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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

अदब्धो दिवि पृथिव्यामुतासि न त आपुर्महिमानमन्तरिक्षे. अदब्धेन ब्रह्मणा वावृधानः स त्वं न इन्द्र दिवि षञ्छर्म यच्छ तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१२) हे इंद्र! तुम द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में तथा पृथ्वी पर किसी के द्वारा हिंसित नहीं हो. तात्पर्य यह है कि इन दोनों स्थानों पर कोई भी तुम्हारा विरोध करने का साहस नहीं करता है. आकाश में तुम्हारी महिमा को सहन करने में कोई समर्थ नहीं है. जिस की सामर्थ्य कुंठित नहीं होती है, ऐसे मंत्रों के द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हुए तुम हमारी रक्षा करो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, घोड़ा आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१२) या त इन्द्र तनूरप्सु या पृथिव्यां यान्तरग्नौ या त इन्द्र पवमाने स्वर्विदि. ययेन्द्र तन्वा३न्तरिक्षं व्यापिथ तया न इन्द्र तन्वा३ शर्म यच्छ तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१३) हे परम ऐश्वर्य वाले सूर्य! तुम्हारी जो विभूतियां जलों में, पृथ्वी पर, आकाश में हैं तथा तुम्हारी जो विभूति अंतरिक्ष में गतिशील वायु में है, हे इंद्र उन विभूतियों अथवा मूर्तियों के द्वारा हमें सुख प्रदान करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, भैंस आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में स्थित जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१३) त्वामिन्द्र ब्रह्मणा वर्धयन्तः सत्रं नि षेदुर्ऋषयो नाथमानास्तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१४) हे ऐश्वर्य वाले सूर्य! अंगिरा आदि प्राचीन ऋषि अपने मंत्रों के स्तोत्र आदि के द्वारा अपने सोमरस आदि के रूप वाले हवि से तुम्हारी वृद्धि करते हुए नियम से निवास करते रहें. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ये शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो एवं परमव्योम में व्याप्त जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१४) त्वं तृतं त्वं पर्येष्युत्सं सहस्रधारं विदथं स्वर्विदं तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१५) हे इंद्र! तुम विस्तृत अंतरिक्ष को व्याप्त करते हो. तुम अनेक धाराओं वाले जल को व्याप्त करते हो. तुम ज्ञान के साधन यज्ञ पर अधिकार करते हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य ebook converter DEMO Watermarks*

अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित सुधा में स्थापित करो. (१५) त्वं रक्षसे प्रदिशश्चतस्रस्त्वं शोचिषा नभसी वि भासि. त्वमिमा विश्वा भुवनानु तिष्ठस ऋतस्य पन्थामन्वेषि विद्वांस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१६) हे सूर्य! तुम चारों दिशाओं की रक्षा करते हो और अपनी किरणों से आकाश को प्रकाशित करते हो. तुम इन सभी भुवनों को प्रकाशित करते हो. तुम सत्य अथवा यज्ञ की स्थिति जानते हुए उन के मार्गों को क्रम से व्याप्त करते हो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें धेनु, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो एवं परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१६) पञ्चभिः पराङ्तपस्येकयार्वाङशस्तिमेषि सुदिने बाधमानस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१७) हे सूर्य! तुम अपनी पांच किरणों से ऊपर की ओर मुख करके तपते हो तथा अपनी एक किरण से नीचे की ओर मुख करके पृथ्वी पर तपते हो. पाला, बादल आदि से रहित दिन की याचना करने पर तुम अपनी किरण से पृथ्वी पर तपते हो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनंत हैं. तुम गौ, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से हमें पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१७) त्वमिन्द्रस्त्वं महेन्द्रस्त्वं लोकस्त्वं प्रजापतिः. तुभ्यं यज्ञो वि तायते तुभ्यं जुह्वति जुह्वतस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१८) हे ऐश्वर्य शाली सूर्य! तुम स्वर्ग के स्वामी एवं महत्त्वपूर्ण गुण से युक्त हो. स्वर्ग आदि लोक तुम ही हो तथा तुम ही प्रजाओं के स्वामी हो. तुम्हारे लिए यज्ञ विस्तृत किए गए. (१८) असति सत् प्रतिष्ठितं सति भूतं प्रतिष्ठितम्. भूतं ह भव्य आहितं भव्यं भूते प्रतिष्ठितं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१९) यह दृश्यमान जगत् निराकार ब्रह्म में प्रतिष्ठित है. इस दृश्यमान जगत् में पृथ्वी आदि पांच तत्त्व प्रतिष्ठित हैं. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्व आदि सभी रूप के पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा स्थित है, उस में हमें स्थापित करो. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*

