अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 737, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोता है. श्वास एवं उच्छवाए उस के रथ के घोड़े हैं. प्राण उस का सारथी है. कीर्ति उस के निकट आती है तथा उस के पास यश मिलते हैं उसे कीर्ति एवं यश मिलते हैं. (१४) स उदतिष्ठत् स प्रतीचीं दिशमनु व्यचलत्.. (१५) वह उठा और पूर्व दिशा में चल दिया. (१५) तं वैरुपं च वैराजं चापश्च वरुणश्च राजानुव्यचलन्.. (१६) जल, वरुण, वैरूप और वैराज उस के पीछेपीछे चले. (१६) वैरूपाय च वै स वैराजाय चाद्भ्यश्च वरुणाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (१७) जो इस प्रकार जानने वाले और व्रतधारी का अपमान करता है, वह वैरूप, वैराज, जल और राजा वरुण का अपराधी होता है. (१७) वैरूपस्य च वै स वैराजस्य चापां च वरुणस्य च राज्ञः प्रियं धाम भवति तस्य प्रतीच्यां दिशि.. (१८) जो यह बात जानता है, वह वैरूप, वैराज, जल और राजा वरुण का प्रिय धाम बनता है. (१८) इरा पुंश्चली हसो मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ प्रवर्तौ कल्मलिर्मणिः.. (१९) ऐसे व्यक्ति के लिए पश्चिम दिशा में भूमि स्त्री, हास्य प्रशंसा करने वाला, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात्रि केश, किरण कुंडल तथा तारे मणि होते हैं. (१९) अहश्च रात्री च परिष्कन्दौ मनो विपथम्. मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः. कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (२०) दिन और रात उस के रक्षक होते हैं. श्वेसोच्छ्वास क्रम से उस के रथ के अश्व हैं. प्राण उस का सारथी है. वायु उस सारथी का चाबुक है. कीर्ति एवं यश उस के आगे चलने वाले हैं. कीर्ति तथा यश उस के समीप हैं जो यह जानता है, उसे यश और कीर्ति मिलते हैं. (२०) स उदतिष्ठत् स उदीचीं दिशमनु व्यचलत्.. (२१) वह उठा और उत्तर दिशा की ओर चलने लगा. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*