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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः.. (३) हे वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र! तुम राक्षसों का विनाश करो एवं संग्रामों में विजय प्राप्त करो. तुम वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो. (३) अपेन्द्र द्विषतो मनो ऽ प जिज्यासतो वधम्. वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम्.. (४) हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव! हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए. जो शत्रु हमें समाप्त करने का इच्छुक है, उस के आयुध का विनाश करो. हमें महान सुख प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग के कारण असफल न होने वाले शस्त्रों को हम से दूर रखो. (४) सूक्त-२२ देवता—सूर्य और हृदय रोग अनु सूर्यमुदयतां हृद्द्योतो हरिमा च ते. गो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा परि दध्मसि.. (१) हे रोग ग्रसित पुरुष! तेरे हृदय को संताप पहुंचाने वाला हृदय रोग एवं कामला आदि रोग से उत्पन्न तेरे शरीर का पीलापन सूर्य की ओर चला जाए. हे रोगी! गाय के लाल वर्ण से पहचाने जाने वाले के रूप में मैं तुझे स्वस्थ कराता हूं. (१) परि त्वा रोहितैर्वर्णैर्दीर्घायुत्वाय दध्मसि. यथायमरपा असदथो अहरितो भुवत्.. (२) हे व्याधिग्रस्त पुरुष! तेरी दीर्घायु के लिए हम तुझे गाय के समान लाल रंग से ढकते हैं. यह पुरुष पापरहित हो कर कामला आदि रोगों के कारण होने वाले शरीर के पीले रंग से छूट जाए. (२) या रोहिणीर्देवत्या ३ गावो या उत रोहिणीः. रूपंरूपं वयोवयस्ताभिष्ट्वा परि दध्मसि.. (३) देवों की जो लाल रंग की कामधेनु आदि गाएं एवं मनुष्यों की जो लाल रंग की गाएं हैं, इन दोनों प्रकार के लाल रंग के रूप और यौवन को ले कर, हे रोगी पुरुष! हम तुझे ढकते हैं. (३) शुकेषु ते हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि. अथो हारिद्रवेषु ते हरिमाणं नि दध्मसि.. (४) हे रोगी पुरुष! हम तेरे शरीर में रहने वाले रोग से उत्पन्न हरे रंग को स्रोतों में तथा रोपणक नामक पक्षियों में स्थापित करते हैं. हम तेरे हल्दी के समान पीले रंग को गोपीतनक ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-२३ देवता—वनस्पति

नामक पीले रंग के पक्षियों में स्थापित करते हैं. (४) सूक्त-२३ देवता—वनस्पति नक्तंजातास्योषधे रामे कृष्णे असिक्नि च. इदं रजनि रजय किलासं पलितं च यत्.. (१) हे हरिद्रा! हल्दी नामक ओषधि! तू रात में उत्पन्न हुई है. इसलिए तू शरीर की सफेदी दूर करने में समर्थ है. हे भृंगराज (भागरा) नामक ओषधि! रंग काला कर देने वाली इंद्रावारुणि नामक ओषधि! एवं असित वर्ण करने वाली नील नामक ओषधि! तुम कुष्ठ रोग के कारण विकृत रंग वाले इस अंग को अपने रंग में रंग दो. वृद्धावस्था के कारण जो बाल श्वेत हो गए हैं, उन्हें भी अपने रंग में रंग दो. (१) किलासं च पलितं च निरितो नाशया पृषत्. आ त्वा स्वो विशतां वर्णः परा शुक्लानि पातय.. (२) हे ओषधि! कुष्ठ रोग और असमय में केश श्वेत होने के रोग को शरीर से दूर कर के नष्ट करो. हे रोगी! तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो. हे ओषधि! तू इस के श्वेत रंग को दूर कर दे. (२) असितं ते प्रलयनमास्थानमसितं तव. असिक्न्यस्योषधे निरितो नाशया पृषत्.. (३) हे नील नामक ओषधि! तेरे