शुक्रो ऽ सि भ्राजो ऽ सि. स यथा त्वं भ्राजता भ्राजो ऽ स्येवाहं भ्राजता भ्राज्यासम्.. (२०) हे सूर्य! तुम शुक्ल अर्थात् अत्यधिक उज्ज्वल हो तथा तुम दीप्तिशाली हो. तुम जिस प्रकार की ज्योति से पूर्ण रहते हो, मैं तुम्हारे उसी ज्योति पूर्ण भाव की उपासना करता हूं. (२०) रुचिरसि रोचो ऽ सि. स यथा त्वं रुच्या रोचो ऽ स्येवाहं पशुभिश्च ब्राह्मणवर्चसेन च रुचिषीय.. (२१) हे सूर्य! तुम दीप्ति रूप हो तथा दूसरों को दीप्ति वाला बनाते हो. तुम जिस प्रकार दीप्ति से दीप्ति मग्न हो, उसी प्रकार मैं पशुओं तथा ब्राह्मणोचित तेज से संपन्न बनूं. (२१) उद्यते नम उदयते नम उदिताय नमः. विराजे नमः स्वराजे नमःसम्राजे नमः.. (२२) हे सूर्य! उदय होते हुए तुम को नमस्कार है तथा उदय के पश्चात ऊपर उठते हुए तुम को नमस्कार है. हे विराट् रूप वाले सूर्य! तुम को नमस्कार है! स्वयं प्रकाशित होने वाले तुम को नमस्कार है. अतिशय रूप से प्रकाशित होने वाले तुम को नमस्कार है. (२२) अस्तंयते नमो ऽ स्तमेष्यते नमो ऽ स्तमिताय नमः. विराजे नमः स्वराजे नमः सम्राजे नमः.. (२३) अस्त होने वाले, अस्त हो रहे और अस्त हो चुके सूर्य देव को मेरा नमस्कार है. विशेष तेजवान को नमस्कार है, शोभनीय तेज वाले को नमस्कार है तथा उत्तम तेज वाले को नमस्कार है. (२३) उदगादयमादित्यो विश्वेन तपसा सह. सपत्नान् मह्यं रन्धयन् मा चाहं द्विषते रधं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (२४) यह सूर्य पूर्ण विश्व को संतप्त करने वाली किरणों के साथ उदय हुए हैं. ये मेरे शत्रुओं को मेरे वश में करते हैं तथा मुझे किसी शत्रु के वशीभूत नहीं बनाते. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनंत हैं. तुम मुझे गाय, भैंस आदि सभी पशुओं से पूर्ण करो और परम व्योम में जो सुधा है, उस में मुझे स्थित करो. (२४) आदित्य नावमारुक्षः शतारित्रां स्वस्तये. अहर्मत्यपीपरो रात्रिं सत्राति पारय.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे आदित्य अर्थात् अदिति पुत्र सूर्य! तुम रथ के लक्षणों वाली नाव पर सवार हो. वह नाव सौ डांडों वाली है. उस नाव पर तुम्हारे चढ़ने का प्रयोजन सभी का कल्याण है. इस प्रकार की नाव पर आरूढ़ तुम मुझे अनेक आध्यात्मिक, अधिभौतिक तथा अधिदैविक विविध बाधाओं से पार कर के रात्रि और दिन के मध्य मार्गों के पार पहुंचाओ. (२५) सूर्य नावमारुक्षः शतारित्रां स्वस्तये. रात्रिं मात्मपीपरो ऽ हः सत्राति पारय.. (२६) सूर्य देव सब के कल्याण के लिए सौ डांडों वाली नाव पर सवार होते हैं. यह नाव रथ के लक्षणों वाली है. हे सूर्य! रात्रि में मुझे कोई बाधा न पहुंचाए तथा दिन के तीनों सत्रों अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और संध्या से मुझे पार करो. (२६) प्रजापतेरावृतो ब्रह्मणा वर्मणाहं कश्यपस्य ज्योतिषा वर्चसा च. जरदष्टिः कृतवीर्यो विहायाः सहस्रायुः सुकृतश्रयेयम्.. (२७) वर्षा आदि के द्वारा प्रजाओं का पालन करने से सूर्य प्रजापति हैं. मैं प्रजापति सूर्य के कवच से तथा कश्यप ऋषि की ज्योति और तेज से घिरा हुआ हूं, सुरक्षित हूं. मैं जीर्ण अर्थात् वृद्ध हो कर भी दृढ़ अंगों वाला हूं तथा अनेक प्रकार के भोगों को भोगता हूं. मैं दीर्घ आयु प्राप्त करता हुआ तथा लौकिक और वेदों का कार्य करता हुआ सूर्य देव की कृपा का पात्र रहूं. (२७) परीवृतो ब्रह्मणा वर्मणाहं कश्यपस्य ज्योतिषा वर्चसा च. मा मा प्रापन्निषवो दैव्य या मा मानुषीरवसृष्टा वधाय.. (२८) मैं कश्यप रूपी सूर्य के मंत्र रूपी कवच से ढका हुआ हूं तथा सत्य और रक्षा करने वाली किरणों से आच्छादित हूं. इसलिए मनुष्य और देवता मेरी हिंसा करने के लिए जिन आयुधों का प्रयोग करते हैं, वे मुझे प्रभावित नहीं कर सकेंगे. (२८) ऋतेन गुप्त ऋतुभिश्च सर्वैभूतेन गुप्तो भव्येन चाहम्. मा मा प्राप्त पाप्मा मोत मृत्युरन्तर्दधे ऽ हं सलिलेन वाचः.. (२९) सत्य, सूर्यरूपी ब्रह्म और सभी ऋतुएं मेरी रक्षा कर रही हैं. इस कारण पाप मेरे समीप नहीं आ सकता जो नरक में निवास का कारण बनता है, मैं उसी प्रकार अदृश्य रहता हूं, जिस प्रकार अभिमंत्रित जल में छिपे प्राणी किसी को दिखाई नहीं देते. मैं पापों से सुरक्षित होने के लिए अपनेआप को अभिमंत्रित और पवित्र करता हूं. (२९) अग्निर्मा गोप्ता परि पातु विश्वत उद्यन्सूर्यो नुदतां मृत्युपाशान्. व्युच्छन्तीरुषसः पर्वता ध्रुवाः सहस्रं प्राणा मय्या यतन्ताम्.. (३०) अपने आश्रितों के रक्षक अग्नि देव मेरी रक्षा करें. उदय होते हुए सूर्य मृत्यु के पाशों से ebook converter DEMO Watermarks*

मेरी रक्षा करें. उषा मृत्यु के पाशों को मुझ से दूर रखें. मैं आयु की कामना करता हूं. मुझ में प्राण स्थित रहें. मेरी इंद्रियां चेष्टा करती रहें. (३०)

सूक्त-१ देवता—मंत्रों में कहे गए

अठारहवां कांड सूक्त-१ देवता—मंत्रों में कहे गए ओ चित् सखायं सख्या ववृत्यां तिरः पुरू चिदर्णवं जगन्वान्. पितुर्नपातमा दधीत वेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः.. (१) यमी का कथन—मैं समान प्रसिद्धि वाले मित्र यम को आदर भाव के अनुकूल बनाती हूं. समुद्र तट के समीप वाले द्वीप में चलते हुए यम अपने पुत्र को मुझ में स्थापित करें. हे यम! तुम्हारी प्रसिद्धि सभी लोकों में है. तुम सदा तेज से दीप्त रहो. (१) न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत् सलक्ष्मा यद् विषुरूपा भवाति. महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन्.. (२) यम का कथन—मैं तेरा सोदर अर्थात् एक ही पेट से उत्पन्न हुआ तेरा मित्र हूं. पर मैं भाई और बहन के समागम संबंधी मित्र भाव की इच्छा नहीं करता हूं. तू एक उदर से उत्पन्न हो कर भी मेरी पत्नी बनने की कामना करती है. मैं ऐसे मित्रभाव को स्वीकार नहीं करता हूं. शत्रुओं को दबाने वाले महाबली रुद्र के पुत्र मरुद्गण भी इस की निंदा करेंगे. (२) उशन्ति घा ते अमृतास एतदेकस्य चित् त्यजसं मर्त्यस्य. नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्व१मा विविश्याः.. (३) यमी—हे यम! मरुद्गण उस मार्ग की इच्छा करते हैं, जिस का मैं ने तुम से निवेदन किया है. इसलिए तुम अपने मन को मेरी ओर लगाओ. फिर तुम संतान को उत्पन्न करने वाले मेरे पति बनते हुए भाई के भाव को छोड़ कर मुझ में प्रविष्ट हो जाओ. (३) न यत् पुरा चकृमा कद्ध नूनमृतं वदन्तो अनृतं रपेम. गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नौ नाभिः परमं जामि तन्नौ.. (४) यम—हे यमी! असत्य बात को हम सत्य भाषण करने वाले किस प्रकार सत्य कहें? जल को धारण करने वाले सूर्य भी आकाश में अपनी पत्नी के सहित स्थित हैं. इसलिए एक ही माता और पिता वाले हम दोनों उन्हीं के सामने तेरी इच्छा पूर्ण करने में समर्थ न होंगे. (४) गर्भे नु नौ जनिता दम्पति कद्देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः. नकिरस्य प्र मिनन्ति व्रतानि वेद नावस्य पृथिवी उत द्यौः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

