अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहे राजन्! तुम इसी राज्य सिंहासन पर सदा वर्तमान रहो. इस से कभी वंचित न बनो. तुम पर्वत के समान निश्चल हो कर इंद्र के समान इसी राष्ट्र में स्थिर रहो. तुम अपने इस राष्ट्र को धारण करो. (२) इन्द्र एतमदीधरद् ध्रुवं ध्रुवेण हविषा. तस्मै सोमो अधि ब्रवदयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (३) स्थिरता प्रदान करने वाले हमारे द्वारा दिए हुए हवि से संतुष्ट इंद्र ने इस राष्ट्र में इस राजा को स्थिर रूप से स्थापित किया है. सोम ने इस राजा को अपना कहा है. वेद राशि का पालन करने वाले ब्रह्म देव यही कहें. (३) सूक्त-८८ देवता—ध्रुव ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत्. ध्रुवासः पर्वता इमे ध्रुवो राजा विशामयम्.. (१) आकाश जिस प्रकार स्थित है, यह पृथ्वी जिस प्रकार ध्रुव दिखाई देती है. यह दिखाई देता हुआ विश्व जिस प्रकार ध्रुव है तथा ये सभी पर्वत जिस प्रकार स्थिर हैं, प्रजाओं का स्वामी यह राजा भी उसी प्रकार स्थिर हो. (१) ध्रुवं ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः. ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम्.. (२) हे राजन्! राजा वरुण तुम्हारे राज्य को स्थिर करें. प्रकाश करते हुए बृहस्पति तुम्हारे राष्ट्र को ध्रुव बनाएं. इंद्र और अग्नि तुम्हारे राष्ट्र को स्थिर बनाएं. (२) ध्रुवो ऽ च्युतः प्र मृणीहि शत्रूनूछत्रूयतो ऽ धरान् पादयस्व. सर्वा दिशः संमनसः सध्रीचीर्ध्रुवाय ते समितिः कल्पतामिह.. (३) हे राजन्! तुम इस राष्ट्र में स्थिर और अच्युत रह कर शत्रुओं का विनाश करो तथा शत्रुओं के समान आचरण करने वाले अन्य जनों को भी अधोमुख गिराओ. सभी दिशाएं सौमनस्य वाली बन कर तुम्हारी सेवा में लगें. तुम्हारा यह आयोजन सभी दिशाओं में तुम्हें स्थिरता प्रदान करने में समर्थ हो. (३) सूक्त-८९ देवता—मंत्रों में बताए गए इदं यत् प्रेण्यः शिरो दत्तं सोमेन वृष्ण्यम्. ततः परि प्रजातेन हार्दिं ते शोचयामसि.. (१) मुझ प्रेम प्राप्त करने वाले का जो यह शक्ति प्रदान करने वाला शीश है, वह मुझे सोम ने