उत्पन्न होने का स्थान काले रंग का होता है. तू काले रंग की होती है, इसलिए तू कुष्ठ रोग के कारण दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर. (३) अस्थिजस्य किलासस्य तनूजस्य च यत् त्वचि. दूष्या कृतस्य ब्रह्मणा लक्ष्म श्वेतमनीनशम्.. (४) हड्डियों से उत्पन्न, त्वचा से उत्पन्न एवं इन दोनों के मध्यवर्ती मांस से उत्पन्न कुष्ठ रोग के कारण जो श्वेत चिह्न शरीर पर उत्पन्न हो गए हैं, उन्हें मैं मंत्र के प्रभाव से नष्ट करता हूं. (४) सूक्त-२४ देवता—आसुरी वनस्पति सुपर्णो जातः प्रथमस्तस्य त्वं पित्तम् आसिथ. तद् आसुरी युधा जिता रूपं चक्रे वनस्पतीन्.. (१) हे ओषधि! सब से पहले गरुड़ उत्पन्न हुए. तू उन के शरीर में पित्त दोष के रूप में थी. ebook converter DEMO Watermarks*

आसुरी माया ने गरुड़ से युद्ध कर के पित्त को जीत लिया एवं विजय के कारण प्राप्त उस पित्त को ओषधि का रूप दे दिया. (१) आसुरी चक्रे प्रथमेदं किलासभेषजम् इदं किलासनाशनम्. अनीनशत् किलासं सरूपाम् अकरत् त्वचम्.. (२) आसुरी माया रूपी स्त्री ने सब से पहले कुष्ठ रोग दूर करने की ओषधि बनाई थी. नीली आदि ओषधियों ने कुष्ठ रोग को नष्ट कर के त्वचा को पहले के समान स्वस्थ बनाया. (२) सरूपा नाम ते माता सरूपो नाम ते पिता. सरूपकृत् त्वमोषधे सा सरूपमिदं कृधि.. (३) हे ओषधि! तेरी माता तेरे समान ही काले रंग वाली है. तेरा पिता आकाश भी तेरे ही समान नीले रंग का है. हे नील नामक ओषधि! तू अपने संपर्क में आने वाले पदार्थ को अपने समान रंग वाला बना देती है. इसलिए कुष्ठ रोग से दूषित इस अंग को अपने समान रंग वाला अर्थात् काला कर दे. (३) श्यामा सरूपंकरणी पृथिव्या अध्युद्भृता. इदमू षु प्र साधय पुना रूपाणि कल्पय.. (४) हे काले रंग की एवं अपने संपर्क में आने वाले को अपने समान बना देने वाली ओषधि! तू आसुरी माया द्वारा धरती से उत्पन्न की गई है. तू कुष्ठ रोग से आक्रांत इस अंग को पुनः पहले के समान रंग वाला बना दे. (४) सूक्त-२५ देवता—यक्ष्मानाशक अग्नि यदग्निरपो अदहत् प्रविश्य यत्राकृण्वन् धर्मधृतो नमांसि. तत्र त आहुः परमं जनित्रं स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्.. (१) हे जीवन को कष्ट पूर्ण बनाने वाले ज्वर! जिस अग्नि ने प्रवेश कर के जलों को जलाया अर्थात् गरम किया, यश, दान आदि धार्मिक कृत्य करने वालों ने जिस अग्नि में होम किया है, उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है. यह सब जानता हुआ तू गरम जल से स्नान करने वाले हमारे शरीर को त्याग कर अग्नि में प्रवेश कर. (१) यद्यर्चिर्यदि वासि शोचिः शकल्येषि यदि वा ते जनित्रम्. हूडुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्.. (२) हे जीवन को दुःखमय बनाने वाले ज्वर! तू यद्यपि उष्णता कारक एवं सुखाने वाला है. यद्यपि तेरा जन्म अग्नि से हुआ है, तथापि हे दीप्तिशाली ज्वर! तू मनुष्य के शरीर में पीले रंग को उत्पन्न करने वाला है. इसलिए तू हूड नाम से प्रसिद्ध है. तू हमारे गरम जल से भीगे हुए ebook converter DEMO Watermarks*