यमी—हे यम! संतान उत्पन्न करने वाले देव ने हम दोनों को माता के उदर में ही दांपत्य बंधन में बांध दिया है. उस देव के कर्म का जो फल है, उसे कौन निष्फल कर सकता है. त्वष्टा देव के गर्भ में ही हमारे दंपती बनाने वाले कर्म को आकाश और पृथ्वी दोनों जानते हैं. इस कारण यह असत्य नहीं है. (५) को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हणायून्. आसन्निषून् हृत्स्वसो मयोभून् य एषां भृत्यामृणधत् स जीवात्.. (६) यम—हे यमी! सत्य का भार वहन करने के निमित्त अपनी वाणी रूप वृषभ को कौन नियुक्त कर सकता है. कर्मठ, तेजस्वी, क्रोध और लज्जा से हीन तथा अपने शब्दों से श्रोताओं के हृदय में बैठने वाला जो पुरुष सत्य वचनों से ही वृद्धि करता है, वह उस के फल के कारण दीर्घजीवी होता है. (६) को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ईं ददर्श क इह प्र वोचत्. बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन्.. (७) यमी—हे यम! हमारे प्रथम दिन को कौन जान रहा है और कौन देख रहा है? फिर कौन पुरुष इस बात को दूसरों से कह सकेगा? दिन मित्र देवता का स्थान है. ये दोनों ही विशाल हैं. इसलिए मेरी इच्छा के प्रतिकूल मुझे क्लेश देने वाले तुम अनेक कर्मों वाले मनुष्यों के संबंध में ऐसा किस प्रकार कहते हो. (७) यमस्य मा यम्यं १ काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय. जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद् वृहेव रथ्येव चक्रा.. (८) मेरी इच्छा है कि पति को अपना शरीर अर्पण करने वाली पत्नी के समान यम को अपनी देह अर्पित करूं. वे दोनों पहिए के समान मार्ग में एकदूसरे से मिलते हैं. मैं उसी प्रकार की हो जाऊं. (८) न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति. अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा.. (९) यम—हे यमी! देवदूत लगातार विचरण करते रहते हैं. इसलिए हे मेरी धर्म बुद्धि को नष्ट करने की इच्छा करने वाली! तू मुझे छोड़ कर किसी अन्य को अपना पति बना तथा शीघ्र जा कर रथ के पहिए के समान संयुक्त हो जा. (९) रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत् सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात्. दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य विवृहादजामि.. (१०) यमी—यम के निमित्त यजमान दिनरात आहुति दें. प्रकाश करने वाला सूर्य का तेज नित्यप्रति इस के निमित्त उदय हो. आकाश और पृथ्वी जिस प्रकार आपस में मिले हुए हैं. ebook converter DEMO Watermarks*

उसी प्रकार मैं इस के भ्रातृत्व से अलग होती हुई इस से मिल जाऊं. (१०) आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि. उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्.. (११) यम—संभव है, आगे चल कर ऐसे ही दिन और रात आएं, जब बहन अपने बंधु भाव को छोड़ कर पत्नी का रूप प्राप्त करने लगेगी. पर अभी ऐसा नहीं हो रहा है. इसलिए हे यमी! तू स्त्री में गर्भ धारण करने में समर्थ किसी अन्य पुरुष की ओर अपना हाथ बढ़ा और मुझे छोड़ कर उसी को अपना पति बनाने की इच्छा कर. (११) किं भ्रातासद् यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निॠतिर्निगच्छात्. काममूता बह्वे ३ तद् रपामि तन्वा मे तन्वं १ सं पिपृग्धि.. (१२) यमी—वह भाई कैसा है, जिस के विद्यमान रहते हुए उस की बहन अपनी चाही हुई कामना से हीन रह जाए. वह कैसी बहन है, जिस के सामने ही उस का भाई काम संतप्त हो. इसी कारण तुम मेरी इच्छा के अनुसार आचरण करो. (१२) न ते नाथं यम्यत्राहमस्मि न ते तनूं तन्वा ३ सं पपृच्याम्. अन्येन मत् प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत्.. (१३) यम—हे यमी! मैं तेरी इस कामना को पूर्ण करने वाला नहीं हो सकता. मैं तेरी देह को स्पर्श नहीं कर सकता. इसलिए तू अब मुझे छोड़ कर किसी अन्य पुरुष से इस प्रकार का संबंध स्थापित कर. मैं तुझे पत्नी बनाने की कामना नहीं करता हूं. (१३) न वा उ ते तनूं तन्वा ३ सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्. असंयदेतन्मनसो हृदो मे भ्राता स्वसुः शयने यच्छयीय.. (१४) यम—हे यमी! मैं तेरे शरीर का स्पर्श नहीं कर सकता. धर्म के जानने वाले भाई और बहन के ऐसे संबंध को पाप कहते हैं. यदि मैं ऐसा करूं तो यह कर्म मेरे हृदय, मन और प्राण का नाश कर देगा. (१४) बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम. अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परि ष्वजातै लिबुजेव वृक्षम्.. (१५) यमी—हे यम! तेरी दुर्बलता पर मैं दुखी हूं. तेरा मन मुझ में नहीं लगा है. मैं अभी तक तेरे मन को नहीं समझ सकी. तू किसी अन्य स्त्री से संबंधित होगा. (१५) अन्यम् षु यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजातै लिबुजेव वृक्षम्. तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम्.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

यम—हे यमी! रस्सी जिस प्रकार घोड़े से मिलती है, बेल जैसे पेड़ से लिपट जाती है, उसी प्रकार तू किसी अन्य पुरुष से मिल. तुम दोनों परस्पर अनुकूल मन वाले बनो. इस के बाद तू अत्यधिक कल्याण वाले पुत्र को प्राप्त कर. (१६) त्रीणि च्छन्दांसि कवयो वि येतिरे पुरुरूपं दर्शतं विश्वचक्षणम्. आपो वाता ओषधयस्तान्येकस्मिन् भुवन आर्पितानि.. (१७) देवताओं ने संसार को ढकने का प्रयत्न किया. जल तत्त्व देखने में प्रिय लगने वाला तथा विश्व को देखने वाला है, वायु तत्त्व भी दर्शनीय और विश्व द्रष्टा है. ओषधि तत्त्व भी इसी प्रकार का है. इन तीनों तत्त्वों को देवताओं ने पृथ्वी का भरणपोषण करने के लिए प्रतिष्ठित किया है. (१७) वृषा वृष्णे दुदुहे दोहसा दिवः पयांसि यह्वो अदितेरदाभ्यः. विश्वं स वेद वरुणो यथा धिया स यज्ञियो यजति यज्ञियाँ ऋतून्.. (१८) महान अग्नि देव यजमान के निमित्त पाश आदि के द्वारा जल की वर्षा करते हैं. वे अपनी बुद्धि के माध्यम से सब को ऐसे जान लेते हैं, जैसे वरुण देव अपनी बुद्धि से सब को जानते हैं. ये ही अग्नि यज्ञ में देवों की पूजा करते हैं जो पूजा करने के योग्य हैं. (१८) रपद् गन्धर्वीरप्या च योषणा नदस्य नादे परि पातु नो मनः. इष्टस्य मध्ये अदितिर्नि धातु नो भ्राता नो ज्येष्ठः प्रथमो वि वोचति.. (१९) जल धारण करने वाले सूर्य की वाणी और अंतरिक्ष में विचरने वाली सरस्वती मेरे द्वारा अग्नि की स्तुति कराएं तथा मेरे स्तुति रूप नाद में मन की रक्षा करे. इस के बाद देवमाता अदिति मुझे फल के मध्य स्थापित करें. बंधु के समान हितकारी अग्नि मुझे उत्तम यजमान बनाएं. (१९) सो चिन्नु भद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती. यदीमुशन्तमुशतामनु क्रतुमग्निं होतारं विदथाय जीजनन्.. (२०) अध्वर्यु जनों ने देवताओं का आह्वान कर के अग्नि को देवों के हेतु हव्य वहन के लिए प्रकट किया है. तभी कल्याणमयी मंत्र रूप वाणी तथा सूर्य से संबंध रखने वाली उषा यज्ञ आदि की सिद्धि के लिए प्रकट होती है. (२०) अध त्यं द्रप्सं विभ्वं विचक्षणं विराभरदिषिरः श्येनो अध्वरे. यदि विशो वृणते दस्ममार्या अग्निं होतारमध धीरजायत.. (२१) जब सोम के लाए जाने के बाद यह को पूरा करने वाली अग्नि का वरण किया जाता है, तब सोम और अग्नि के सिद्ध होने पर अग्निष्टोम आदि कर्म भी पूर्ण होते हैं. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*

