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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

याः सीमानं विरुजन्ति मूर्धानं प्रत्यर्षणीः. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१३) जो अंडकोषों को पीड़ित करने वाली एवं मस्तक का निर्माण करने वाली हड्डियां विकार रहित हैं, वे तेरे शरीर का त्याग न करें. (१३) या हृदयमुपर्षन्त्यनुतन्वन्ति कीकसाः. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१४) कीकस नाम की जो अस्थियां हृदय के ऊपरी और निचले भाग में फैली हुई हैं, वे रोग रहित अस्थियां हिंसा न करती हुई तुम्हारे शरीर से बाहर न जाएं. (१४) याः पार्श्वे उपर्षन्त्यनुनिष्खन्ति पृष्टीः. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१५) जो अस्थियां दोनों पसलियों की ओर जाती हैं तथा पीठ वाले भाग को सशक्त बनाती हैं, वे रोगरहित रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१५) यास्तिरश्चीरुपर्षन्त्यर्षणीर्वक्षणासु ते. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१६) जो अस्थियां तिरछी स्थित हैं एवं वक्षणाओं (पेड़ू और जांघों के बीच के भाग) से संबंधित हैं, वे तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई एवं नीरोग रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१६) या गुदा अनुसर्पन्त्यान्त्राणि मोहयन्ति च. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१७) गुदा के पीछे फैली एवं आंतों को सहारा देने वाली जो अस्थियां हैं, वे रोग रहित रहती हुई तथा तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१७) या मज्ज्ञो निर्धयन्ति परूंषि विरुजन्ति च. अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१८) जो अस्थियां गांठों का निर्माण करती हैं तथा जो मज्जा अर्थात् चर्बी से स्निग्ध होती हैं, वे तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई और नीरोग रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१८) ये अङ्गानि मदयन्ति यक्ष्मासो रोपणास्तव. यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१९) मैं ने तुझे वे सभी ओषधियां बता दी हैं जो अंगों को स्वस्थ बनाती हैं एवं यक्ष्मा रोग को ebook converter DEMO Watermarks*

समाप्त करती हैं. मैं ने यक्ष्मा रोग के समस्त विषों का निवारण करने वाली ओषधियां भी तुझे बता दी हैं. (१९) विसल्पस्य विद्रधस्य वातीकारस्य वालजेः. यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (२०) मैं तेरे लिए विसल्प (पीड़ा), विद्ध (सूजन), वातीकार एवं वालजि (संधि) नामक समस्त यक्ष्मा रोगों के विषयों को नष्ट करने वाले मंत्रों का उच्चारण कर चुका हूं. (२०) पादाभ्यां ते जानुभ्यां श्रोणिभ्यां परि भंससः. अनूकादर्षणीरुष्णिहाभ्यः शीर्ष्णो रोगमनीनशम्.. (२१) मैं ने तेरी जंघाओं, पैरों, घुटनों, अनूक, उष्णिहा एवं शीश संबंधी समस्त रोगों का विनाश कर दिया है. (२१) सं ते शीर्ष्णः कपालानि हृदयस्य च यो विधुः. उद्यन्नादित्य रश्मिभिः शीर्ष्णो रोगमनीनशो ऽ ङ्गभेदमशीशमः.. (२२) तेरे शीश पर

इमं रथमधि ये सप्त तस्थुः सप्तचक्रं सप्त वहन्त्यश्वाः. सप्त स्वसारो अभि सं नवन्त यत्र गवां निहिता सप्त नामा.. (३) सूर्य के सात पहियों वाले रथ को सात घोड़े खींचते हैं. सात ऋषि इस रथ के समीप खड़े रहते हैं. सात बहनें सूर्य की स्तुति करती हैं. किरणों रूपी सात गाएं सूर्य के रथ से संबंधित हैं, जो इसे रस युक्त बनाती हैं. (३) को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति. भूम्या असुरसृगात्मा क्वस्वित् को विद्वांसमुप गात् प्रष्टुमेतत्.. (४) सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाले अस्थिरहित को किस ने देखा था जो समस्त विश्व को धारण करता है? भूमि को प्राणवंत करने वाले जल की आत्मा कहां स्थित है? इस बात को पूछने के लिए विद्वान् के समीप कौन गया था? (४) इह ब्रवीतु य ईमङ्ग वेदास्य वामस्य निहितं पदं वेः. शीर्ष्णः क्षीरं दुहते गावो अस्य वव्रिं वसाना उदकं पदा ऽ पुः.. (५) इन सूर्य के विषय में जो जानता हो, वह बताए कि इन के चरण आकाश में कहां स्थित हैं? गाएं इन्हीं सूर्य के मंडल में दूध दुहाती हैं तथा वे गाएं इन्हीं सूर्य की किरणों के द्वारा जल पीती हैं. (५) पाकः पृच्छामि मनस ऽ विजानन् देवानामेना निहिता पदानि. वत्से बष्कये ऽ धि सप्त तन्तून् वि तत्निरे कवय ओतवा उ.. (६) सूर्य के रूप को पूर्ण रूप से न जानता हुआ मैं अपने मन से पूछता हूं कि समस्त देवों के रक्षासाधन इन सूर्य में ही निहित हैं. विद्वानों ने सूर्य देव के विस्तार के हेतु सात तंतु स्थापित कर दिए हैं. (६) अचिकित्वांश्र्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मनो न विद्वान्. वि यस्तस्तम्भ षडिमा रजांस्यजस्य रूपे किमपि स्विदेकम्.. (७) अज्ञानी मैं विद्वानों और ज्ञानियों से पूछता हूं कि जिस ने छः रजोगुणी तत्त्वों को स्तंभित किया है, वह अजन्मा क्या एक ही है? मैं संदेह में पड़ा हूं. और संदेहरहित जनों से अपना संदेह निवारण करना चाहता हूं. (७) माता पितरमृत आ बभाज धीत्यग्रे मनसा सं हि जग्मे. सा बीभत्सुर्गर्भरसा निविद्धा नमस्वन्त इदुपवाकमीयुः.. (८) सूर्य के जन्म लेते समय ही उन की माता उन के पिता की सेवा करती है. इस के फल स्वरूप वह बुद्धि और मन से युक्त हो जाती है एवं गर्भरूपी रस से निबद्ध हो जाती है. हवि ebook converter DEMO Watermarks*