शरीर को अपना जन्म स्थान अग्नि जान कर हमारे शरीर से बाहर निकल जा. (२) यदि शोको यदि वाभिशोको यदि वा राज्ञो वरुणस्यासि पुत्रः. हूडुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्.. (३) हे शीत ज्वर! तुम शरीर को शोकाकुल करने वाले, शरीर को सभी प्रकार से सुखाने वाले एवं तेजस्वी वरुण के पुत्र हो. तुम हूड नाम से प्रसिद्ध हो. तुम हमारे गरम जल से भीगे हुए शरीर को अपना जन्म स्थान अग्नि जान कर हमारे शरीर से बाहर निकल जाओ. (३) नमः शीताय तक्मने नमो रूराय शोचिषे कृणोमि. यो अन्येद्युरुभयद्युरभ्येति तृतीयकाय नमो अस्तु तक्मने.. (४) मैं शीत उत्पन्न करने वाले ज्वर को नमस्कार करता हूं. मैं ठंड लगने के बाद चढ़ने वाले एवं शोककारक ज्वर को प्रणाम करता हूं. जो ज्वर प्रतिदिन दूसरे दिन एवं तीसरे दिन आता है, मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं. (४) सूक्त-२६ देवता—इंद्र आदि आरे ३ सावस्मदस्तु हेतिर्देवासो असत्. आरे अश्मा यमस्यथ.. (१) हे देवो! आप की कृपा से शत्रु द्वारा प्रयुक्त खड्ग आदि आयुध हमारे शरीर से दूर हो जाएं. हे शत्रुओ! तुम यंत्र आदि के द्वारा जो पत्थर फेंकते हो, वे भी हम से दूर रहें. (१) सखासावस्मभ्यमस्तु रातिः सखेन्द्रो भगः सविता चित्रराधाः.. (२) आकाश में दिखाई देते हुए सूर्य देव हमारे मित्र हों. संपत्ति देने वाले सविता देव हमारे मित्र हों. सविता देव अनेक प्रकार के धनों के स्वामी हैं. वे तथा इंद्र देव हमारे मित्र हैं. (२) यूयं नः प्रवतो नपान्मरुतः सूर्यत्वचसः. शर्म यच्छाथ सप्रथाः.. (३) हे सूर्य द्वारा पृथ्वी से सोखे हुए जल को न गिराने वाले पर्जन्य देव! हे सात गणों वाले मरुत् देव! आप सब सूर्य के समान तेज वाले हैं. आप सब हमारा विस्तार से कल्याण करें. (३) सुषूदत मृडत मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि.. (४) हे इंद्र आदि देवो! आप शत्रुओं द्वारा छोड़े जाने वाले आयुधों को हम से दूर करो तथा हमें सुख दो. हे इंद्र आदि देवो! आप हमारे शरीरों को सुख दें एवं हमारी संतान को सुखी बनाएं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-२७ देवता—ब्रह्मणस्पति

सूक्त-२७ देवता—ब्रह्मणस्पति अमूः पारे पृदाक्वस्त्रिषप्ता निर्जरायवः. तासां जरायुभिर्वयमक्ष्या ३ वपि व्ययामस्यघायोः परिपन्थिनः.. (१) सांपों की ये इक्कीस जातियां देवों के समान बुढ़ापे से रहित हैं एवं नागलोक में निवास करती हैं. इन सांपों की केंचुली जरायु के समान उन से लिपटी रहती है. सांपों की उस केंचुली के द्वारा हम दूसरों का अहित सोचने वाले शत्रुओं की आंखों को ढकते हैं. (१) विषूच्येतु कृन्तती पिनाकमिव बिभ्रती. विष्वक् पुनर्भूवा मनो ऽ समृद्धा अघायवः.. (२) शिव के धनुष पिनाक के समान शत्रुओं के मारने में सक्षम आयुध धारण करती हुई, खड्ग आदि आयुधों से शत्रुओं को फाड़ती हुई हमारी सेना मारकाट मचाती हुई आगे बढ़े. यदि शत्रु सेना उस का सामना करने के लिए एकत्र हो, तो शत्रु सैनिकों का मन कुछ सोचने और निश्चय करने में समर्थ न हो. ऐसी स्थिति में हमारे शत्रु राष्ट्र, कोश आदि से रहित हो जाएं. (२) न बहवः समशकन् नार्भका अभि दाधृषुः. वेणोरद्गा इवाभितो ऽ समृद्धा अघायवः.. (३) हाथी, घोड़े और रथों से युक्त बहुत से शत्रु सैनिक हमें जीतने में असमर्थ हो कर हार जाएं. अल्प संख्या वाले शत्रु हमारे सामने आने का साहस न कर सकें. बांस की ऊपरी शाखाएं जिस प्रकार दुर्बल होती हैं, हम से पराजित हो कर धनहीन बने शत्रु उसी प्रकार समृद्धि रहित हो जाएं. (३) प्रेतं पादौ प्र स्फुरतं वहतं पृणतो गृहान्. इन्द्राण्येतु प्रथमाजीतामुषिता पुरः.. (४) हे चलने के इच्छुक व्यक्ति के चरणो! तुम आगे बढ़ो एवं शीघ्र चलने के लिए गति करो. तुम हमें इच्छित फल देने वाले पुरुष के निवास स्थान तक पहुंचाओ. किसी से पराजित न होने वाले इंद्र की पत्नी हमारी सेना की देवता हैं. वह हमारी सेना की रक्षा के लिए आगेआगे चलें. (४) सूक्त-२८ देवता—अग्नि उप प्रागाद् देवो अग्नी रक्षोहामीवचातनः. दहन्नप द्वयाविनो यातुधानान् किमीदिनः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