सदासि रण्वो यवसेव पुष्यते होत्राभिरग्ने मनुषः स्वध्वरः. विप्रस्य वा यच्छशमान उक्थ्यो ३ वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः.. (२२) हे अग्नि! तुम यज्ञ को सुंदरतापूर्वक पूर्ण करते हो. जिस प्रकार हरी घास आदि को खाने वाला पशु अपने पालने वाले को सुंदर दिखाई देता है, उसी प्रकार घृत आदि से अपनेआप को पुष्ट करने वाले यजमान के लिए तुम दर्शनीय हो जाते हो. (२२) उदीरय पितरा जार आ भगमियक्षति हर्यतो हृत्त इष्यति. विवक्ति वह्निः स्वपस्यते मखस्तविष्यते असुरो वेपते मती.. (२३) हे अग्नि! आकाशरूपी अपने पिता और पृथ्वीरूपी माता को तुम यहां के लिए प्रेरित करो. जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश को प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार तुम अपने तेज को प्रेरित करो. यह यजमान जिन देवताओं की कामना करता है, अग्नि स्वयं उस की कामना करते हैं. वे इच्छित पदार्थ देने की बात कहते हैं और यज्ञ के हेतु यजमान के समीप आते हैं. (२३) यस्ते अग्ने सुमतिं मर्तो अख्यत् सहसः सूनो अति स प्र शृण्वे. इषं दधानो वहमानो अश्वैरा द्युमां अमवान् भूषति द्यून.. (२४) हे अग्नि! जो यजमान तुम्हारी कृपा का दूसरों के सामने वर्णन करता है, वह तुम्हारी कृपा के कारण सभी जगह प्रसिद्ध होता है. वह अन्न, अश्व आदि से युक्त होता हुआ चिरकाल तक ऐश्वर्य से प्रतिष्ठित रहता है. (२४) श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्. आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानाम्प भूरिह स्याः.. (२५) हे अग्नि! तुम इस देव स्थान अर्थात् यज्ञशाला में हमारा आह्वान सुनो. तुम अपने जल बरसाने वाले रथ को लाने लिए प्रस्तुत करो. जो आकाश और पृथ्वी देवताओं के पलक के समान है, उन्हें भी अपने साथ लाओ. ऐसा कोई भी देवता शेष न रहे जो यहां न आया हो. (२५) यदग्न एषा समितिर्भवाति देवी देवेषु यजता यजत्र. रत्ना च यद् विभाजासि स्वधावो भागं नो अत्र वसुमन्तं वीतात्.. (२६) हे अग्नि! तुम पूजा करने योग्य हो. जब देवताओं में स्रोतों और हवियों की संगति हो, तब तुम स्तुति करने वालों के लिए रत्न दाता बनो तथा उन्हें बहुत धन प्रदान करो. (२६) अन्वग्निरुषसामग्रमख्यदन्वहानि प्रथमो जातवेदाः. अनु सूर्य उषसो अनु रश्मीननु द्यावापृथिवी आ विवेश.. (२७) अग्नि उषा काल के साथ ही प्रकाशित होते हैं. ये दिनों के साथ भी प्रकाशित होते हैं. ये ebook converter DEMO Watermarks*

ही अग्नि सूर्य बन कर उषा की ओर अपनी किरणें प्रकाशित करते हैं. ये ही सूर्यात्मक अग्नि आकाश और पृथ्वी को सब ओर से प्रकाशित रखते हैं. (२७) प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यत् प्रत्यहानि प्रथमो जातवेदाः. प्रति सूर्यस्य पुरुधा च रश्मीन् प्रति द्यावापृथिवी आ ततान.. (२८) ये अग्नि उषाकाल में नित्य प्रकाशित होते तथा दिन के समय भी प्रकाश वाले रहते हैं. ये ही सूर्यात्मक अग्नि अनेक प्रकार से प्रकट होने वाली किरणों में भी प्रकाश भरते हैं. ये आकाश और पृथ्वी दोनों को प्रकाश से भर देते हैं. (२८) द्यावा ह क्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा. देवो यन्मर्त्तान् यजथाप कृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ् स्वमसुं यन्.. (२९) आकाश और पृथ्वी मुख तथा सत्य वाणी हैं. जब अग्नि देव यजमान के समीप आ कर यज्ञ संपन्न करने के लिए बैठे, तब ये आकाश और पृथ्वी स्तुति सुनने के योग्य हैं. (२९) देवो देवान् परिभूरृतेन वहा नो हव्यं प्रथमश्चिकित्वान्. धूमकेतुः समिधा भ्राऋजीको मन्द्रो होता नित्यो वाचा यजीयान्.. (३०) हे अग्नि! तुम प्रचंड ज्वालाओं से संपन्न हो. तुम पूज्य देवताओं को यज्ञ के द्वारा अपने वश में करते हुए तथा उन के पूजन की इच्छा करते हुए उन के पास हवि को पहुंचाओ. तुम धूम रूप ध्वजा वाले, समिधाओं से दीप्त होने वाले, देव वाहक तथा पूजा के पात्र हो. तुम हमारी हवि को देवों के समीप पहुंचाओ. (३०) अर्चामि वां वर्धयापो घृतस्नू द्यावाभूमी शृणुतं रोदसी मे. अहा यद् देवा असुनीतिमायन् मध्वा नो अत्र पितरा शिशीताम्.. (३१) हे आकाश और पृथ्वी के अधिष्ठाता देवताओ! मैं यज्ञकर्म की सिद्धि के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. हे आकाश और पृथ्वी! तुम दोनों मेरी स्तुति को सुनो तथा जब ऋत्विज् अपने यज्ञ कार्य में लगा हो, तब तुम जल प्रदान के द्वारा हमारी वृद्धि करो. (३१) स्वावृग् देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी. विश्वे देवा अनु तत् ते यजुर्गुर्दुहे यदेनी दिव्यं घृतं वाः.. (३२) अमृत के समान उपकार करने वाला जल जब किरणों से प्रकट होता है, तब ओषधियां आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होती हैं. जब अग्नि की दीप्तियां अंतरिक्ष से टपकने वाले जल का दोहन करती हैं, तब हे अग्नि! उस जल का सब अनुगमन करते हैं जो तुम्हारे द्वारा प्रकट किया जाता है. (३२) किं स्विन्नो राजा जगृहे कदस्याति व्रतं चक्रमा को वि वेद. ebook converter DEMO Watermarks*

