अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 781, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअदब्धो दिवि पृथिव्यामुतासि न त आपुर्महिमानमन्तरिक्षे. अदब्धेन ब्रह्मणा वावृधानः स त्वं न इन्द्र दिवि षञ्छर्म यच्छ तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१२) हे इंद्र! तुम द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में तथा पृथ्वी पर किसी के द्वारा हिंसित नहीं हो. तात्पर्य यह है कि इन दोनों स्थानों पर कोई भी तुम्हारा विरोध करने का साहस नहीं करता है. आकाश में तुम्हारी महिमा को सहन करने में कोई समर्थ नहीं है. जिस की सामर्थ्य कुंठित नहीं होती है, ऐसे मंत्रों के द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हुए तुम हमारी रक्षा करो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, घोड़ा आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१२) या त इन्द्र तनूरप्सु या पृथिव्यां यान्तरग्नौ या त इन्द्र पवमाने स्वर्विदि. ययेन्द्र तन्वा३न्तरिक्षं व्यापिथ तया न इन्द्र तन्वा३ शर्म यच्छ तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१३) हे परम ऐश्वर्य वाले सूर्य! तुम्हारी जो विभूतियां जलों में, पृथ्वी पर, आकाश में हैं तथा तुम्हारी जो विभूति अंतरिक्ष में गतिशील वायु में है, हे इंद्र उन विभूतियों अथवा मूर्तियों के द्वारा हमें सुख प्रदान करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, भैंस आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में स्थित जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१३) त्वामिन्द्र ब्रह्मणा वर्धयन्तः सत्रं नि षेदुर्ऋषयो नाथमानास्तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१४) हे ऐश्वर्य वाले सूर्य! अंगिरा आदि प्राचीन ऋषि अपने मंत्रों के स्तोत्र आदि के द्वारा अपने सोमरस आदि के रूप वाले हवि से तुम्हारी वृद्धि करते हुए नियम से निवास करते रहें. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ये शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो एवं परमव्योम में व्याप्त जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१४) त्वं तृतं त्वं पर्येष्युत्सं सहस्रधारं विदथं स्वर्विदं तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१५) हे इंद्र! तुम विस्तृत अंतरिक्ष को व्याप्त करते हो. तुम अनेक धाराओं वाले जल को व्याप्त करते हो. तुम ज्ञान के साधन यज्ञ पर अधिकार करते हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य ebook converter DEMO Watermarks*