का अन्न लिए हुए मनुष्य इस कथा के समीप पहुंच जाते हैं. (८) युक्ता मातासीद् धुरिदक्षिणाया अतिष्ठद् गर्भो वृजनीष्वन्तः. अमीमेद् वत्सो अनु गामपश्यद् विश्वरूप्यं त्रिषु योजनेषु.. (९) माता दक्षिण दिशा में स्थित हुई. इस के पश्चात बलवती नारियों में गर्भ स्थापित हुआ. जन्म लेने के पश्चात बछड़ा गाय की ओर देखता हुआ रंभाने लगा. विश्वरूप तीन योजनों में व्याप्त हुआ. (९) तिस्रो मातृस्त्रीन् पितॄन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्त. मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वविदो वाचमविश्वविन्नाम्.. (१०) तीन माताओं और तीन पिताओं को धारण करता हुआ सूर्य इन के मध्य में स्थित है. विश्व का ज्ञान रखने वाले आकाश के पृष्ठ पर यही वाणी बोलते हैं, जिसे दूसरे लोग नहीं सुन पाते. (१०) पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने यस्मिन्नातस्थुर्भुवनानि विश्वा. तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न च्छिद्यते सनाभिः.. (११) पांच अरों वाला पहिया चलता है. उस में समस्त भुवन स्थित हैं. उस के अधिक भार को सहने वाली धुरी स्वयं स्थापित नहीं होती. वह धुरी रूपी नाभि पुरानी होने पर टूटती नहीं है. (११) पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्. अथेमे अन्य उपरे विचक्षणे सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितम्.. (१२) बारह आकृतियों अर्थात् बारह मासों और पांच चरणों अर्थात् ऋतुओं वाले पिता अर्थात् सूर्य को स्वर्ग के ऊपरी भाग में सोने वाला कहा गया है. अन्य चतुर जन इस में सात पहियों और छः अरों को स्थित बताते हैं. (१२) द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य. आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विशतिश्च तस्थुः.. (१३) बारह अरों वाला पहिया अर्थात् सूर्य स्वयं गति करता हुआ भी जीर्ण नहीं होता है. हे अग्नि! सात सौ बीस युगल अर्थात् तीन सौ साठ दिन और रात के जोड़े उस के पुत्र रूप में स्थित हैं. (१३) सनेमि चक्रमजरं वि वावृत उत्तानायां दश युक्ता वहन्ति. सूर्यस्य चक्षू रजसैत्यावृतं यस्मिन्नातस्थुर्भुवनानि विश्वा.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

कभी प्राचीन न होने वाला बारह मासों रूपी अरों से युक्त सूर्य रूपी पहिया सदैव चलता रहता है. दस घोड़े उस पहिए को आगे बढ़ाते हैं. सूर्य के नेत्र अंधकार से ढके होते हैं. उसी में समस्त विश्व स्थित रहता है. (१४) स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः पश्यदक्षण्वान् न वि चेतदन्धः. कविर्यः पुत्रः स ईमा चिकेत यस्ता विजानात् स पितुष्पिता ऽ सत्.. (१५) सभी स्त्रियां उसी को ज्ञानी पुरुष कहती हैं, जो उन्हें क्षयहीन प्रतीत होता है. इस के विपरीत दशा वाले पुरुष को वे ज्ञान शून्य समझती हैं. जो विद्वान् पुत्र इस बात को जानता है, वह पालकों का भी पालन करता है. (१५) साकंजानां सप्तथमाहुरेकजं षडिद्यमा ऋषयो देवजा इति. तेषामिष्टानि विहितानि धामश स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः.. (१६) देवों के साथ उत्पन्न ऋषि छः बताए गए हैं. ऋषि और देव बताते हैं कि यह छः एक से ही उत्पन्न हुए हैं. इस के मनचाहे स्थान निश्चित हैं. ये अनेक प्रकार से विराजमान होते हैं. (१६) अवः परेण पर एना ऽ वरेण पदा वत्सं बिभ्रती गौरुदस्थात्. सा कद्रीची कं स्विदर्धं परागात् क्व स्वित् सूते नहि यूथे अस्मिन्.. (१७) धवल वर्ण की गौ अगले पैर से अन्न को तथा पिछले पैर से अपने बछड़े को धारण करती हुई उड़ती है. वह किसी आधे भाग में गई थी. वह इस झुंड में बच्चा नहीं देती. (१७) अवः परेण पितरं यो अस्य वेदावः परेण पर एनावरेण. कवीयमानः क इह प्र वोचद् देवं मनः कुतो अधि प्रजातम्.. (१८) अगले पैरों के द्वारा इस के पिता अन्न को जानने वाला एवं पिछले पैरों के द्वारा पर को जानने वाला दिव्य मन कहां से प्रकट हुआ? यह बात प्रजापति ने कही. (१८) ये अर्वाञ्चस्ताँ उ पराच आहुर्ये पराञ्चस्ताँ उ अर्वाच आहुः. इन्द्रश्च या चक्रथुः सोम तानि धुरा न युक्ता रजसो वहन्ति.. (१९) जो नवीन हैं, वे प्राचीन के विषय में बताते हैं और जो प्राचीन हैं, वे नवीनों का परिचय देते हैं. हे सोम! तुम और सोम जिन्हें स्थापित करते हैं, वे लोक को धारण करने में समर्थ बनते हैं. (१९) द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते. तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति.. (२०) ebook converter DEMO Watermarks*

सुंदर पंखों वाले दो पक्षी अर्थात् आत्मा और परमात्मा एक ही संसार रूपी वृक्ष पर बैठे हैं. इन में से एक अर्थात् आत्मा पीपल के स्वादिष्ट फलों को खाता है. दूसरा अर्थात् परमात्मा पीपल के फलों को न खाता हुआ अपने दूसरे साथी को देखता है. (२०) यस्मिन् वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते सुवते चाधि विश्वे. तस्य यदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद.. (२१) वृक्ष पर मधु का भक्षण करने वाले जो पक्षी बैठते हैं, वे विश्व का विस्तार करते हैं. जो पीपल के फलों को स्वादिष्ट बताते हैं तथा जो अपने पालक पिता को नहीं जानते, वे विनाश को प्राप्त होते हैं. (२१) यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भक्षमनिमेषं विदथा ऽ भिस्रवन्ति. एना विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश.. (२२) जहां पक्षी कर्मों के अमृत के समान स्वादिष्ट फल समझते हैं, वे ही संसार की रक्षा करते हैं और अंत में सूर्यलोक में प्रवेश करते हैं. (२२) सूक्त-१५ देवता—गौ यद् गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभं वा त्रैष्टुभान्निरतक्षत. यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य इत् तद् विदुस्ते अमृतत्त्वमानशुः.. (१) गायत्र में गायत्र छिपा हुआ है और त्रैष्टुभ में त्रैष्टुभ व्याप्त है. जो लोग जगती में छिपे हुए जगत् को जानते हैं, वे अमृत का उपभोग करते हैं. (१) गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम्. वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदा ऽ क्षरेण मिमते सप्त वाणीः.. (२) गायत्र से अर्क अर्थात् सूर्य का निर्माण होता है. अर्क से साम का और त्रैष्टुभ से वाक का निर्माण होता है. वाक् से वाक् को तथा द्विपदा एवं चतुष्पदा तथा अविनाशी ब्रह्म से सप्तवाणी अर्थात् सात प्रकार के वेद के छंद निर्मित होते हैं. (२) जगत् सिन्धुं दिव्यस्कभायद रथंतरे सूर्य पर्यपश्यत्. गायत्रस्य समिधस्तिस्र आहुस्ततो मह्ना प्र रिरिचे महित्वा.. (३) संसार के द्वारा सिंधु को द्यौलोक की ओर प्रेरित किया गया. ज्ञानियों ने रथंतर में सूर्य का दर्शन किया. उन्होंने गायत्र यज्ञ की तीन समिधाएं बताईं. इस के पश्चात वे अपनी महत्ता से ही वृद्धि को प्राप्त हुए. (३) उप ह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम्.

