अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 550, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमदूर्जया पयसा सह द्रविणेन श्रिया सह.. (२६) बृहस्पति देव ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि ऊर्जा, दूध एवं शोभा के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२६) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमत् तेजसा त्विष्या सह यशसा कीर्त्या सह.. (२७) बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि तेज, प्रकाश, यश एवं कीर्ति के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२७) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमत् सर्वाभिर्भूतिभिः सह.. (२८) बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि मुझे समस्त विभूतियों के साथ प्राप्त हुई है. (२८) तमिमं देवता मणिं मह्यं ददतु पुष्टये. अभिभुं क्षत्रवर्धनं सपत्नदम्भनं मणिम्... (२९) देव वही मणि मुझे पुष्टि के लिए प्रदान करें. वह मणि शत्रु नाशक, क्षात्र शक्ति बढ़ाने वाली एवं शत्रु का विनाश करने वाली है. (२९) ब्रह्मणा तेजसा सह प्रति मुञ्चामि मे शिवम्. असपत्नः सपत्नहा सपत्नान् मेऽधरां अकः.. (३०) ब्रह्म तेज के साथ मैं इस मणि को धारण करता हूं. यह मणि मेरे लिए कल्याणकारी है. इस मणि का कोई शत्रु नहीं है. शत्रुघातक इस मणि ने मेरे शत्रुओं की अवनति की है. (३०) उत्तरं द्विषतो मामयं मणिः कृणोतु देवजाः. यस्य लोका इमे त्रयः पयो दुग्धमुपासते. स मा ऽ यमधि रोहतु मणिः श्रेष्ठ्याय मूर्धतः.. (३१) देवों से उत्पन्न इस मणि ने मुझे शत्रुओं की अपेक्षा उत्तम स्थिति में रखा. इस मणि से दुहे सार रूप दूध का तीनों लोक सेवन करते हैं. यह मणि मुझे श्रेष्ठ स्थान पर आरोपित करे. (३१) यं देवाः पितरो मनुष्या उपजीवन्ति सर्वदा. स मायमधि रोहतु मणिः श्रेष्ठ्याय मूर्धतः.. (३२) ebook converter DEMO Watermarks*