अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 780, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिंदा को त्याग कर आकाश में आरोहण करो. तुम मुझ पर कृपा करो. हम तुम्हारी शोभन बुद्धि में रहें. हे व्याप्त होने वाले सूर्य! यहां तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक हैं. तुम गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से हमें पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (८) त्वं न इन्द्र महते सौभागायादब्धेभिः परि पाह्यक्तुभिस्तवैद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (९) हे परम ऐश्वर्य संपन्न सूर्य! ऐश्वर्य को प्राप्त करने के हेतु तुम बहुत से पराक्रम करते हो. तुम व्याधि, चोर, भूत, राक्षस, अग्निदाह आदि की हिंसा से रहित दिवसों के द्वारा हमारी रक्षा करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से मुझे पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में मुझे स्थापित करो. (९) त्वं न इन्द्रोतिभिः शिवाभिः शांतमो भव. आरोहंस्त्रिदिवं दिवो गृणानः सोमपीतये प्रियधामा स्वस्तये तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१०) हे इंद्र! तुम अपनी मंगलमयी रक्षाओं के द्वारा हमारे लिए अधिक सुखकारी बनो. तुम अंतरिक्ष संबंधी स्वर्ग पर चढ़ते हुए सोम याग में सोमरस पीने के लिए आओ. हे प्रिय निवास स्थानों वाले इंद्र! तुम हमारे कल्याण के निमित्त पधारो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो और परम व्योम में जो सुधा है. उस में हमें स्थापित करो. (१०) त्वमिन्द्रासि विश्वजित् सर्ववित् पुरुहूतस्त्वमिन्द्र. त्वमिन्द्रेमं सुहवं स्तोममेरयस्व स नो मृड सुमतौ ते स्याम तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (११) हे इंद्र! तुम विश्वविजयी एवं सभी को जीतने वाले हो. हे इंद्र! तुम बहुतों के द्वारा यज्ञों में बुलाए जाने वाले हो. हे इंद्र! तुम इस समय की जाती हुई शोभन ज्ञान की साधन स्तुतियों के लिए हमें प्रेरित करो. तुम हमारी रक्षा करो. हम तुम्हारी उत्तम बुद्ध में रहें अर्थात् हमारे प्रति तुम्हारी श्रेष्ठ भावना हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित सुधा में स्थापित करो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*