मित्रश्चिद्धि ष्मा जुहुराणो देवाञ्छलोको न यातामपि वाजो अस्ति.. (३३) देवताओं में क्षत्रिय संबंधी शक्ति वाले यम हमारे हव्य का कुछ भाग ग्रहण करें. कहीं हम से उस कार्य का अतिक्रमण हो गया जो यम को प्रसन्न करने में सक्षम है तो यहां देवों का आह्वान करने वाले अग्नि विराजमान हैं. वे ही हमारे अपराध को दूर करेंगे. हमारे पास स्तुति के समान हवि भी है. उस के द्वारा हम अग्नि को संतुष्ट कर के यम के अपराध से छूट सकते हैं. (३३) दुर्मन्त्वत्रामृतस्य नाम सलक्ष्मा यद् विषुरूपा भवाति. यमस्य यो मनवते सुमन्त्वग्ने तमृष्व पाह्यप्रयुच्छन्.. (३४) यहां पर यम का नाम लेना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि उन की बहन ने उन की पत्नी बनने की इच्छा की थी. फिर भी जो इन यम की स्तुति करे, हे अग्नि! तुम उस निंदा को भुलाते हुए उस स्तोता की रक्षा करो. (३४) यस्मिन् देवा विदथे मादयन्ते विवस्वतः सदने धारयन्ते. सूर्ये ज्योतिरदधुर्मास्य १ क्तून् परि द्योतनिं चरतो अजस्रा.. (३५) जिस अग्नि के यज्ञ पूर्ण कराने वाले रूप से प्रतिष्ठित होने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा जिस के कारण मनुष्य सूर्यलोक में निवास करते हैं, जिस अग्नि ने ही देवताओं के प्रकाशमान तेज को तीनों लोकों में प्रतिष्ठित किया है तथा अंधकार का नाश करने वाली किरणों को जिस से लेकर चंद्रमा में स्थापित किया है, सूर्य और चंद्रमा ऐसे तेजस्वी अग्नि की निरंतर पूजा करते हैं. (३५) यस्मिन् देवा मन्मनि संचरन्त्यपीच्ये ३ न वयमस्य विद्म. मित्रा नो अत्रादितिरनागान्त सविता देवो वरुणाय वोचत्.. (३६) वरुण के जिस स्थान में देवता घूमते हैं, उस स्थान से हम परिचित नहीं हैं. देवगण उस स्थान से हमारे निर्दोष होने की बात कहें. सविता अदिति, आकाश तथा मित्र देवता भी अग्नि की कृपा से हम को निर्दोष कहें. (३६) सखाय आ शिषामहे ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे. स्तुष ऊ षु नृतमाय धृष्णवे.. (३७) हम सखा रूप इंद्र के लिए दृढ़ कार्य करने की इच्छा रखते हैं. उन शत्रुओं का मर्दन करने वाले महान नेता और वज्रधारी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (३७) शवसा ह्यसि श्रुतो वृत्रहत्येन वृत्रहा. मघैर्मघोनो अति शूर दाशसि.. (३८) हे वृत्र राक्षस का विनाश करने वाले इंद्र! तुम जिस प्रकार वृत्र राक्षस का हनन करने ebook converter DEMO Watermarks*

वाले रूप में प्रसिद्ध हो, उसी प्रकार अपने धन के कारण भी विख्यात हो. तुम अपना धन मुझे प्रदान करो. (३८) स्तेगो न क्षामत्येषि पृथिवीं मही नो वाता इह वान्तु भूमौ. मित्रो नो अत्र वरुणो युज्यमानो अग्निर्वने न व्यसृष्ट शोकम्.. (३९) वर्षा ऋतु में मेढक जिस प्रकार पृथ्वी को लांघ जाता है, उसी प्रकार तुम पृथ्वी को लांघ कर ऊपर जाते हो. अग्नि की कृपा से वायु हमारे लिए सुखकर हो. मित्र एवं वरुण देवता भी हमें सुख देने वाले कार्य में लगें. अग्नि जिस प्रकार तिनकों आदि को भस्म करते हैं, उसी प्रकार हमारे शोक को समाप्त करें. (३९) स्तुहि श्रुतं गर्तसदं जनानां राजानं भीममुपहत्नमुग्रम्. मृडा जरित्रे रुद्र स्तवानो अन्यमस्मत् ते नि वपन्तु सेन्यम्.. (४०) हे स्तोता! उन रुद्र देवता की स्तुति करो, जिन का निवास स्थान श्मशान में है, जो पिशाच आदि के स्वामी हैं तथा जो पराक्रमी, भय उत्पन्न करने वाले तथा समीप आ कर हिंसित करने वाले हैं. हे दुःख का नाश करने वाले इंद्र! तुम हमारी स्तुति से प्रसन्न हो कर हमें सुख प्रदान करो. तुम्हारी सेना हम को त्याग कर उन पर आक्रमण करे जो हम से द्वेष रखते हैं. (४०) सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने. सरस्वतीं सुकृतो हवन्ते सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्.. (४१) मृतक संस्कार करने वाले तथा अग्नि की इच्छा करते हुए पुरुष सरस्वती का आह्वान करते हैं. हम ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों में भी सरस्वती को बुलाते हैं. देवी सरस्वती हवि प्रदान करने वाले यजमान को मनचाहा धन दें. (४१) सरस्वतीं पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः. आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वमनमीवा इष आ धेह्यस्मे.. (४२) वेदी की दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित पितर भी सरस्वती का आह्वान करते हैं. हे पितरो! तुम इस यज्ञ में विराजमान होते हुए प्रसन्न रहो. तुम सरस्वती को प्रसन्न करो तथा हवियों को प्राप्त कर के संतुष्ट बनो. हे सरस्वती! तुम पितरों के द्वारा बुलाई गई हो. तुम हम में ऐसे अन्न को स्थापित करो जो रागरहित और हमारा इच्छित है. (४२) सरस्वति या सरथं ययाथोक्यैः स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती. सहस्रार्घमिडो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानाय धेहि.. (४३) हे सरस्वती! तुम अपनेआप को तृप्त करती हुई पितरों सहित एक ही रथ पर आती हो. अनेक व्यक्तियों तथा प्रजाओं को तृप्त कर के अन्न के भाग को और अन्न के बल को मुझ ebook converter DEMO Watermarks*

