अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 498, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयजमान बारह दिन तक चलने वाले यज्ञ के द्वारा स्वर्ग में जितना समृद्धि पूर्ण स्थान पाता है, वही अतिथि की सेवा के द्वारा पा सकता है. (८) स य एवं विद्वानुदकमुपसिच्योपहरति.. (९) जो इस बात को जानता है, वह जल का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता है. (९) प्रजानां प्रजननाय गच्छति प्रतिष्ठां प्रियः प्रजानां भवति य एवं विद्वानुदकमुपसिच्योपहरति.. (१०) जो इस बात को जानता है और जल का उपसेचन कर के अतिथि के हेतु भोजन लाता है, वह संतान को जन्म देने की क्षमता प्राप्त करता है, प्रतिष्ठा पाता है और प्रजाओं का प्रिय बनता है. (१०) सूक्त-१० देवता—अतिथि, विद्या तस्मा उषा हिङ्कृणोति सविता प्र स्तौति.. (१) उषा उस के लिए हुंकार करती है और सूर्य उस की स्तुति करता है. (१) बृहस्पतिरूर्जयोद् गायति त्वष्टा पुष्ट्या प्रति हरति विश्वे देवा निधनम्.. (२) अन्न के रस से उत्पन्न ऊर्जा से बृहस्पति उदगायन करते हैं, त्वष्टा पुष्टि प्रदान करते हैं और विश्वे देव पूर्णता प्रदान करते हैं. (२) निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (३) जो इस बात को जानता है, वह सेवकों, संतानों और पशुओं के पालन की पूर्णता प्राप्त करता है. (३) तस्मा उद्यन्सूर्यो हिङ्कृणोति संगवः प्र स्तौति.. (४) उदय होते हुए सूर्य उस के लिए हुंकार करते हैं और किरणों वाले सूर्य उस की प्रशंसा करते हैं. (४) मध्यन्दिन उद्गायत्यपराह्नः प्रति हरत्यस्तंयन् निधनम्. निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (५) सूर्य माध्यंदिन अर्थात् दोपहर के समय उस की प्रशंसा करते हैं और दोपहर के बाद उस ebook converter DEMO Watermarks*