भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 738, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 738

तं श्यैतं च नौधसं च सप्तर्षयश्च सोमश्च राजानुव्यचलन्.. (२२) श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा सोम उस के पीछे चलने लगे. (२२) श्यैताय च वै स नौधसाय च सप्तर्षिभ्यश्च सोमाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (२३) जो इस प्रकार जानने वाले व्रात्य का अपमान करता है, वह श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा सोम का अपराधी बनता है. (२३) श्यैतस्य च वै स नौधसस्य च सप्तर्षीणां च सोमस्य च राज्ञः प्रियं धाम भवति तस्योदीच्यां दिशि.. (२४) जो यह बात जान लेता है वह श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा वरुण का प्रिय बनता है. उत्तर दिशा में उस का प्रिय स्थान होता है. (२४) विद्युत् पुंश्चली स्तनयित्नुर्मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ प्रवतौ कल्मलिर्मणिः.. (२५) उस के लिए बिजली स्त्री, गरजने वाला मेघ प्रशंसक, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात केश, किरणें, कुंडल तथा तारे मणि बन जाते हैं. (२५) श्रुतं च विश्रुतं च परिष्कन्दौ मनो विपथम्.. (२६) ज्ञान और विज्ञान उस के रक्षक होते हैं तथा मन उस का युद्ध संबंधी रथ होता है. (२६) मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः.. (२७) श्वास और उच्छ्वास उस के रथ के घोड़े, प्राण सारथी और वायु उस का चाबुक बनता है. (२७) कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (२८) जो इस बात को जानता है कीर्ति और यश उस के आगे चलने वाले होते हैं. कीर्ति उस के पास आती है और यश उस के समीप आता है. (२८) सूक्त-३ देवता—अध्यात्म, व्रात्य सं संवत्सरमूर्ध्वो ऽ तिष्ठत् तं देवा अब्रुवन् व्रात्य किं नु तिष्ठसीति.. (१) वह एक वर्ष तक खड़ा रहा, तब देवताओं ने उस से पूछा—"हे व्रात्य! यह तप क्यों कर ebook converter DEMO Watermarks*