यजमान को प्रदान करो. (४३) उदीरतामवर उत् परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः. असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नो ऽ वन्तु पितरो हवेषु.. (४४) अवस्था एवं गुणों में श्रेष्ठ, निकृष्ट एवं मध्यम श्रेणी के पितर भी उठें. ये पितर सोम का भक्षण करने वाले हैं. ये प्राण से उपलक्षित शरीर को प्राप्त होने वाले, अहिंसक और पदार्थ के ज्ञाता हैं. बुलाए जाने पर ये पितर हमारी रक्षा करें. (४४) आहं पितॄन्त्सुविदत्रां अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः. बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः.. (४५) मैं कल्याण करने वाले पितरों के सामने उपस्थित होता हूं. मैं यज्ञ की रक्षा करने वाले अग्नि के सामने उपस्थित होता हूं. इसलिए जो पितर बर्हिषद अर्थात् कुशाओं पर बैठने वाले हैं, वे स्वधा के साथ सोमरस पीते हैं. हे अग्नि! उन्हें मेरे समीप बुलाओ. (४५) इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो ये अपरास ईयुः. ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु दिक्षु.. (४६) जो पितर पहले पितरलोक को प्राप्त हुए थे तथा जो अब वहां गए हैं, जो अभी पृथ्वीलोक में ही हैं तथा जो भिन्नभिन्न दिशाओं में हैं, उन सभी पितरों को नमस्कार है. (४६) मातली कव्यैर्यमो अङ्गिारोभिर्बृहस्पतिर्ऋक्वभिर्वावृधानः. यांश्च देवा वावृधुर्यै च देवांस्ते नो ऽ वन्तु पितरो हवेषु.. (४७) मातलि नाम वाले पितृ देवता यजमान के द्वारा दिए गए हवि से कव्य नाम वाले पितरों के साथ वृद्धि पाते हैं. पितरों के नेता यम नाम के देव यजमान को इस हवि से अंगिरा नाम के पितरों के साथ बढ़ते हैं. मातलि आदि देवता जिन पितरों के यज्ञ में प्रबुद्ध करते हैं तथा जो कव्यादि की आहुति से प्रबुद्ध करते हैं, वे पितर आह्वान काल में हमारी रक्षा करें. (४७) स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवां उतायम्. उतो न्व १ स्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु.. (४८) यह सोमरस निश्चित रूप से स्वादिष्ट है, यह सोमरस माधुर्य गुण से युक्त है. यह सोमरस पीने में निश्चित रूप से तीखा लगता है. यह सोम उत्तम स्वाद वाला है. इस को पीने के इच्छुक इंद्र को संग्राम में कोई भी सहन नहीं कर पाता. तात्पर्य यह है कि संग्राम में इंद्र के सामने कोई भी नहीं टिक पाता है. (४८) परेयिवांसं प्रवतो महीरिति बहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानम्. वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत.. (४९) ebook converter DEMO Watermarks*

पृथ्वी को लांघ कर दूर देश में गमन करने वाले अनेक पितरों के मार्ग पर चलने वाले विवस्वान् अर्थात् सूर्य के पुत्र मृतकों के धाम रूप यमराज को रखते हैं. (४९) यमो नो गातुं प्रथमो विवेद नैषा गव्यूतिरपभर्तवा उ. यत्रा नः पूर्वे पितरः परेता एना जज्ञानाः पथ्या ३ अनु स्वाः.. (५०) यम ने सब से पहले हमारे मार्ग को जाना. यह मार्ग अपसरण अर्थात् छुटकारे के लिए नहीं है. इस मार्ग से छुटकारा नहीं पाया जा सकता. जहां पर हमारे पूर्वज पितर गए हैं, इस मार्ग को न जानने वाले प्राणी अपनेअपने कर्मों के अनुसार जाते हैं. (५०) बर्हिषदः पितर ऊत्य १ र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्. त आ गतावसा शांतमेनाधा नः शं योररपो दधात.. (५१) हे यज्ञ में आए हुए एवं कुशों पर बैठे हुए पितरो! तुम हमारी रक्षा करने के लिए हमारे सामने आओ. ये हवियां तुम्हारे निमित्त हैं. तुम इन का सेवन करो. तुम अपने कल्याणकारी रक्षा साधनों के साथ आओ तथा राग का शमन करने वाले तथा पाप का नाश करने वाले बल को हम में स्थापित करो. (५१) आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येदं नो हविरभि गृणन्तु विश्वे. मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद् व आगः पुरुषता कराम.. (५२) हे पितरो! घुटने सिकोड़ कर वेदी की दक्षिण दिशा में बैठे हुए तुम हमारी हवि की प्रशंसा करो. हमारे किसी भी छोटे अथवा बड़े अपराध के कारण हमारी हिंसा मत करना. मनुष्य स्वभाव के कारण हम से अपराध का होना असंभव नहीं है. (५२) त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोति तेनेदं विश्वं भुवनं समेति. यमस्य माता पर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश.. (५३) सिंचित वीर्य को पुरुष आदि की आकृति में बदलने वाले त्वष्टा ने अपनी पुत्री सरण्यु का विवाह किया. उसे देखने के लिए पूरा विश्व एकत्र हुआ. यम की माता सरण्यु जब सूर्य से विवाह हुआ, तब सूर्य की अधिक प्रभाव वाली पत्नी उन के समीप से अदृश्य हो गई. (५३) प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्यायैर्यैना ते पूर्वे पितरः परेताः. उभा राजानौ स्वधया मदन्तौ यमं पश्यासि वरुणं च देवम्.. (५४) हे प्रेत! जिस अर्थी को मनुष्य उठाते हैं. उस से यम के मार्ग को गमन करो. तुम्हारे पूर्व पुरुष इसी मार्ग से गए हैं. वहां देवताओं में अग्नि के समान कर्म करने वाले वरुण और यम दोनों हैं. वे हमारे द्वारा दी गई हवियों से प्रसन्न हो रहे हैं. इस लोक में तुम यम और वरुण के दर्शन करोगे. (५४) ebook converter DEMO Watermarks*

