अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 506, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयाः सीमानं विरुजन्ति मूर्धानं प्रत्यर्षणीः. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१३) जो अंडकोषों को पीड़ित करने वाली एवं मस्तक का निर्माण करने वाली हड्डियां विकार रहित हैं, वे तेरे शरीर का त्याग न करें. (१३) या हृदयमुपर्षन्त्यनुतन्वन्ति कीकसाः. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१४) कीकस नाम की जो अस्थियां हृदय के ऊपरी और निचले भाग में फैली हुई हैं, वे रोग रहित अस्थियां हिंसा न करती हुई तुम्हारे शरीर से बाहर न जाएं. (१४) याः पार्श्वे उपर्षन्त्यनुनिष्खन्ति पृष्टीः. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१५) जो अस्थियां दोनों पसलियों की ओर जाती हैं तथा पीठ वाले भाग को सशक्त बनाती हैं, वे रोगरहित रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१५) यास्तिरश्चीरुपर्षन्त्यर्षणीर्वक्षणासु ते. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१६) जो अस्थियां तिरछी स्थित हैं एवं वक्षणाओं (पेड़ू और जांघों के बीच के भाग) से संबंधित हैं, वे तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई एवं नीरोग रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१६) या गुदा अनुसर्पन्त्यान्त्राणि मोहयन्ति च. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१७) गुदा के पीछे फैली एवं आंतों को सहारा देने वाली जो अस्थियां हैं, वे रोग रहित रहती हुई तथा तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१७) या मज्ज्ञो निर्धयन्ति परूंषि विरुजन्ति च. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१८) जो अस्थियां गांठों का निर्माण करती हैं तथा जो मज्जा अर्थात् चर्बी से स्निग्ध होती हैं, वे तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई और नीरोग रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१८) ये अङ्गानि मदयन्ति यक्ष्मासो रोपणास्तव. यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१९) मैं ने तुझे वे सभी ओषधियां बता दी हैं जो अंगों को स्वस्थ बनाती हैं एवं यक्ष्मा रोग को ebook converter DEMO Watermarks*