राक्षसों के विनाशक और रोगों को दूर करने वाले अग्नि देव उन्हें नष्ट करने के लिए उन के समीप चलें. अग्नि देव मायामय, सौम्य, हिंसक एवं भयावह रूप धारण करने वाले, दूसरों के दोष खोजने वाले, पीड़ादायक एवं परेशान करने वाले राक्षसों को भस्म करते हुए इस पुरुष के समीप आ रहे हैं. (१) प्रति दह यातुधानान् प्रति देव किमीदिनः. प्रतीचीः कृष्णवर्तने सं दह यातुधान्यः.. (२) हे अग्नि देव! आप इन राक्षसों और दूसरों के दोष देखने वाले पिशाचों को भस्म कर दो. हे काले मार्ग वाले अग्नि! दूसरों के प्रतिकूल आचरण करने वाली राक्षसियों को भी आप भस्म कर दें. (२) या शशाप शपनेन याघं मूरमादधे. या रसस्य हरणाय जातमारेभे तोकमत्तु सा.. (३) जिन राक्षसियों ने कठोर वचनों के द्वारा हमें शाप दिया है, जिन राक्षसियों ने सभी पापों की जड़ हिंसा को स्वीकार कर लिया है तथा जो हमारी संतान, रस, सौंदर्य एवं पुष्टि का विनाश करती हैं, वे सभी अपने अथवा हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें. (३) पुत्रमत्तु यातुधानीः स्वसारमुत नप्त्यम्. अधा मिथो विकेश्यो ३ वि घ्नतां यातुधान्यो ३ वि तृहन्तामराय्यः.. (४) राक्षसियां अपने पुत्र, बहन और नाती को खा जाएं. राक्षसियां एकदूसरे के केश खींच कर लड़ने के कारण बाल बिखेरें तथा मृत्यु को प्राप्त हों. दान न करने वाली राक्षसियां आपस में लड़ कर मर जाएं. (४) सूक्त-२९ देवता—ब्रह्मणस्पति अभीवर्तेन मणिना येनेन्द्रो अभिवावृधे. तेनास्मान् ब्रह्मणस्पते ऽ भि राष्ट्राय वर्धय.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! समृद्धि एवं शक्ति प्रदान करने वाली जिस मणि को धारण कर के इंद्र उन्मत्त हुए हैं, उसी मणि के द्वारा शत्रुओं से पीड़ित हमारे राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाओ. आप की कृपा से हम संपन्न जनों द्वारा सुरक्षित राष्ट्र में शत्रुओं के भय से रहित हों. (१) अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरातयः. अभि पृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो नो दुरस्यति.. (२) हे अभीवर्त मणि! तुम हमारे शत्रुओं के सामने डट कर उन्हें पराजित करो. जो हमारे राष्ट्र, धन आदि का अपहरण कर के हमारे प्रति शत्रुता का व्यवहार करते हैं, उन के सामने ebook converter DEMO Watermarks*

डट कर तुम उन को पराजित करो. जो हम से युद्ध करने के लिए सेना सजाते हैं अथवा हमारे प्रति अभिचार (जादूटोने) के रूप में शत्रुता करते हैं, तुम उन्हें भी पराजित करो. (२) अभि त्वा देवः सविताभि सोमो अवीवृधत्. अभि त्वा विश्वा भूतान्यभीवर्तो यथाससि.. (३) हे अभीवर्त मणि! सविता देव ने तुम्हारी वृद्धि की है और सोम देव ने तुम्हें समृद्ध बनाया है. हे मणि! सभी प्राणियों ने तुम्हारी वृद्धि की है. जो व्यक्ति तुम्हें धारण करता है, वह सभी साधनों से संपन्न हो जाता है. (३) अभीवर्तो अभिभवः सपत्नक्षयणो मणिः. राष्ट्राय मह्यं बध्यतां सपत्नेभ्यः पराभुवे.. (४) शत्रुओं की पराजय करने वाली एवं राक्षसों का विनाश करने