अपेत वीत वि च सर्पतातो ऽ स्मा एतं पितरो लोकमक्रन्. अहोभिरद्भिरक्तुभिर्व्यक्तं यमो ददात्यवसानमस्मै.. (५५) हे राक्षसो! तुम इस स्थान से भागो. तुम चाहे यहां पर पहले से रहते हो अथवा नए आकर रहने लगे हो, तुम यहां से चले जाओ, क्योंकि यह स्थान इस प्रेत के लिए दिन, रात और जल के सहित रहने के लिए यम ने प्रदान कियाहै. (५५) उशन्तस्त्वेधीमहुशन्तः समिधीमहि. उशन्नुशत आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (५६) हे अग्नि! इस पितृ यज्ञ को संपन्न करने के लिए हम तुम्हारी कामना करते हैं तथा तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम भलीभांति प्रदीप्त हो कर स्वधन की इच्छा करने वाले पितरों को लिए हवि भक्षण करने आओ. (५६) द्युमन्तस्त्वेधीमहि द्युमन्तः समिधीमहि. द्युमान् द्युमत आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (५७) हे अग्नि! हम तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम्हारी कृपा से हम यशस्वी हो गए हैं. हम तुम्हें प्रदीप्त करते हैं. तुम हमारी हवि स्वीकार कर के उसे भक्षण करने के लिए पितरों के यहां ले आओ. (५७) अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः. तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (५८) प्राचीन अंगिरा ऋषि हमारे पितर हैं. नवीन स्तोक वाले अथर्वा तथा भृगु हमारे पितर हैं. ये सब सोमरस का पान करने वाले हैं. हम उन की कृपा दृष्टि में रहें. वे हम से प्रसन्न रहें. (५८) अङ्गिरोभिर्यज्ञियेरा गहीह यम वैरूपैरिह मादयस्व. विवस्वन्तं हुवे यः पिता ते ऽ स्मिन् बर्हिष्या निषद्य.. (५९) हे यम! अंगिरा नाम के यज्ञ संबंधी पितरों के साथ यहां आ कर तृप्त बनो. मैं तुम को ही नहीं, तुम्हारे पिता सूर्य को भी बुलाता हूं, जिस से वे इस कुश के आसन पर बैठ कर हवि ग्रहण करें. मैं इस प्रकार तुम्हें आहूत करता हूं. (५९) इमं यम प्रस्तरमा हि रोहाङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः. आ त्वा मन्त्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन् हविषो मादयस्व.. (६०) हे यम! तुम अंगिरा नाम वाले पितरों के समान मति वाले बन कर कुश के इस आसन पर बैठो. महर्षियों के मंत्र तुम्हें बुलाने में समर्थ हों. तुम हवि प्राप्त कर के प्रसन्न बनो. (६०) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-२ देवता—यम तथा मंत्र में कहे

इत एत उदारुहन् दिवस्पृष्ठान्यारुहन्. प्र भूर्जयो यथा पथा द्यामाङ्गिरसो ययुः (६१) दाह संस्कार करने वाले पुरुषों ने मृतक को पृथ्वी से उठा कर अरथी पर रखा और आकाश के उपभोग योग्य स्थानों पर चढ़ा दिया. पृथ्वी को जीतने वाले आंगिरस जिस मार्ग से गए हैं, उसी मार्ग से इसे भी आकाश में पहुंचा दिया. (६१) सूक्त-२ देवता—यम तथा मंत्र में कहे गए यमाय सोमः पवते यमाय क्रियते हविः. यमं ह यज्ञो गच्छत्यग्निदूतो अरंकृतः.. (१) यज्ञ में यम के लिए सोम को पवित्र किया जाता है. यम के लिए हवि दी जाती है. नाना प्रकार के द्रव्यों से सुशोभित किया गया यज्ञ अग्नि को दूत बना कर यम के पास जाता है. ये ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ यम को प्राप्त होते हैं. (१) यमाय मधुमत्तमं जुहोता प्र च तिष्ठत. इदं नम ऋषिभ्यः पूर्वजेभ्यः पूर्वेभ्यः पथिकृद्भ्यः.. (२) हे यजमानो! यम के लिए सोम, घृत आदि की आहुति दो. पूर्व पुरुषों तथा मंत्र द्रष्टा अंगिरा आदि ऋषियों के लिए नमस्कार हैं. (२) यमाय घृतवत् पयो राज्ञे हविर्जुहोतन. स नो जीवेष्वा यमेद् दीर्घमायुः प्र जीवसे.. (३) हे यजमानो! घृत से युक्त क्षीर रूप हवि यम के लिए अर्पण करो. वे हवि पा कर हमें जीवित मनुष्यों में रखेंगे और सौ वर्ष की आयु प्रदान करेंगे. (३) मैनमग्ने वि दहो माभि शूशुचो मास्य त्वचं चिक्षिपो मा शरीरम्. शृतं यदा करसि जातवेदो ऽ थेमेनं प्र हिणुतात् पितृंरुप.. (४) हे अग्नि! इस प्रेत को भस्म मत करो; इस की त्वचा को अन्यत्र मत फेंको. इस के लिए शोक भी मत करो. जब तुम इस हवि रूप शरीर को पका लो, तब इसे रक्षा के लिए पितरों को दो. इस प्रेत की आत्मा पितृलोक में चली जाए. (४) यदा शृतं कृणवो जातवेदो ऽ थेममेनं परि दत्तात् पितृभ्यः. यदो गच्छात्यसुनीतिमेतामथ देवानां वशनीर्भवाति.. (५) हे जातवेद अग्नि! जब तू इस प्रेत को पूरी तरह भस्म कर दे, तब इसे पितरों के लिए ebook converter DEMO Watermarks*

सौंप दे. जब इस के प्राण निकल जाते हैं, तब यह प्रेत देवों के वश में हो जाता है. (५) त्रिकद्रुकेभिः पवते षडुर्वीरिकमिद् बृहत्. त्रिष्टुब् गायत्री छन्दांसि सर्वा ता यम आर्पिता.. (६) यह सब का नियंत्रण करने वाला तथा महान यम कद्रुक नाम के तीन यंत्रों से छह उर्वियों को प्राप्त होता है. त्रिष्टुप, गायत्री आदि छंद सब का नियंत्रण करने वाले परमात्मा में स्थित हैं. (६) सूर्य चक्षुषा गच्छ वातमात्मना दिवं च गच्छ पृथिवीं च धर्मभिः. अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः.. (७) हे प्रेत! तू नेत्र द्वार से सूर्य को प्राप्त हो. तू आत्मा के द्वारा वायु को प्राप्त हो तथा वन्य इंद्रियों से आकाश और पृथ्वी को प्राप्त हो तथा अंतरिक्ष और जल को प्राप्त हो. यदि इन स्थानों में जाने की तेरी इच्छा हो तो जा अथवा ओषधि आदि में प्रविष्ट हो जा. (७) अजो भागस्तपसस्तं तपस्व तं ते शाचिस्तपतु तं ते अर्चिः. यास्ते शिवास्तन्वो जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्.. (८) हे अग्नि! इस प्रेत का जो जन्म न लेने वाला भाग अर्थात् आत्मा है, उसे तुम अपने तप से संतप्त करो. तेरी दीप्त होती हुई ज्वाला इस प्रेत की आत्मा को तपाए. हे जातवेद अग्नि! तेरा जो ज्वलारूपी कल्याणकारी शरीर है, उस के द्वारा इस प्रेत की आत्मा को उत्तम कर्म करने वालों के लोक में ले जा. (८) यास्ते शोचयो रंहयो जातवेदो याभिरापृणासि दिवमन्तरिक्षम्. अजं यन्तमनु ताः समृण्वतामथेतराभिः शिवतमाभिः शृतं कृधि.. (९) हे जातवेद अग्नि! तेरा जो ज्वलारूपी शरीर है, उस से तू द्युलोक तथा अंतरिक्ष लोक व्याप्त करता है. तेरा ज्वलारूपी शरीर द्युलोक को जाती हुई इस प्रेत की आत्मा के पीछे जाए तथा दूसरे कल्याणकारी शरीरों के पीछे रह गई इस प्रेत की मृत देह को पूरी तरह जला दे. (९) अव सृज पुनरग्ने पितृभ्यो यस्त आहुतश्चरति स्वधावान्. आयुर्वसान उप यातु शेषः सं गच्छतां तन्वा सुवर्चाः.. (१०) हे अग्नि! हवि के रूप में जो प्रेत तुम्हें दिया गया है तथा हमारे प्रति स्वधा से संपन्न हो कर तुम्हारे द्वारा जलाया जा रहा है, उसे तुम पितृलोक के लिए छोड़ दो. उस का पुत्र आयु से संपन्न होता हुआ अपने घर को लौटे. यह प्रेत सुंदर शक्ति वाला तथा पितृलोक में निवास करने वाला हो. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

