अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 930, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिस प्रकार जलों में गमन करते हुए तथा व्याध आदि से अपनी रक्षा करते हुए पक्षी उच्च ध्वनि करते हैं, जिस प्रकार मेघ समूह गर्जन करता है तथा जिस प्रकार मेघों से बरसने वाला जल फसलों आदि को तृप्त करता है, उसी प्रकार स्तोता अपनी स्तुतियों से बृहस्पति देव की प्रशंसा करते हैं. (१) सं गोभिराङ्गिरसो नक्षमाणो भग इवेदर्यमणं निनाय. जने मित्रो न दम्पती अनक्ति बृहस्पते वाजयाशूँरिवाजौ.. (२) महर्षि अंगिरस जिस प्रकार भगदेव के समान विवाह के समय पतिपत्नी को गोघृत आदि सहित अर्यमा देव की शरण प्राप्त कराते हैं, उसी प्रकार अंगिरस ऋषि इस पतिपत्नी को अर्यमा देव की शरण प्राप्त कराएं. सूर्य जिस प्रकार प्रकाश के निमित्त अपनी किरणों को एकत्र करते हैं, उसी प्रकार अंगिरस ऋषि इन पतिपत्नी को एकत्र करें. (२) साध्वर्या अतिथिनिरिशिरा स्पार्हा: सुवर्णा अनवद्यरूपा:. बृहस्पतिः पर्वतेभ्यो वितूर्या निर्गा ऊपे यवमिव स्थिविभ्यः.. (३) जिस प्रकार कोठियों से अन्न निकालते हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुषों को प्राप्त होने वाले, अतिथियों को तृप्त करने वाले, सब के द्वारा चाहे गए, सुंदर रंगों वाले एवं प्रशंसनीय रूप वाले बृहस्पति देव पर्वतों से निकाल कर गाएं स्तुति करने वालों को प्रदान करते हैं. (३) आपुषायन् मधुन ऋतस्य योनिमवक्षिपन्नर्क उल्कामिव द्योः. बृहस्पतिरुद्धरन्नश्मनो गा भूम्या उदनेव वि त्वचं बिभेद.. (४) बृहस्पति देव ने जल से धरती को सभी ओर से सींचते हुए जल के समूह मेघ को आकाश से उसी प्रकार नीचे गिराया, जिस प्रकार सूर्य आकाश से उल्का गिराते हैं. जिस प्रकार जल धरती को कोमल बना देते हैं, उसी प्रकार बृहस्पति देव पणियों के द्वारा चुरा कर पर्वतों में रखी गई गायों को बाहर निकाल कर उन के खुरों से धरती को खुदवाते हैं. (४) अप ज्योतिषा तमो अन्तरिक्षादुद्नः शीपालमिव वात आजत्. बृहस्पतिरनुमृश्या वलस्याभ्रमिव वात आ चक्र आ गाः.. (५) वायु जिस प्रकार जल से काई को अलग कर देते हैं, उसी प्रकार बृहस्पति ने अपने प्रकाश से पर्वत की गुफाओं के उस अंधकार का विनाश कर दिया था जो गायों को छिपाए हुए था. वायु जिस प्रकार बादलों को सभी ओर बिखरा देती है, बृहस्पति देव ने उसी प्रकार बल नामक असुर द्वारा चुरा कर पर्वत की गुफा में रखी गई गायों को निकाल कर सभी ओर फैला दिया था. (५) यदा वलस्य पीयतो जसुं भेद बृहस्पतिरग्नितपोभिरर्कैः. दद्भ्रिं जिह्व परिविष्टमाददाविर्निधीँरकृणोदुस्रियाणाम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*