वाली अभीवर्त मणि राष्ट्र की समृद्धि और शत्रुओं के विनाश के लिए मेरे हाथ में बांधो. (४) उदसौ सूर्यो अगादुदिदं मामकं वचः. यथाहं शत्रुहो ऽ सान्यसपत्नः सपत्नहा.. (५) आकाश मंडल में दिखाई देने वाले एवं सभी प्राणियों के प्रेरक सूर्य देव उदित हो गए हैं. अपनी विजय की एवं शत्रुओं की पराजय की कामना करने वाली मेरी वेद रूपी वाणी भी प्रकट हो गई है. अभीवर्त मणि को धारण करने वाला मैं जिस प्रकार शत्रुओं को मारने वाला बनूं, ऐसा सुयोग उपस्थित हो. मैं शत्रुरहित हो जाऊं. यदि मेरा कोई शत्रु हो भी तो उसे मैं पराजित करूं. (५) सपत्नक्षयणो वृषाभिराष्ट्रो विषासहिः. यथाहमेषां वीराणां विरांजानि जनस्य च.. (६) हे मणि! मैं तुम्हारे प्रभाव से शत्रुओं का नाशक, प्रजाओं का पालक, अपने राष्ट्र का स्वामी एवं शत्रुओं को वश में करने वाला बनूं. मैं शत्रु सेना के वीरों एवं उन की प्रजाओं पर शासन करने में समर्थ बनूं. (६) सूक्त-३० देवता—विश्वे देव विश्वे देवा वसवो रक्षतेममुतादित्या जागृत यूयमस्मिन्. मेमं सनाभिरुत वान्यनाभिर्मेमं प्रापत् पौरुषेयो वधो यः.. (१) हे विश्वे देव! वसु एवं आदित्य देवो! दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष की रक्षा करो एवं दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष के विषय में सावधान रहो. इस का सजातीय अथवा विजातीय शत्रु इस के पास तक न आ सके. कोई भी इस की हिंसा करने में ebook converter DEMO Watermarks*

समर्थ न हो. (१) ये वो देवाः पितरो ये च पुत्राः सचेतसो मे शृणुतेदमुक्तम्. सर्वेभ्यो वः परि ददाम्येतं स्वस्त्ये नं जरसे वहाथ.. (२) हे देवो! आप के जो पितर एवं पुत्र हों, वे भी इस पुरुष के विषय में की गई मेरी प्रार्थना पर ध्यान दें. दीर्घ आयु की कामना करने वाले इस पुरुष को मैं आप सब को सौंपता हूं. इस की वृद्धावस्था तक आप इस का कल्याण करें. (२) ये देवा दिविष्ठ ये पृथिव्यां ये अन्तरिक्ष ओषधीषु पशुष्वप्स्व१न्तः. ते कृणुत जरसमायुरस्मै शतमन्वान् परि वृणक्तु मृत्यून्.. (३) जो देव स्वर्ग में एवं पृथ्वी पर निवास करते हैं, वायु आदि जो देव अंतरिक्ष में गमन करते हैं तथा जो देव ओषधियों, पशुओं एवं जलों में स्थित हैं, वे सब देव इस दीर्घ आयु की कामना करने वाले पुरुष को वृद्धावस्था पर्यंत आयु प्रदान करें एवं इसे मृत्यु से बचाएं. (३) येषां प्रयाजा उत वानुयाजा हुतभागा अहुतादश्च देवाः. येषां वः पञ्च प्रदिशो विभक्तास्तान् वो अस्मै सत्रसदः कृणोमि.. (४) जिस देव के निमित्त पंचयाग किए जाते हैं, वह अग्नि देव; जिन देवों के निमित्त बाद वाले तीन यज्ञ किए जाते हैं, वह इंद्र आदि देव; जो बलि का अपहरण करते हैं, दिशाओं के स्वामी देव हैं, इन सब को एवं इन के अतिरिक्त जो देव हैं, उन को भी मैं इस दीर्घ आयु चाहने वाले पुरुष के समीप बैठने के लिए नियुक्त करता हूं. (४) सूक्त-३१ देवता—आशापाल अर्थात् वास्तोष्पति आशानामाशापालेभ्यश्चतुर्भ्यो अमृतेभ्यः. इदं भूतस्याध्यक्षेभ्यो विधेम हविषा वयम्.. (१) पूर्व आदि दिशाओं की रक्षा करने वाले एवं कभी न मरने वाले इंद्र, यम आदि चार देवों के लिए हम इस भाग में मंत्रों के साथ आहुति देते हैं. वे देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं. (१) य आशानामाशापालाश्चत्वार स्थन देवाः. ते नो निर्ऋत्याः पाशेभ्यो मुञ्चतांहसो अंहसः.. (२) जो दिशाओं का पालन करने वाले इंद्र आदि चार देव हैं, वे हमें मृत्यु देव के पाशों से छुड़ाएं तथा पापों से हमारी रक्षा करें. (२) अस्रामस्तवा हविषा यजाम्यश्लोणस्तवा घृतेन जुहोमि. ebook converter DEMO Watermarks*

