भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 548

सो आभ्यो ऽ मृतमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१४) बृहस्पति ने वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए जिस को यह मणि बांधी, उस मणि को धारण करने वाले जल सदा अविनाशी हो कर दौड़ते है अर्थात् बहते हैं. इस मणि ने जलों के लिए बारबार और प्रतिदिन अमृत प्रदान किया. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तुम शत्रुओं का विनाश करो. (१४) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. तं राजा वरुणो मणिं प्रत्यमुञ्चत शंभुवम्. सो अस्मै सत्यमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१५) जिस मणि को बृहस्पति देव ने वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए बांधा, उसी सुखदायी मणि को राजा वरुण ने हमें दिया है. वह मणि इस यजमान के लिए प्रतिदिन और बारबार सत्य प्रदान करे. हे यजमान! इस की सहायता से तुम अपने शत्रु का विनाश करो. (१५) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. तं देवा बिभ्रतो मणिं सर्वांल्लोकान् युधा ऽ जयन्. स एभ्यो जितिमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१६) बृहस्पति देव ने जिस मणि को वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए बांधा था, उसी मणि को धारण करने वाले देवों ने युद्ध के द्वारा सभी लोकों को जीत लिया. वह मणि इस यजमान के लिए विजय प्रदान करे. हे यजमान! इस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१६) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. तमिमं देवता मणिं प्रत्यमुञ्चन्त शंभुवम्. स आभ्यो विश्वमिद् दुहे भूयोभूयः श्वः श्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१७) बृहस्पति ने वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए जिस मणि को बांधा, देवों ने उसी सुखदायी मणि को मुझे दिया है. इस मणि ने देवों के लिए बारबार और प्रतिदिन सत्य प्रदान किया है. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१७) ऋतवस्तमबध्नतार्तवास्तमबध्नत. संवत्सरस्तं बद्ध्वा सर्वं भूतं वि रक्षति.. (१८) वसंत आदि ऋतुओं ने इस मणि को बांधा और ऋतुओं से उत्पन्न चैत्र आदि मासों ने इस मणि को बांधा है. संवत्सर इसी मणि को बांध कर समस्त प्राणियों की रक्षा करता है. (१८) अन्तर्देशा अबध्नत प्रदिशस्तमबध्नत. प्रजापतिस्सृष्टो मणिर्द्विषतो मे ऽ धरां ebook converter DEMO Watermarks*