श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नो ऽ भीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचत्.. (४) शोभन हाथ से गायों को दोहने वाला मैं सरलता से दुही जाने वाली गाय का दूध दुहता हुआ उसे अपने समीप बुलाता हूं. सविता ने मुझे श्रेष्ठ गौ प्रदान की है. उन्हीं में तेजस्वी धर्म का कथन किया गया है. (४) हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसा ऽ भ्यागात्. दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्धता महते सौभगाय.. (५) हुंकार करती हुई, धन से पालने योग्य एवं बछड़े की इच्छा करती हुई गौ धनवानों के समीप पहुंची. हिंसा न करने योग्य यह गाय अश्विनीकुमारों के निमित्त दूध देती हुई हमें महान सौभाग्य के लिए प्राप्त हो. (५) गौरमीमेदभि वत्सं मिषन्तं मूर्धानं हिङ्ङकृणोन्मातवा उ सृक्वाणं घर्ममभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः.. (६) हुंकार करती हुई गाय उस बछड़े के समीप जा कर उसे सूंघती है जो उस की ओर ताकता है. यह बताने के लिए कि यह बछड़ा मेरा ही है, यह गौ रंभाती है और अपने दूध से उसे बढ़ाती है. (६) अयं स शिङ्क्ते येन गौरभीवृता मिमाति मायुं ध्वसनावधि श्रिता. सा चित्तिभिर्नि हि चकार मर्त्यान् विद्युद्भवन्ती प्रति वव्रिमौहत.. (७) गरजते हुए मेघ ने वाणी को ढक लिया है. मेघ द्वारा ढकी हुई वाणी शब्द करती है. यही वाणी मेघों से बिजली के रूप में प्रकट हो कर मनुष्यों को भयभीत करती है. (७) अनच्छये तुरगातु जीवमेजद् ध्रुवं मध्य आ पस्त्यानाम्. जीवो मृतस्य चरति स्वधाभिरमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः.. (८) यमलोक की पीड़ाओं के भय से कांपते हुए प्राणी के हृदय में जीव सांस लेता है. मरणशील जीव अन्य मरणधर्मा प्राणियों का सयोनि अर्थात् समान शरीर वाला है एवं स्वधा का भक्षण करता है. (८) विधुं दद्राणं सलिलस्य पृष्ठे युवानं सन्तं पलितो जगार. देवस्य पश्य काव्यं महित्व ऽ द्या ममार स ह्यः समान.. (९) दमनशील एवं युवा चंद्रमा को सूर्य निगल जाता है. परमेश्वर की सृष्टि की महत्ता देखो कि आज जो मर जाता है, कल वही जीवित हो कर सांस लेने लगता है. तात्पर्य यह है कि आज छिप जाने वाला चंद्रमा दूसरे दिन फिर निकल आता है. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

य ईं चकार न सो अस्य वेद य ईं ददर्श हिरुगिन्नु तस्मात्. स मातुर्र्योना परिवीतो अन्तर्बहुप्रजा निर्ऋतिरा विवेश.. (१०) जिस ने इस की रचना की है, वह इस के गर्भ को नहीं देखता. जो इस के गर्भ में जाता है, वही इस को देखता है. माता की योनि से उत्पन्न बालक अनेक बार जन्ममरण रूपी पाप देवता निर्ऋति के जाल में फंसता है. (१०) अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्. स सध्रीची: स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (११) मैं ने रक्षा करने वाली आत्मा को जन्ममरण के चक्र में घूमते देखा. मैं ने उसे इहलोक और परलोक में एवं सत्व, रज, तम तीन गुणों में भ्रमण करते देखा. आत्मा अपने में व्याप्त लोकों एवं इंद्रियों में भ्रमण करती है. (११) द्यौर्नः पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्नो माता पृथिवी महीयम्. उत्तानयोश्चम्वो ३ योनिरन्तरत्रा पिता दुहितुर्गर्भमाधात्.. (१२) सृष्टि की रचना करने वाला एवं वीर्योत्पादक द्यौ भी हमारा पिता है. नाभि अर्थात् धरती और आकाश का मध्य भाग मेरा भाई है. महीयसी पृथ्बी मेरी माता है. यह वर्षा के जल को ओषधि के रूप में धारण करती है. आकाश और पृथ्वी सूत्र रूप में वायु को धारण करते हैं. पिता रूपी द्यौ पृथ्वी में वर्षा रूपी गर्भ धारण करता है. (१२) पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्याः पृच्छामि वृष्णो अश्वस्य रेतः. पृच्छामि विश्वस्य भुवनस्य नाभिं पृच्छामि वाचः परमं व्योम.. (१३) मैं तुम से पृथ्वि के अंतिम स्थान के विषय में पूछता हूं. मैं इच्छा पूर्ण करने वाले एवं व्यापक परमेश्वर के विषय में पूछता हूं. मैं संपूर्ण भुवन की नाभि अर्थात् केंद्र के विषय में पूछता हूं. मैं वाक् के परमव्योम में व्याप्त होने के विषय में भी पूछता हूं. (१३) इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या अयं सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतः अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिर्ब्रह्मा ऽ यं वाचः परमं व्योम.. (१४) यह देवी पृथ्वी का परम अंत है. यह सोम इच्छापूर्ण करने वाले व्यापक विष्णु का वीर्य है. यह यज्ञ समस्त भुवनों की नाभि अर्थात केंद्र है. ब्रह्म इस वाणी का परम व्योम है. (१४) न वि जानामि यदिवेदमस्मि निण्यः संनद्धो मनसा चरामि. यदा मागन् प्रथमजा ऋतस्यादिद् वाचो अश्रुवे भागमस्याः.. (१५) मैं यह नहीं जानता कि मैं ही जानने योग्य परम ब्रह्म हूं तथा मैं द्वैताद्वैत संदेह में पड़ा हुआ उसी के मध्य विचरण करता हूं. अतएव जो बुद्धि समस्त इंद्रियों में प्रमुख है, उस के ebook converter DEMO Watermarks*