य आशानामाशापालस्तुरीयो देवः स नः सुभूतमेह वक्षत्.. (३) हे धन देने वाले देव कुबेर! मैं अपने अभिमत धन आदि प्राप्त करने के लिए हवि से इंद्र आदि देवों की प्रसन्नता के लिए हवन करता हूं. दिशाओं की रक्षा करने वाले इंद्र आदि देवों में जो चौथे देव कुबेर हैं, वे इस यज्ञ में हमें स्वर्ण, रजत आदि धन दें. (३) स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः. विश्वं सुभूतं सुविदत्रं नो अस्तु ज्योगेव दृशेम सूर्यम्.. (४) हमारी माता, हमारे पिता, हमारी गायों और सारे संसार का कल्याण हो. हमारी माता आदि उत्तम धन एवं श्रेष्ठ ज्ञान वाले हैं. हम सौ वर्ष तक सूर्य के दर्शन करते रहें. (४) सूक्त-३२ देवता—द्यावा पृथिवी इदं जनासो विदथ महद् ब्रह्म वदिष्यति. न तत् पृथिव्यां नो दिवि येन प्राणन्ति वीरुधः.. (१) हे जानने के इच्छुक जनो! इस बात को जानो कि वह जल रूप ब्रह्म पृथ्वी पर नहीं रहता और न वह आकाश में निवास करता है. उसी जल के कारण सभी वृक्ष एवं लताएं जीवित रहती हैं. (१) अन्तरिक्ष आसां स्थाम श्रान्तसदामिव. आस्थानमस्य भूतस्य विदुष्टद् वेधसो न वा.. (२) जिस प्रकार गंधर्वों का निवास स्थान अंतरिक्ष है, उसी प्रकार इन ओषधियों का कारण रूप जल आकाश और धरती के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष में निवास करता है. इस लोक में जो भी स्थावर और जंगम हैं, उन सब का आश्रय भी जल है. विधाता मनु आदि भी इसे नहीं जानते. (२) यद् रोदसी रेजमाने भूमिश्च निरतक्षतम्. आर्द्रं तदद्य सर्वदा समुद्रस्येव स्रोत्याः.. (३) हे जल उत्पन्न करने के लिए कांपती हुई उत्तम पृथ्वी एवं आकाश! तुम दोनों पहले बताए हुए जल का उत्पादन करो. वह जल वर्तमान काल में नया रहता है अर्थात् वर्षा का जल समाप्त हो जाने पर भी आकाश में जल उसी प्रकार समाप्त नहीं होता, जिस प्रकार सागर में मिलने वाली सरिताएं कभी नहीं सूखतीं. (३) विश्वमन्यामभीवार तदन्यस्यामधिश्रितम्. दिवे च विश्ववेदसे पृथिव्यै चाकरं नमः.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-३३ देवता—जल

सारा संसार आकाश से चारों ओर से घिरा हुआ है. यह संसार पृथ्वी पर आश्रित है. मैं संसार के धन के रूप में स्थित द्युलोक को तथा पृथ्वी को नमस्कार करता हूं. (४) सूक्त-३३ देवता—जल हिरण्यवर्णाः शुचयः पावका यासु जातः सविता यास्वाग्निः. या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (१) सोने के रंग की शुद्ध अग्नियां एवं सविता जिन जलों से उत्पन्न हुए हैं, बादलों में स्थित जिन जलों में विद्युत रूपी अग्नि तथा सागर में स्थित जिन जलों में वाडवाग्नि उत्पन्न हुई है, जिन शोभन रंग वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए रोग नाशक और सुखकारक हों. (१) यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यन् जनानाम्. या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (२) राजा वरुण जिन जलों के मध्य में स्थित हो कर मनुष्यों के सत्य और असत्य को जानते हुए चलते हैं, जिन शोभन वर्ण वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों. (२) यासां देवा दिवि कृण्वन्ति भक्षं या अन्तरिक्षे बहुधा भवन्ति. या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (३) इंद्र