अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 324, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा वृत्र इमा आपस्तस्तम्भ विश्वधा यतीः. एवा ते अग्निना यक्ष्मं वैश्वानरेण वारये.. (३) त्वष्टा का पुत्र वृत्रासुर जिस प्रकार स्थावर और जंगम विश्व का पोषण करने वाले इन मेघों के जलों की गति रोकता है, हे रोगी! मैं वैश्वानर अग्नि की सहायता से तेरे यक्ष्मा रोग का उसी प्रकार निवारण करता हूं. (३) सूक्त-८६ देवता—एक वृष वृषेन्द्रस्य वृषा दिवो वृषा पृथिव्या अयम्. वृषा विश्वस्य भूतस्य त्वमेकवृषो भव.. (१) यह पुरुष इंद्र की कृपा से सेचन समर्थ हो. यह द्युलोक एवं पृथ्वीलोक में श्रेष्ठ बने. हे श्रेष्ठता के इच्छुक पुरुष! तू संसार के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बन. (१) समुद्र ईशे स्रवतामग्निः पृथिव्या वशी. चन्द्रमा नक्षत्राणामीशे त्वमेकवृषो भव.. (२) सागर बहने वाले जलों का स्वामी है. अग्नि देव पृथ्वी के स्वामी हैं. चंद्रमा नक्षत्रों का स्वामी है. तुम सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बनो. (२) सम्राडस्यसुराणां ककुन्मनुष्याणाम्. देवानामधर्धभागसि त्वमेकवृषो भव.. (३) हे इंद्र! तुम असुरों के स्वामी हो. तुम बैल की ठाट के समान सभी मनुष्यों में उन्नत बनो. हे इंद्र! सभी देव मिल कर तुम्हारे बराबर होते हैं. हे श्रेष्ठता के इच्छुक मनुष्य! तू इंद्र की कृपा से सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बन. (३) सूक्त-८७ देवता—ध्रुव आ त्वाहार्षमन्तर भूर्ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलत्. विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्.. (१) हे राजन्! हम तुम्हें अपने राष्ट्र में लाए हैं! तुम हमारे मध्य हमारे स्वामी बनो. तुम चंचलता रहित हो कर राज्य के अधिकार पर दृढ़ बनो. सभी प्रजाएं तुम्हें चाहें. यह राष्ट्र तुम्हारे अधिकार से भ्रष्ट न हो. (१) इहैवैधि मा स प च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलत्. इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*