भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 782, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 782

अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित सुधा में स्थापित करो. (१५) त्वं रक्षसे प्रदिशश्चतस्रस्त्वं शोचिषा नभसी वि भासि. त्वमिमा विश्वा भुवनानु तिष्ठस ऋतस्य पन्थामन्वेषि विद्वांस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१६) हे सूर्य! तुम चारों दिशाओं की रक्षा करते हो और अपनी किरणों से आकाश को प्रकाशित करते हो. तुम इन सभी भुवनों को प्रकाशित करते हो. तुम सत्य अथवा यज्ञ की स्थिति जानते हुए उन के मार्गों को क्रम से व्याप्त करते हो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें धेनु, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो एवं परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१६) पञ्चभिः पराङ्तपस्येकयार्वाङशस्तिमेषि सुदिने बाधमानस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१७) हे सूर्य! तुम अपनी पांच किरणों से ऊपर की ओर मुख करके तपते हो तथा अपनी एक किरण से नीचे की ओर मुख करके पृथ्वी पर तपते हो. पाला, बादल आदि से रहित दिन की याचना करने पर तुम अपनी किरण से पृथ्वी पर तपते हो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनंत हैं. तुम गौ, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से हमें पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१७) त्वमिन्द्रस्त्वं महेन्द्रस्त्वं लोकस्त्वं प्रजापतिः. तुभ्यं यज्ञो वि तायते तुभ्यं जुह्वति जुह्वतस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१८) हे ऐश्वर्य शाली सूर्य! तुम स्वर्ग के स्वामी एवं महत्त्वपूर्ण गुण से युक्त हो. स्वर्ग आदि लोक तुम ही हो तथा तुम ही प्रजाओं के स्वामी हो. तुम्हारे लिए यज्ञ विस्तृत किए गए. (१८) असति सत् प्रतिष्ठितं सति भूतं प्रतिष्ठितम्. भूतं ह भव्य आहितं भव्यं भूते प्रतिष्ठितं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१९) यह दृश्यमान जगत् निराकार ब्रह्म में प्रतिष्ठित है. इस दृश्यमान जगत् में पृथ्वी आदि पांच तत्त्व प्रतिष्ठित हैं. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्व आदि सभी रूप के पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा स्थित है, उस में हमें स्थापित करो. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*