आदि देव जिन जलों के सार रूप अमृत को द्युलोक में भक्षण करते हैं तथा जो जल अनेक प्रकार से स्थित रहते हैं, जिन शोभन वर्ण वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों. (३) शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवया तन्वोप स्पृशत त्वचं मे. घृतश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु.. (४) हे जल के अभिमानी देव! मुझे सुखकर दृष्टि से देखो तथा अपने कल्याणकारी शरीर से मेरी देह का स्पर्श करो. जो जल अमृत को टपकाने वाले तथा पवित्र करने वाले हैं, वे हमारे लिए रोग विनाशक और सुखकारी हों. (४) सूक्त-३४ देवता—मधु, वनस्पति इयं वीरुन्मधुजाता मधुना वा खनामसि. मधोरधि प्रजातासि सा नो मधुमतस्कृधि.. (१) यह सामने वर्तमान लता मधुर रस से युक्त भूमि में उत्पन्न हुई है. मैं इसे मधुर रूप वाले ebook converter DEMO Watermarks*

फावड़े आदि की सहायता से खोदता हूं. तू मुझ से उत्पन्न हुई है. तू हमें भी मधु रस से युक्त बना. (१) जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम्. ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि.. (२) हे मधु लता! तू मेरी जीभ के अग्र भाग पर शहद के समान स्थित हो तथा जीभ की जड़ में मधु रस वाले मधु नामक जल वृक्ष के फूल के रूप में वर्तमान रह. तू केवल मेरे शरीर व्यापार में लग तथा मेरे चित्त में आ. (२) मधुन्मे निष्क्रमणं मधुन्मे परायणम्. वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसन्दृशः.. (३) हे मधु लता! तुम्हें धारण करने से मेरा निकट गमन दूसरों को प्रसन्न करने वाला हो तथा मेरा दूर गमन दूसरों को प्रसन्न करे. मैं वाणी से मधुयुक्त हो कर तथा समस्त कार्यों के द्वारा मधु के समान बन कर सब के प्रेम का पात्र बनूं. (३) मधोरस्मि मधुत्तरो मदुघान्मधुमत्तरः. मामित् किल त्वं वनाः शाखां मधुमतीमिव.. (४) हे मधु लता! मैं तुझ से उत्पन्न होने वाले शहद से भी अधिक मधुर हूं. मैं शहद टपकाने वाले पदार्थ से भी अधिक मधुर हूं. तुम निश्चय ही केवल मुझे उसी प्रकार प्राप्त हो जाओ, जिस प्रकार शहद वाली डाल के पास लोग पहुंच जाते हैं. (४) परि त्वा परितन्तुनेक्षुणागामविद्विषे. यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (५) हे पत्नी! मैं तुझे सभी ओर व्याप्त एवं ईख के समान मधुर मधु के द्वारा आपस में प्रेम के लिए प्राप्त हुआ हूं. (५) सूक्त-३५ देवता—हिरण्य यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः. तत् ते बध्नाम्यायुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (१) हे यजमान! दक्ष की संतान महर्षियों ने सौमनस्य को प्राप्त हो कर राजा शतानीक के लिए जिस निर्दोष स्वर्ण को बांधा था, वही स्वर्ण मैं तेरी दीर्घ आयु, तेज, बल, एवं सौ वर्ष की आयु पाने के लिए तुझे बांधता हूं. (१) नैनं रक्षांसि न पिशाचाः सहन्ते देवानामोजः प्रथमजं ह्ये ३ तत्. ebook converter DEMO Watermarks*

