अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 590, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभी प्राणियों से संबंधित जो आंतें हैं, वे ही बैलों को गाड़ी में जोड़ने की रस्सियां हैं. समस्त प्राणियों के शरीर की गुदा गाड़ी और जुए को जोड़ने हेतु चमड़े की रस्सियां हैं. (१०) इयमेव पृथिवी कुम्भी भवति राध्यमानस्यौदनस्य द्यौरपिधानम्.. (११) यह दिखाई देती हुई पृथ्वी पकाए जाते हुए पूर्वोक्त ओदन को पकाने की बटलोई है तथा द्युलोक उसे ढकने का पात्र है. (११) सीता: पर्शव: सिकता ऊबध्यम्.. (१२) खेत में हल चलाने से बनने वाली रेखाएं इस ओदन की पसली की हड्डियां हैं तथा नदियों की बालू इस के पेट के भीतर के आधे पके हुए तृण हैं. (१२) ऋतं हस्तावनेजनं कुल्योपसेचनम्.. (१३) लोक में विद्यमान समस्त जल इस ओदन के हाथ धुलाने के लिए हैं तथा छोटी नदियां इस ओदन को मिलाने का साधन हैं. (१३) ऋचा कुम्भ्यधिहितार्त्विज्येन प्रेषिता.. (१४) विराट् रूप ओदन को पकाने वाली बटलोई ऋग्वेद में अग्नि पर रखी है और यजुर्वेद ने इस में आग जलाई है. (१४) ब्रह्मणा परिगृहीता साम्ना पर्यूढा.. (१५) इस ओदन को पकाने वाली बटलोई अथर्ववेद ने पकड़ी है और सामवेद ने इसे चारों ओर से अंगारों से घेर दिया है. (१५) बृहदायवनं रथन्तरं दर्वि:.. (१६) बृहत् साम पानी में डाले गए चावलों को मिलाने का काठ है तथा रथंतर साम बटलोई से भात निकालने की करछुलीस है. (१६) ऋतव: पक्तार आर्तवा: समिन्धते.. (१७) वसंत आदि ऋतुएं इस ओदन को पकाने वाली हैं और ऋतुओं संबंधी रातदिन अग्नि को जलाते हैं. (१७) चरुं पञ्चबिलमुखं घर्मो ३ भीन्धे.. (१८) गाय, अश्व, पुरुष, बकरी, भेड़ की उत्पत्ति का कारण विराट् ही चरु अर्थात् ओदन ebook converter DEMO Watermarks*