द्वारा मैं यह जानता हूं कि मैं कार्य हूं अथवा कारण हूं. उसी के अनुसार मैं वाणी का उपयोग करता हूं. (१५) अपाङ् प्राङेति स्वधया गृभीतो ऽ मर्त्यो मर्त्येना सयोनिः. ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्य १ न्यं चिक्युर्न नि चिक्युरन्यम्.. (१६) मरणधर्मिता से रहित अर्थात् अमर आत्मा मरणधर्मा मन के साथ गर्भ से प्रकट होती है. इन में से आत्मा ब्रह्म में मिल कर तदाकार हो जाती है. (१६) सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि. ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परि भवन्ति विश्वतः.. (१७) व्यापक ब्रह्म की सात किरणें वीर्य के रूप में वर्तमान रहती हैं. वे किरणें कर्म की उत्पत्ति के रूप से समस्त जगत् में विस्तृत होती हैं. (१७) ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः. यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत् तद् विदुस्ते अमी समासते.. (१८) परम व्योम में ओंकार का अक्षर है. उस में समस्त देव निवास करते हैं. जो इस बात को नहीं जानता, वह वेद मंत्रों को जान कर भी क्या करेगा? जो इस बात को जानते हैं, वे उसी ब्रह्म में निवास करते हैं. (१८) ऋचः पदं मात्रया कल्पयन्तो ऽ र्धर्चेन चाक्लृपुर्विश्वमेजत्. त्रिपाद् ब्रह्म पुरुरूपं वि तष्ठे तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः.. (१९) ओंकार के पद की कल्पना करते हुए जनों ने उसी अर्थ में इस चैतन्य और गतिशील विश्व की कल्पना की. निश्चल ब्रह्म तीन मात्राओं से निज रूप में स्थित रहता है और इस की एक मात्रा से चारों दिशाएं अर्थात् चारों दिशाओं में वर्तमान प्राणी जीवित रहते हैं. (१९) सूयवसाद् भगवती हि भूया अधा वयं भगवन्तः स्याम. अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती.. (२०) हे भूमि! तू जलमय सूर्य के संपर्क के कारण जल रूप ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकी. हम भी तेरे जल रूप ऐश्वर्य से संपत्तिशाली बनें. हे हिंसित न होने वाली पृथ्वी! तू मेघों को चूरचूर कर के शुद्ध जल का सेवन कर एवं सूर्य की किरणों के द्वारा जल का सेवन कर. (२०) गौरिन्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी. अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा भुवनस्य पङ्क्तिस्तस्याः समुद्रा अधि वि क्षरन्ति.. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*

इस वाणीरूपी गौ ने ही विश्व की रचना की है. यही जल का निर्माण करती है. मध्यम के साथ एकत्व प्राप्त कर के यह सूर्य के साथ एकपदी, दिशाओं के साथ चतुष्पदी और अंतर्दिशाओं के साथ अष्टपदी होती है. दिशाओं, विदिशाओं एवं सूर्य के साथ यह नवपदी हो जाती है. यह अविभक्त आत्मा में मिल कर भुवन की रचना करती है. इसी के कारण मेघ वर्षा करते हैं. (२१) कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति. त आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवीं व्युदुः.. (२२) जल को लपेटती हुई किरणें आकाश में उछलती हैं. वे ही किरणें दक्षिणायन रूप में सूर्यमंडल से लौटती हैं, तभी धरती जल से भीग जाती है. (२२) अपादेति प्रथमा पद्धतीनां कस्तद् वां मित्रावरुणा चिकेत. गर्भो भारं भरत्या चिदस्या ऋतं पिपर्त्यनृतं नि पाति.. (२३) हे मित्र और वरुण! तुम्हारे रूप को कौन जानता है? बिना चरणों वाली किरणें चरणों वाले प्राणियों से पहले इस जगत् में आ जाती हैं. धरती इन का भार धारण करती है तथा सत्य बोलने वाले का पालन करती है. यह धरती झूठ बोलने वाले का विनाश कर देती है. (२३) विराड् वाग विराट् पृथिवी विराडन्तरिक्षं विराट् प्रजापतिः. विराण्मृत्युः साध्यानामधिराजो बभूव तस्य भूतं भव्यं वशे स मे भूतं भव्यं वशे कृणोतु.. (२४) विराट् ही वाणी है, विराट् पृथिवी है, विराट् अंतरिक्ष है और विराट् प्रजापति है. विराट् मृत्यु और साध्यों का स्वामी है. भूत और भविष्य उसी के वश में है. वही विराट् भूत और भविष्य को मेरे वश में करे. (२४) शकमयं धूममारादपश्यं विषूवता पर एना ऽ वरेण. उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्.. (२५) मैं ने विषुवत एवं ऐनावर यज्ञ के द्वारा सर्वत्र व्याप्त धूम को समीप से देखा. वीरों ने शक्ति देने वाले सोमरस को पकाया. वे ही प्रमुख धर्म थे. (२५) त्रयः केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम्. विश्वमन्यो अभिचष्टे शचीभिर्धाजिरेकस्य ददृशे न रूपम्.. (२६) तीन ज्योतियों अर्थात् अग्नि, सूर्य एवं वायु ऋतुओं के अनुसार अपने कार्यों के रूप में समयसमय पर संसार पर कृपा करती हैं. इन में से एक अर्थात् अग्नि संवत्सर में पृथ्वी को भस्म करती है. इस प्रकार वह कर्म करने योग्य बनती है. इन में वायु का रूप अदृश्य है. उस ebook converter DEMO Watermarks*

की केवल गति जानी जाती है. (२६) चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ते मनीषिणः. गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति.. (२७) वाणी के चार निश्चित पद अर्थात् चरण हैं. जो मनीषी ब्राह्मण हैं, वे उन्हें जानते हैं. इन में से तीन चरण बुद्धि रूपी गुफा में छिपे होने के कारण गति नहीं करते हैं. मनुष्य वाणी के चौथे चरण का उच्चारण करते हैं. (२७) इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्. एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः.. (२८) तत्त्वज्ञानी विद्वान् उस दिव्य गतिशील को इंद्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं. यह दिव्य गतिशील एक है, पर विद्वान् उसे अनेक प्रकार से कहते हैं. वे उसे अग्नि, वायु एवं यम कहते हैं. (२८) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१ देवता—मंत्र में उक्त

