्न और धन की पुष्टि करते हुए तुम इस स्त्री की नाभि खोल दो. (१०) वनस्पते ऽ व सृजा रराणः. त्मना देवेभ्यो अग्निर्हव्यं शमिता स्वदयतु.. (११) हे वनस्पति! तुम शब्द करती हुई अपनेआप को इस यज्ञ में छोड़ो तथा अग्नि इस हवि को देवों के लिए स्वादिष्ट बनाएं. (११) अग्ने स्वाहा कृणुहि जातवेदः. इन्द्राय यज्ञं विश्वे देवा हविरिदं जुषन्ताम्.. (१२) हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! इंद्र के निमित्त इस यज्ञ को संपन्न करो. सभी देव इस हवि को ग्रहण करें. (१२) सूक्त-२८ देवता—त्रिवृत्त अग्नि नव प्राणान्नवभिः सं मिमीते दीर्घायुत्वाय शतशारदाय. हरिते त्रीणि रजते त्रीण्ययसि त्रीणि तपसाविष्ठितानि.. (१) हम सौ वर्ष की आयु पाने के लिए नव प्राणों को इन तीन से संयुक्त करते हैं. इन नौ में सोने, चांदी और लोहे के तीनतीन धागे अर्थात् तार हैं जो उष्णता लिए हुए हैं. (१) अग्निः सूर्यश्चन्द्रमा भूमिरापो द्यौरन्तरिक्षं प्रदिशो दिशश्च. ebook converter DEMO Watermarks*

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