अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 929, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयत् पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्रः श्रथिता हिरण्ययः.. (२) हे इंद्र! जिस प्रकार जल नीचे की ओर जाता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् तुम्हारे यज्ञ का स्थान है. यजमान के तीनों सवन तुम्हें प्राप्त होते हैं. इंद्र का सुंदर, शत्रुओं की हिंसा करने वाला और स्वर्ण से विभूषित वज्र पर्वत को विदीर्ण करने में समर्थ हुआ. (२) अस्मै भीमाय नमसा समध्वर उषो न शुभ्र आ भरा पनीयसे. यस्य धाम श्रवसे नामेन्द्रियं ज्योतिरकारि हरितो नायसे.. (३) हे दीप्त उषा देवता! शत्रुओं के लिए भयंकर एवं स्तुति के अधिक योग्य इंद्र को अन्न सहित हमारे यज्ञ में लाओ. जिन इंद्र का जल अन्न की समृद्धि करता है तथा जो इंद्र दिशाओं को प्रकाशित करते हैं, उन्हें हमारी यज्ञशाला में लाओ. (३) इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत ये त्वारभ्य चरामसि प्रभूवसो. नहि त्वदन्यो गिर्वणो गिरः सघत् क्षोणीरिव प्रति नो हर्य तद् वचः.. (४) हे इंद्र! तुम महान धन से संपन्न और स्तुतियों के पात्र हो. हम तुम्हारे ही आश्रित हैं. हे इंद्र! तुम्हारी महिमा बहुत अधिक है तथा हमारी स्तुतियां बहुत कम हैं. इस कारण तुम्हें हमारी स्तुति सुननी चाहिए. जिस प्रकार राजा प्रजा की बात सुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी प्रार्थना सुनो. (४) भूरि त इन्द्र वीर्यं १ तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन् काममा पृण. अनु ते द्यौर्बृहती वीर्यं मम इयं च ते पृथिवी नेम ओजसे.. (५) हे इंद्र! तुम्हारा वृत्र वध का वीरतापूर्ण कार्य महान है. इसी को ध्यान में रख कर हम तुम्हारे उपासक बने हैं. हे धन के स्वामी इंद्र! स्तुति करते हुए इस यजमान की अभिलाषा पूर्ण करो. हे इंद्र! तुम्हारा बल महान आकाश को नापता है. यह पृथ्वी तुम्हारे बल के कारण झुकती है. (५) त्वं तमिन्द्र पर्वतं महामुरुं वज्रेण वज्रिन् पर्वशश्चकर्तिथ. अवासृजो निवृताः सर्तवा अपः सत्रा विश्वं दधिषे केवलं सहः.. (६) हे वज्रधारी इंद्र! तुम ने प्रसिद्ध, महान और विशाल पर्वतों के पंख आदि को अपने वज्र से काटा था. इस के बाद तुम ने पर्वत द्वारा रोके गए जलों को नदी के रूप में बहने के लिए छोड़ दिया था. केवल तुम ही इस प्रकार का असाधारण बल धारण करते हो. (६) सूक्त—१६ देवता—बृहस्पति उदप्रुतो न वयो रक्षमाणा वावदतो अभियस्येव घोषाः. गिरिभ्रजो नोर्मयो मदन्तो बृहस्पतिमभ्य १ र्का अनावन्.. (१)