अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 504, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपैनं विश्वरूपाः सर्वरूपाः पशवस्तिष्ठन्ति य एवं वेद.. (२६) जो इस बात को जानता है, वह सारे संसार के सभी रूपों वाले पशुओं का स्वामी बनता है. (२६) सूक्त-१३ देवता—सर्व शीर्षामय दूरीकरण शीर्षक्तिं शीर्षामयं कर्णशूलं विलोहितम्. सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (१) हम तेरे शीश के रोगों अर्थात् शीर्षोक्ति, शीर्षामय और कर्ण शूल तथा विलोहित को तुझ से दूर करते हैं. (१) कर्णाभ्यां ते कङ्कूषेभ्यः कर्णशूलं विसल्पकम्. सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (२) मैं तेरे कानों से तथा कानों के गड़ढों से कर्णशूल अर्थात् कानों के दर्द को तथा विसल्पक (विशेष कष्ट देने वाले)को दूर करता हूं. इस प्रकार मैं तेरे शीश संबंधी सभी रोगों को दूर करता हूं. (२) यस्य हेतोः प्रच्यवते यक्ष्मः कर्णात आस्यतः. सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (३) जिस सिर रोग के कारण यक्ष्मा रोग, कानों और मुख से प्रकाश में आता है, हम तेरे उस सिर रोग को पूर्णतया बाहर निकालते हैं. (३) यः कृणोति प्रमोतमन्धं कृणोति पूरुषम्. सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (४) जो रोग पुरुष को शक्तिहीन बनाता है और अंधा कर देता है, तेरे उन सभी शीश संबंधी रोगों को मैं तुझ से बाहर निकालता हूं. (४) अङ्गभेदमङ्गञ्च्वरं विश्वाङ्ग्यं विसल्पकम्. सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (५) अंग भेद, अंग ज्वर, विश्वांग्य एवं विसल्पक—ये सभी शीश संबंधी रोग हैं. हम इन्हें पूर्ण रूप से तुझ से दूर करते हैं. (५) यस्य भीमः प्रतीकाश उद्वेपयति पूरुषम्. ebook converter DEMO Watermarks*