दसवां कांड सूक्त-१ देवता—मंत्र में उक्त यां कल्पयन्ति वहतौ वधूमिव विश्वरूपां हस्तकृतां चिकित्स्वः. सारादेत्वप नुदाम एनाम्.. (१) कृत्या को बनाने वाले उसे दहेज के साथ प्राप्त होने वाली वधू के समान सजाते हैं. हम उसी कृत्या को भगाते हैं. वह कृत्या हम से दूर चली जाए. (१) शीर्षण्वती नस्वती कर्णिनी कृत्याकृता संभृता विश्वरूपा. सारादेत्वप नुदाम एनाम्.. (२) सिर, नाक, कान आदि अंगों से युक्त बनाई गई कृत्या अनेक प्रकार की आपत्तियां लाती है. उसे हम भगाते हैं. वह हमारे पास से दूर चली जाए. (२) शूद्रकृता राजकृता स्त्रीकृता ब्रह्मभिः कृता. जाया पत्या नुत्तेव कर्तारं बन्ध्वृच्छतु.. (३) शूद्र के द्वारा निर्मित, राजा के द्वारा निर्मित, स्त्री के द्वारा निर्मित एवं मंत्रों के द्वारा प्रेरित कृत्या अपने बनाने वाले के समीप उसी प्रकार लौट जाए, जिस प्रकार भाइयों के द्वारा विदा की गई पत्नी अपने पति के समीप लौट जाती है. (३) अनया ऽ हमोषध्या सर्वाः कृत्या अदूदुषम्. यां क्षेत्रे चक्रुर्यां गोषु यां वा ते पुरुषेषु... (४) मैं इस जड़ीबूटी के द्वारा समस्त कृत्याओं को क्षेत्र में गायों पर एवं पुरुषों पर की गई कृत्या को शक्तिहीन कर चुका हूं. (४) अघमस्त्वघकृते शपथः शपथीयते. प्रत्यक् प्रतिप्रहिण्मो यथा कृत्याकृतं हनत्.. (५) पाप उसे प्राप्त हो, जिस ने पाप किया है. शपथ उसी के पास जाए, जिस ने शपथ की है. मैं कृत्या को इस प्रकार वापस लौटाता हूं कि वह अपने निर्माता का ही विनाश कर दे. (५) प्रतीचीन आङ्गिरसो ऽ अध्यक्षो नः पुरोहितः. ebook converter DEMO Watermarks*

प्रतीचीः कृत्या आकृत्यामून् कृत्याकृतो जहि.. (६) हमारा पुरोहित पश्चिम देश का रहने वाला एवं हमारे सामने उपस्थित है. पूर्व के निवासियों ने कृत्या का निर्माण किया है. हे पुरोहित! तुम उस को नष्ट करो. (६) यस्त्वोवाच परेहीति प्रतिकूलमुदाय्यम्. तं कृत्ये ऽ भिनिवर्तस्व मा ऽ स्मानिच्छो अनागसः.. (७) हे कृत्या! जिस ने तुझे आदेश दिया कि दूर जा. उस ने हमारे प्रतिकूल आचरण किया है. तू उसी के पास लौट जा तथा हम निरपराधों की इच्छा मत कर. (७) यस्ते परूंषि संदधौ रथस्येवर्भुर्धिया. तं गच्छ तत्र ते ऽ यनमज्ञातस्ते ऽ यं जनः.. (८) हे कृत्या! बढ़ई जिस प्रकार रथ के अंगों को जोड़ता है, उसी प्रकार जिस ने बुद्धिमत्ता के साथ तेरी हड्डियों को जोड़ा है, तू उसी के समीप लौट जा. तेरा गंतव्य वही है. मैं तेरा अपरिचित हूं. (८) ये त्वा कृत्वोलेभिरे विद्वला अभिचारिणः. शंभ्वी ३ दं कृत्यादूषणं प्रतिवर्त्म पुनःसरं तेन त्वा स्नपयामसि.. (९) हे कृत्या! जिस जादूटोना करने वाले ने तुझे प्राप्त किया है, वह मार्ग को दूषित कर के तुझे लौटा सकता है. हम उसी के रक्त से तुझे स्नान कराते हैं. (९) यद् दुर्भगां प्रस्नपितां मृतवत्समुपेयिम. अपैतु सर्वं मत् पापं द्रविणं मोप तिष्ठतु.. (१०) हम जिस कृत्या को प्राप्त कर के मृतवत्सा गौ की दशा वाले हो गए हैं. अर्थात् हमारी पत्नियां मरे हुए बच्चे को जन्म देती हैं. मुझ से संबंधित समस्त पाप दूर हो जाएं तथा मुझे धन प्राप्त हो. (१०) यत् ते पितृभ्यो ददतो यज्ञे वा नाम जगृहुः. संदेश्या ३ त् सर्वस्मात् पापादिमा मुञ्चन्तु त्वौषधीः.. (११) यज्ञ में पितरों का भाग देते हुए जो नाम लिया गया था, ये जड़ीबूटियां उस नाम लेने के पाप से तुझे छुड़ाएं. (११) देवैनसात् पित्र्यान्नामग्राहात् संदेश्या दभिनिष्कृतात्. मुञ्चन्तु त्वां वीरुधो वीर्येण ब्रह्मण ऋग्भिः पयस ऋषीणाम्.. (१२) देवों के प्रति किए गए पाप से, पितरों का नाम लेने के पाप से, अपमानित करने से और ebook converter DEMO Watermarks*

