अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 505, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंतक्मानं विश्वशारदं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (६) जिस का भयानक आवेश मनुष्य को कंपित कर देता है, शरद ऋतु में होने वाले उस ज्वर को हम तुझ से पूर्ण रूप से दूर करते हैं. (६) य ऊरू अनुसर्पत्यथो एति गवीनिके. यक्ष्मं ते अन्तरङ्गेभ्यो बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (७) जो गवीनिका नाम की नाड़ियों में तथा जंघाओं में घूमता है, उस यक्ष्मा रोग को हम तेरे अंतरंग अंगों से बाहर निकालते हैं. (७) यदि कामादपकामाद्धृदयाज्जायते परि. हृदो बलासमङ्गेभ्यो बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (८) हृदय की शक्ति कम करने वाला जो रोग काम के वश में होने अथवा न होने से उत्पन्न होता है, उस बलास (कफ) रोग को हम तेरे अंगों से बाहर निकालते हैं. (८) हरिमाणं ते अङ्गेभ्यो ऽ प्वामन्तरोदरात्. यक्ष्मोधामन्तरात्मनो बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (९) हम तेरे अंगों से हरिमा (रक्तहीनता) रोग को, तेरे उदर से अप्वा (जलोदर) रोग को तथा तेरी अंतरात्मा से यक्ष्मा रोग को पूर्णतया बाहर निकालते हैं. (९) आसो बलासो भवतु मूत्रं भवत्वामयत्. यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१०) बलास रोग नष्ट हो तथा मूत्र रोग समाप्त हो. सभी रोगों का विष यक्ष्मा रोग है, उसे मैं तुझ से दूर करता हूं. (१०) बहिर्बिलं निर्द्रवतु काहाबाहं तवोदरात्. यक्ष्माणां सर्वेषां विष निरवोचमहं त्वत्.. (११) काहावाह नामक (फड़फड़ाने वाला) रोग तेरे पेट से बाहर निकल जाए. मैं सभी प्रकार के यक्ष्मा रोगों के विष को तुझ से बाहर करता हूं. (११) उदरात् ते क्लोम्नो नाभ्या हृदयादधि. यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१२) हम तेरे उदर से, क्लोम से, नाभि से और हृदय से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालते हैं जो सभी विषों का विष है. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*