अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 779, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य का मैं प्रातः, सायं तथा मध्याह्न के कर्मों के द्वारा आह्वान करता हूं. उन की कृपा से मैं गाय, भैंस आदि पशुओं का प्रिय बनूं. (४) विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः समानानां भूयासम् (५) सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले सूर्य को मैं प्रातः, मध्याह्न और संध्या के कर्मों के द्वारा बुलाता हूं. उन इंद्र रूप सूर्य की कृपा से मैं अपने समान लोगों का प्रिय बनूं. (५) उदिह्युदिहि सूर्य वर्चसा माभ्युदिहि. द्विषंश्च मह्यं रध्यतु मा चाहं द्विषते रधं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (६) हे सूर्य देव! आप उदित हैं और उदित हो कर अपने तेज से मुझे प्रकाशित करें. जो लोग मुझ से द्वेष करते हैं. वे मेरे वश में हो जाएं. मैं किसी भी प्रकार उन के वशीभूत न बनूं. हे व्यापनशील सूर्य देव! आप का पराक्रम सीमारहित है आप मुझे अमुक रूपों वाले अर्थात् गाय, घोड़ा, भैंस आदि पशुओं से पूर्ण करं तथा परमव्योम में जो अमृत है, उस में मुझे स्थापित करें. (६) उदिह्युदिहि सूर्य वर्चसा माभ्युदिहि. याश्चं पश्यामि याश्चं न तेषु मा सुमतिं कृधि तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (७) हे सूर्य देव! तुम उदय होओ. हे अपने तेज से दूसरों को दबाने वाले सूर्य देव! तुम उदय होओ. मैं जिन को देख रहा हूं और जिन्हें नहीं देख रहा हूं, उन के विषय में मुझे शोभन बुद्धि वाला बनाओ. हे व्यापनशील सूर्य! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अंतहीन हैं. तुम मुझे अनेक रूपों वाले अर्थात् गाय, अश्व, भैंस आदि पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो अमृत है उस में मुझे स्थापित करो. (७) मा त्वा दभन्त्सलिले अप्स्व १ न्तर्ये पाशिन उपतिष्ठन्त्यत्र. हित्वाशस्तिं दिवमारुक्ष एतां स नो मृड सुमतौ ते स्याम तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (८) हे पाशों को धारण करने वाले सूर्य! राक्षस तुम्हें जलों में प्रवेश करने से न रोकें. तुम उस ebook converter DEMO Watermarks*