अपशब्द कहने के पाप से ये जड़ीबूटियां ब्राह्मणों के मंत्र बल के द्वारा एवं ऋषियों के तपोबल के द्वारा हमें छुड़ाएं. (१२) यथा वातश्च्यावयति भूम्या रेणुमन्तरिक्षाच्चाभ्रम्. एवा मत् सर्वं दुर्भूतं ब्रह्मनुत्तमपायति.. (१३) वायु जिस प्रकार धरती से धूल को और आकाश में मेघों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार मंत्रों का बल मेरे सभी पापों को दूर करे. (१३) अप क्राम नानदती विनद्धा गर्दभीव. कर्तृन् नक्ष्वेतो नुत्ता ब्रह्मणा वीर्यावता.. (१४) हे कृत्या! जिस प्रकार खुली हुई गधी रेंकती हुई भागती है, उसी प्रकार तू हमारे मंत्र बल के कारण अपने निर्माताओं के समीप जा और उन्हें नष्ट कर. (१४) अयं पन्थाः कृत्येति त्वा नयामो ऽ भिप्रहितां प्रति त्वा प्र हिण्मः. तेनाभि याहि भञ्जन्त्यनस्वतीव वाहिनी विश्वरूपा कुरूटिनी.. (१५) हे कृत्या! यह मार्ग है. तू शत्रु के द्वारा हमारे पास भेजी गई है. हम तुझे उसी के पास भेजते हैं. तू बैलगाड़ियों, वाणी एवं अनेक वीरों से युक्त सेना के समान हल्ला करती हुई हमारे शत्रुओं पर आक्रमण कर. हम मंत्र के बल से तुझे लौटाते हैं. (१५) पराक् ते ज्योतिरपथं ते अवाङ्गन्यत्रास्मदयना कृणुष्व. परेणेहि नवतिं नाव्या ३ अति दुर्गाः स्रोत्या मा क्षणिष्ठाः परेहि.. (१६) हे कृत्या! तेरी ज्योति शत्रुओं के समीप पहुंचे. तू अपना निवास स्थान हम से दूर किसी अन्य स्थान में बना. तू नाव के द्वारा पार की जा सकने वाली नब्बे दुर्गम नदियों के पार चली जा और हमारी हिंसा मत कर. (१६) वात इव वृक्षान् नि मृणीहि पादय मा गामश्वं पुरुषमुच्छिष एषाम्. कर्तृन् निवृत्येतः कृत्ये ऽ प्रजास्त्वाय बोधय.. (१७) हे कृत्या! वायु जिस प्रकार वृक्षों को उखाड़ देती है, उसी प्रकार तू शत्रुओं को कुचल दे. उन शत्रुओं की गाएं, घोड़े और पुरुष शेष न रहें. तू अपने बनाने वालों के पास जा एवं उन्हें संतानहीन बना. (१७) यां ते बर्हिषि यां श्मशाने क्षेत्रे कृत्यां वलगं वा निचख्नुः. अग्नौ वा त्वा गार्हपत्ये ऽ भिचेरुः पाकं सन्तं धीरतरा अनागसम्.. (१८) हे कृत्या! जादू‌टोना करने वालों ने तुझे कुशाओं पर, मरघट में अथवा खेत में गुप्त रूप ebook converter DEMO Watermarks*

से बनाया है अथवा उन्होंने गार्हपत्य अग्नि पर पाक कर के तेरा निर्माण किया है. मैं अपराधहीन होने के कारण तुझे शक्तिहीन बनाता हूं. (१८) उपा॒हृत॒मनु॑बुद्धं निखा॑तं वैरं त्सार्य॒न्ववि॑दाम क॒र्त्रम्. तदेतु॒ यत॒ आभृ॑तं तत्राश्व॑ इव वि वर्ततां हन्तु कृत्या॒कृतः॑ प्र॒जाम्.. (१९) कपटपूर्ण वैर को हम उसी के पास लौटाते हैं और वैर के कारण बनाई गई कृत्या को हम उसी के निर्माणकर्ता के पास वापस भेजते हैं. कृत्या घोड़े के समान अपने स्थान पर चली जाए और कृत्या का प्रयोग करने वाले की संतान का विनाश कर दे. (१९) स्वायसा असयः सन्ति नो गृहे विद्मा ते कृत्यै यतिधा परूंषि. उत्तिष्ठैव परेहीतोऽज्ञाते किमिहेच्छसि.. (२०) हे कृत्या! हम तेरी हड्डियों के जोड़ों को जानते हैं. हमारे घरों में अच्छे लोहे से बनी तलवारें हैं. भलाई इसी में है कि तू यहां से शीघ्र ही हमारे शत्रु के समीप चली जा. हम तुझे नहीं जानते. तू यहां क्या चाह रही है? (२०) ग्रीवास्ते कृत्यै पादौ चापि कत्स्या॑मि निर्द्रव. इन्द्राग्नी अस्मान् रक्षतां यौ प्रजानां प्रजावती.. (२१) हे कृत्या! मैं तेरी गरदन और पैर काट डालूंगा. तू यहां से भाग जा. प्रजाओं की रक्षा करने वाले इंद्र और अग्नि हमारी रक्षा करें. (२१) सोमो राजा ऽ धिपा मृडिता च भूतस्य नः पतयो मृडयन्तु.. (२२) राजा सोम प्राणियों के रक्षक हैं. प्राणियों की रक्षा करने वाले वे हमें सुखी बनाएं. (२२) भवाशर्वावस्यतां पापकृते कृत्याकृते. दुष्कृते विद्युतं देवहेतिम्.. (२३) कृत्या का निर्माण करने वाला पापी है. भव और शर्व उस के विनाश के लिए विद्युत को प्रेषित करें जो देवों का शस्त्र है. (२३) यद्येयथ द्विपदी चतुष्पदी कृत्याकृता संभृता विश्वरूपा. सेतो ३ ष्टापदी भूत्वा पुनः परेहि दुच्छुने.. (२४) हे कृत्या! तेरा निर्माण करने वालों ने तुझे दो पैरों वाली अथवा चार पैरों वाली बनाया है. यदि तू हमारे समीप आ रही है तो आठ पैरों वाली बन कर यहां से लौट जा. (२४) अभ्य १ क्ताक्ता स्वरंकृता सर्वं भरन्ती दुरितं परेहि. जानीहि कृत्यै कर्तारं दुहितेव पितरं स्वम्.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे कृत्या! तू घी से भीगी हुई, भलीभांति अलंकृत और बुरे कर्म करने वाली है. जिस प्रकार पुत्री अपने पिता को जानती है, उसी प्रकार तू अपने रचयिता को जान अर्थात् उसी के समीप लौट जा. (२५) परेहि कृत्ये मा तिष्ठो विद्धस्येव पदं नय. मृगः स मृगयुस्त्वं न त्वा निकर्तुमर्हति.. (२६) हे कृत्या! तू यहां से चली जा, यहां ठहर मत. जिस प्रकार सिंह घायल हरिण के स्थान की ओर जाता है, उसी प्रकार तू अपने बनाने वाले के पास चली जा. तेरा बनाने वाला हरिण के समान है और तू सिंह के समान है, अतएव वह तुझे नष्ट नहीं कर सकता. (२६) उत हन्ति पूर्वासिनं प्रत्यादायापर इष्वा. उत पूर्वस्य निघ्नतो नि हन्त्यपरः प्रति.. (२७) प्रथम बैठे हुए व्यक्ति को दूसरा मनुष्य बाण से मार डालता है. मारने वाले को अन्य मनुष्य मार डालता है. हे कृत्या! तू अपने बनाने वाले के समीप लौट जा. (२७) एतद्धि शृणु मे वचो ऽ थेहि यत एयथ. यस्त्वा चकार तं प्रति.. (२८) हे कृत्या! मेरी यह बात सुन. तू जहां से यहां आई है और जिस ने तेरा निर्माण किया है, तू वहीं जा. (२८) अनागोहत्या वै भीमा कृत्ये मा नो गामश्वं पुरुषं वधीः. यत्रयत्रासि निहिता ततस्त्वोत्थापयामसि पर्णाल्लघीयसी भव.. (२९) निरपराध की हत्या करना भयंकर कर्म है. तू हमारी गायों, अश्वों, और पुरुषों की हत्या मत कर. तुझे जहांजहां स्थापित किया गया है, वहांवहां से हम तुझे हटाते हैं. तू पत्ते से भी हलकी हो जा. (२९) यदि स्थ तमसावृता जालेनाभिहिता इव. सर्वाः संलुप्येतः कृत्याः पुनः कर्त्रे प्र हिण्मसि.. (३०) हे कृत्याओ! यदि तुम अंधकार से ढकी हुई और जाल में फंसी हुई के समान विवश हो तो हम तुम सब को यहां से दूर भगाते हैं और तुम्हारे रचयिताओं के पास भेजते हैं. (३०) कृत्याकृतो वलगिनोऽभिनिष्कारिणः प्रजाम्. मृणीहि कृत्ये मोच्छिषोऽमून कृत्योकृतो जहि.. (३१) हे कृत्या! तू अपने रचयिता कपटी की संतान का विनाश कर. हे कृत्या! इन्हें मत छोड़. तू अपने रचयिता का विनाश कर दे. (३१) ebook converter DEMO Watermarks*