अति द्रव श्वानौ सारमेयौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा. अधा पितृन्त्सुविदत्राँ अपीहि यमेन ये सधमादं मदन्ति.. (११) हे प्रेत! तू पितृलोक को जाने वाला है. तू सरमा नाम की देवों की कुतिया के श्याम और शबल नाम वाले दोनों पुत्रों के साथ प्रसन्न रहने वाले एवं हव्य संपन्न पितरों के पास पहुंचे. (११) यौ ते श्वानौ यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिषदी नृचक्षसा. ताभ्यां राजन् परि धेह्येनं स्वस्त्यस्मा अनमीवं च धेहि.. (१२) हे पितरों के प्रभु! पितर मार्ग में स्थित चार नेत्रों वाले जो कुत्ते यमपुर की रक्षा करने के हेतु तुम्हारे द्वारा नियुक्त किए गए हैं, इस प्रेत की रक्षा के लिए उन्हें सौंप दो. यह तुम्हारे लोक में रहने को आया है. इसे बाधा रहित स्थान दो. (१२) उरूणसावसुतृपावुदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु. तावस्मभ्यं दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम्.. (१३) बड़ीबड़ी नाक वाले प्राणियों के प्राणों से तृप्ति को प्राप्त हुए तथा प्राणों का अपहरण करने वाले महाबली यमदूत सभी जगह घूमते हैं. ये दोनों दूत सूर्य दर्शन के निमित्त पांच इंद्रियों वाले प्राण को हमारे शरीर में पुनः स्थापित करें. (१३) सोम एकेभ्यः पवते घृतमेक उपासते. येभ्यो मधु प्रधावति तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१४) कुछ पितरों के लिए नदी के रूप में सोमरस बहता है. अन्य पितर घृत का उपभोग करते हैं. ब्रह्म याग में अथर्ववेद के मंत्रों का पाठ करने वालों के लिए मधु अर्थात् शहद की नदी है. हे मृतात्मा को प्राप्त प्रेत! तू उन सब को प्राप्त हो. (१४) ये चित् पूर्व ऋतसाता ऋतजाता ऋतावृधः. ऋषीन् तपस्वतो यम तपोज़ाँ अपि गच्छतात्.. (१५) जो पूर्व पुरुष सत्य से युक्त थे, जो साम से उत्पन्न हो कर सत्य की वृद्धि करते थे, हे यम के निमित्त पुरुष! उन तपोबल वाले ऋषियों को तू प्राप्त हो. (१५) तपसा ये अनाधृष्यास्तपसा ये स्वर्ययुः. तपो ये चक्रिरे महस्तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१६) तप के द्वारा, यज्ञ आदि साधनों के द्वारा, दुष्कर कर्म और उपासना के द्वारा महान तप करते हुए जो पुरुष पुण्य लोकों को जाते हैं, हे पुरुष! तू उन तपस्वियों के लोकों को जा. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

ये युध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनूत्यजः. ये वा सहस्रदक्षिणास्तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१७) जो वीर पुरुष युद्धों में शत्रुओं पर प्रहार करते हैं, जो रणक्षेत्र में शरीर का त्याग करते हैं तथा जो अन्न, दक्षिणा आदि वाले यज्ञों को पूर्ण करते हैं, उन्हें जो फल प्राप्त है, तू उन सभी फलों को प्राप्त कर. (१७) सहस्रणीथाः कवयो ये गोपायन्ति सूर्यम्. ऋषीन् तपस्वतो यम तपोजाँ अपि गच्छतात्.. (१८) जो अनंत द्रष्टा ऋषि सूर्य की रक्षा करते हैं, हे पुरुष! तू यम के पास ले जाने वाला हो कर उन तपस्वी ऋषियों के कर्म फल को प्राप्त कर. (१८) स्योनास्मै भव पृथिव्यनृक्षरा निवेशनी. यच्छास्मै शर्म सप्रथाः.. (१९) हे वेदी रूपिणी पृथ्वी! तू मरने वाले पुरुष के लिए कंटकहीन बन जा तथा इसे सभी प्रकार का सुख प्रदान कर. (१९) असंबाधे पृथिव्या उरौ लोके नि धीयस्व. स्वधा याश्चकृषे जीवन् तास्ते सन्तु मधुश्चतः.. (२०) हे मरने वाले पुरुष! तू यज्ञ आदि की वेदी के विस्तृत स्थान में प्रतिष्ठित हो. पहले तू ने जिन उत्तम हवियों को दिया है, वे तुझे मधु आदि रसों के रूप में प्राप्त हों. (२०) ह्वयामि ते मनसा मन इहेमान् गृहाँ उप जुजुषाण एहि. सं गच्छस्व पितृभिः सं यमेन स्योनास्त्वा वाता उप वान्तु शग्माः.. (२१) हे प्रेत पुरुष! मैं अपने मन के द्वारा तेरे मन को इस लोक में बुलाता हूं. जिन घरों में तेरे लिए और्ध्वदैहिक अर्थात् देह त्याग के बाद का कर्म किया जाता है, तू हमारे उन घरों में जा तथा संस्कार के बाद पिता, पितामह, प्रपितामह आदि के साथ सपिण्डीकरण की विधि के अनुसार मिल. यम के पास पहुंचा हुआ तू पितृलोक में जा कर श्रम को दूर करने वाली वायु को प्राप्त कर. (२१) उत् त्वा वहन्तु मरुत उदवाहा उदप्रुतः. अजेन कृण्वन्तः शीतं वर्षेणोक्षन्तु बालिति.. (२२) हे प्रेत! मरुद्गण तुझे व्योम में धारण करें. वायु तुझे ऊर्ध्वलोक में पहुंचाए. जल को धारण करने वाले तथा वर्षा करने वाले मेघ समीप में भी अज अर्थात् अजन्मा आत्मा सहित तुझे वर्षा के जल से सींचें. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*