यथा सूर्यो मुच्यते तमसस्परि रात्रिं जहात्युषसश्च केतून्. एवाहं सर्वं दुर्भूतं कर्त्रं कृत्याकृता कृतं हस्तीव रजो दुरितं जहामि.. (३२) जिस प्रकार सूर्य अंधकार से छूट जाता है और रात्रि तथा उषा के उत्पत्ति के कारणों को त्याग देता है और हाथी जिस प्रकार अपने शरीर पर लगी हुई धूल झाड़ देता है, उसी प्रकार मैं कृत्या का निर्माण करने वाले के कर्म को अपने से पूरी तरह दूर करता हूं. (३२) सूक्त-२ देवता—ब्रह्म-प्रकाशन केन पाष्णी आभृते पूरुषस्य केन मांसं संभृतं केन गुल्फौ. केनाङ्गुली: पेशनी: केन खानि केनोच्छ्लङ्खौ मध्यतः कः प्रतिष्ठाम्.. (१) मनुष्य की एड़ियों को, टखनों को और मांस को किस ने पुष्ट बनाया? मनुष्य की सुंदर उंगलियों को किस ने पुष्ट किया? उंगलियों के मध्य में नसों को किस ने स्थित किया? (१) कस्मान्नु गुल्फावधरावकृण्वन्नष्ठीवन्तावुत्तरौ पूरुषस्य. जङ्घे निर्ऋत्य न्यदधुः स्व स्विज्जानुनोः सन्धी क उ तच्चिकेत.. (२) नीचे के टखनों को किस से बनाया गया? पुरुष के घुटनों को, जांघों को तथा चरणों के मध्य को किस से बनाया गया? घुटनों का जोड़ कहां है और उसे कौन जानता है? (२) चतुष्टयं युज्यते संहितान्तं जानुभ्यामूर्ध्वं शिथिरं कबन्धम्. श्रोणी यदूरू क उ तज्जजान याभ्यां कुसिन्धं सुदृढं बभूव.. (३) घुटनों के ऊपर चारों भाग हैं—शिथिल, धड़, कंधे और जंघाएं. इन्हें किस ने बनाया, जिस से शरीर का भाग धड़ दृढ़ हुआ? (३) कति देवाः कतमे त असन् य उरो ग्रीवाश्चिक्युः पूरुषस्य. कति स्तनौ व्यदधुः कः कफोडौ कति स्कन्धान् कति पृष्टीरचिन्वन्.. (४) वे देव कितने थे, जिन्होंने पुरुष के हृदय को और गरदन को बनाया? कितने देवों ने पुरुष के स्तन बनाए. फेफड़ों को किस ने बनाया? कंधों की रचना कितने देवों ने की? पीठ की रचना कितने देवों ने की? (४) को अस्य बाहू समभरद् वीर्यं करवादिति. अंसौ को अस्य तद् देवः कुसिन्धे अध्या दधौ.. (५) किस देव ने मनुष्य के बाहुओं को शक्ति से भर दिया और किस ने उस में वीर्य की रचना की? पुरुष के कंधों की रचना करने वाला देव कौन है? इसे धड़ पर किस ने स्थापित किया? (५) eBook converter DEMO Watermarks*

कः सप्त खानि वि ततर्द शीर्षणि कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्. येषां पुरुत्रा विजयस्य मह्मानि चतुष्पादो द्विपदो यन्ति यामम्.. (६) मनुष्य के सिर में सात छेद अर्थात् दो कान, दो नथुने, दो आंखें और एक मुख किस देव ने बनाया? इन्हीं देवों की महिमा से दो पैरों और चार पैरों वाले प्राणी अनेक स्थानों में गति करते हुए यमराज के स्थान पर जाते हैं. (६) हन्वोर्हि जिह्वमदधात् पुरूचीमधा महीमधि शिश्राय वाचम्. स आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तरपो वसानः क उ तच्चिकेत.. (७) अनेक स्थलों को छूने वाली जीभ को ठोड़ी में किस ने स्थापित किया? जीभ में वाणी की स्थापना किस ने की. अपने शरीर के भीतर जल को धारण करता हुआ कौन सा देव प्राणियों में व्याप्त है? उस का जानने वाला कौन है? (७) मस्तिष्कमस्य यतमो ललाटं ककाटिकां प्रथमो यः कपालम्. चित्वा चित्यं हन्वोः पुरुषस्य दिवं रुरोह कतमः स देवः.. (८) इस का मस्तिष्क, ललाट और जबड़ों के जोड़ एवं कपाल किस ने बनाया? वह देव कौन सा है? पुरुष की ठोड़ी की हड्डियों को जोड़ कर जो स्वर्ग को गया था, वह देव कौन सा है? (८) प्रियाप्रियाणि बहुला स्वप्नं संबाधतन्द्रयः. आनन्दानुग्रो नन्दांश्च कस्माद् वहति पूरुषः.. (९) मनुष्य के प्रिय और अप्रिय स्वप्नों को, संबंधित इंद्रियों को, आनंद को तथा दुःख को कौन सा देव धारण करता है? (९) आर्तिरवर्तिर्निर्ऋतिः कुतो नु पुरुषे ऽ मतिः. राद्धिः समृद्धिव्र्युद्धिर्मतिरूदितयः कुतः.. (१०) पुरुष में पाप, आजीविका विरोधी तत्त्व, दुष्कर्म आदि कहां से प्राप्त होते हैं? इसे ऋद्धि, सिद्धि, समृद्धि, बुद्धि एवं उन्नति कहां से प्राप्त होती है. (१०) को अस्मिन्नापो व्यदधाद् विषूवृतः पुरूवृतः सिन्धुसृत्याय जाताः. तीव्रा अरुणा लोहिनीस्ताम्रधूम्रा ऊर्ध्वा अवाचीः पुरुषे तिरश्चीः.. (११) इस पुरुष में सर्वत्र विद्यमान सागर को और सदा तेजी से बहने वाले जलों को किस ने प्रविष्ट किया है जो लाल, लोहित, तांबई एवं धुमेले रंग के हैं? इन जलों को ऊपर, नीचे और तिरछा जाने की शक्ति किस ने प्रदान की? (११) ebook converter DEMO Watermarks*

को अस्मिन् रूपमदधात् को मह्मानं च नाम च. गांतुं को अस्मिन् कः केतुं कश्चरित्राणि पूरुषे.. (१२) किस देव ने पुरुष में रूप, महिमा एवं नाम को धारण किया? इसे ज्ञान, चरित्र और गति किस देव ने प्रदान की? (१२) को अस्मिन् प्राणमवयत् को अपानं व्यानमु. समानमस्मिन् को देवो ऽ धि शिश्राय पूरुषे.. (१३) इस पुरुष में प्राण, अपान एवं व्यान वायु को किस ने धारण किया? इस पुरुष में समान वायु को किस ने आश्रित किया? (१३) को अस्मिन् यज्ञमदधादेको देवो ऽ धि पूरुषे. को अस्मिन्सत्यं को ऽ नृतं कुतो मृत्युः कुतो ऽ मृतम्.. (१४) किस प्रधान देव ने इस पुरुष में यज्ञ रूप कर्म को स्थापित किया है? इस में सत्य, असत्य, अमृत और मृत्यु की स्थापना किस ने की? (१४) को अस्मै वासः पर्यदधात् को अस्यायुरकल्पयत्. बलं को अस्मै प्रायच्छत् को अस्याकल्पयज्जवम्.. (१५) इस पुरुष के शरीर पर त्वचा रूपी वस्त्र किस ने रखा और इस की आयु की रचना किस देव ने की? इस पुरुष के लिए बल किस देव ने प्रदान किया और किसने इसे गति दी? (१५) केनापो अन्वतनुत केनाहरकरोद् रुचे. उषसं केनान्वैन्ध्द्ध केन सायंभवं ददे.. (१६) किस देव ने इस पुरुष के लिए जल की रचना की और किस ने इस के लिए प्रकाश वाला दिवस बनाया? उषा को किस देव ने उज्ज्वल किया तथा सायंकाल किस ने प्रदान किया? (१६) को अस्मिन् रेतो न्यदधात् तन्तुरा तायतामिति. मेधां को अस्मिन्नध्यौहत् को बाणं को नृतो दधौ.. (१७) इस पुरुष में वीर्य का आधान किस ने किया, जिस से प्रजा रूपी तंतु का विस्तार हो सके? इस पुरुष में बुद्धि की स्थापना किस देव ने की तथा किस ने इस में बाण धारण किया? (१७) केनेमां भूमिमौर्णोत् केन पर्यभवद् दिवम्. केनाभि मह्ना पर्वतान् केन कर्माणि पूरुषः.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*

पुरुष ने किस प्रकार से भूमि को आवृत्त किया तथा यह किस प्रभाव से स्वर्ग पर आरूढ़ हुआ? यह पुरुष किस प्रभाव से पर्वतों पर आरोहण करता और कर्म करता है? (१८) केन पर्जन्यमन्वेति केन सोमं विचक्षणम्. केन यज्ञं च श्रद्धां च केनास्मिन् निहितं मन:.. (१९) यह पुरुष किस प्रभाव से बादलों को प्राप्त करता और सोमलता को खोजता है? यह पुरुष यज्ञ को और श्रद्धा को किस के द्वारा प्राप्त करता है तथा इस के मन को उत्तम कर्मों में किस ने संलग्न किया है? (१९) केन श्रोत्रियमाप्नोति केनेमं परमेष्ठिनम्. केनेममग्निं पूरुषः केन संवत्सरं ममे.. (२०) यह पुरुष किस के द्वारा श्रोत्रिय ब्राह्मण को प्राप्त करता है? यह किस के द्वारा परमेष्ठी को पाता है? यह पुरुष अग्नि को किस के द्वारा प्रेरित करता है और संवत्सर की गणना कैसे कर पाता है? (२०) ब्रह्म श्रोत्रियमाप्नोति ब्रह्मेमं परमेष्ठिनम्. ब्रह्मेममग्निं पूरुषो ब्रह्म संवत्सरं ममे.. (२१) ब्रह्म श्रोत्रिय को प्राप्त करता है और ब्रह्म ही परमेष्ठी को प्राप्त करता है. ब्रह्म ही यह पुरुष है और अग्नि को प्राप्त करता है तथा संवत्सर की गणना करता है. (२१) केन देवाँ अनु क्षियति केन दैवजनीर्विशः. केनेदमन्यन्नक्षत्रं केन सत् क्षत्रमुच्यते.. (२२) पुरुष किस कर्म के द्वारा देवों की अनुकूलता प्राप्त करता है तथा किस कर्म को देवी प्रजा के अनुकूल बनाता है. यह पुरुष इस कर्म के द्वारा क्षत्र नहीं बनता और किस कर्म के द्वारा क्षत्र कहलाता है? (२२) ब्रह्म देवाँ अनु क्षियति ब्रह्म दैवजनीर्विशः. ब्रह्मेदमन्यन्नक्षत्रं ब्रह्म सत् क्षत्रमुच्यते.. (२३) ब्रह्म देवों के अनुकूल रहता है तथा ब्रह्म ही दैवी प्रजाओं के अनुकूल व्यवहार करता है. ब्रह्म ही क्षत्र का अभाव है और ब्रह्म ही उत्तम धन कहलाता है. (२३) केनेयं भूमिविर्हिता केन द्यौरुत्तरा हिता. केनेदमूर्ध्वं तिर्यक् चान्तरीक्षं व्यचो हितम्.. (२४) इस भूमि को किस ने स्थापित किया है तथा द्यौ को इस के ऊपर किस ने स्थित किया ebook converter DEMO Watermarks*