यो बिभर्ति दाक्षायणं हिरण्यं स जीवेषु कृणुते दीर्घमायुः.. (२) स्वर्ण बंधे हुए इस पुरुष को राक्षस और पिशाच पराजित नहीं कर सकते, क्योंकि यह देवों का प्रथम उत्पन्न हुआ ओज है. दक्ष पुत्रों से संबंधित इस स्वर्ण को जो बांधता है, वह प्राणियों के मध्य सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है. (२) अपां तेजो ज्योतिरोजो बलं च वनस्पतीनामृत वीर्याणि. इन्द्र इवेन्द्रियाण्यधि धारयामो अस्मिन् तद् दक्षमाणो बिभरद्धिरण्यम्.. (३) मैं जलों के तेज, ज्योति, ओज और बल तथा वनस्पतियों का वीर्य उसी प्रकार धारण करता हूं, जिस प्रकार इंद्र में इंद्रियों के असाधारण चिह्न वर्तमान हैं. इसीलिए वृद्धि प्राप्त करता हुआ यह पुरुष हिरण्य धारण करे. (३) समानां मासामृतुभिष्ट्वा वयं संवत्सरस्य पयसा पिपर्मि. इन्द्राग्नी विश्वे देवास्ते ऽ नु मन्यन्तामहृणीयमानाः.. (४) हे संपत्ति चाहने वाले पुरुष! मैं तुझे संवत्सरों की, महीनों की, ऋतुओं की एवं काल संबंधी दूध की धार से पूर्ण करता हूं. इंद्र और अग्नि तथा समस्त देव क्रोध न करते हुए तुझे संपन्नता की अनुमति दें. (४)

सूक्त-१ देवता—ब्रह्म, आत्मा

दूसरा कांड सूक्त-१ देवता—ब्रह्म, आत्मा वेनस्तत् पश्यत् परमं गुहा यद् यत्र विश्वं भवत्येकरूपम्. इदं पृश्निरदुहज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्यनूषत व्राः.. (१) दीप्तिशाली आदित्य ने समस्त प्राणियों के हृदय में सत्य, ज्ञान आदि लक्षणों से युक्त ब्रह्म का साक्षात्कार किया, जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है. स्वर्ग और आदित्य ने इस विश्व को व्यक्त किया. उत्पन्न होती हुई तथा अपने उत्पन्न कर्ता को जानती हुई प्रजाएं उस की स्तुति करती हैं. (१) प्र तद् वोचेदमृतस्य विद्वान् गन्धर्वो धाम परमं गुहा यत्. त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुष्पितासत्.. (२) अविनाशी ब्रह्म को जानते हुए आदित्य ब्रह्म के विषय के प्रवचन करें कि वह उत्कृष्ट स्थान एवं हृदय में स्थित है. उस के तीन भाग हृदय में छिपे हुए हैं. जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है. (२) स नः पिता जनिता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा. यो देवानां नामध एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्ति सर्वा.. (३) वह सूर्यात्मक परमात्मा हमारा पालनकर्ता, जन्मदाता एवं बंधु है. वह स्वर्ग आदि स्थानों एवं वहां प्राप्त होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है. एकमात्र वही इंद्र आदि देवों का नाम रखने वाला है अथवा वह स्वयं ही इंद्र आदि नाम धारण करता है. इस प्रकार के परमात्मा को सभी प्राणी यह पूछते हुए प्राप्त होते हैं कि वह परमात्मा किस प्रकार का है? (३) परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपातिष्ठे प्रथमजामृतस्य. वाचमिव वक्तारि भुवनेष्ठा धास्युरेष नन्वे ३ षो अग्निः.. (४) ज्ञान होने के पश्चात तत्त्व ज्ञानी कहता है, “मैं ने तत्त्व ज्ञान होते ही द्यावा और पृथ्वी को सभी ओर से प्राप्त कर लिया है तथा मैं ही ब्रह्म से प्रथम उत्पन्न प्राणी एवं भौतिक पदार्थ हूं. जिस प्रकार वक्ता के समीपवर्ती जन वाणी को तत्काल सुन और समझ लेते हैं, उसी प्रकार यह परमात्मा संसार में स्थित, सब के पोषण का इच्छुक एवं वैश्वानर के रूप में सब का ebook converter DEMO Watermarks*

पोषक है।” (४) परि विश्वा भुवनान्यामृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम्. यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनावध्यैरयन्त.. (५) ज्ञानोत्पत्ति से पूर्व मैं ने पृथ्वी आदि लोकों को प्राप्त किया. इस का प्रयोजन ब्रह्म को देखना है जो इस विश्व का कारण है. उस ब्रह्म में इंद्र आदि देव अमृत का स्वाद लेते हुए अपनेआप को तन्मय कर देते हैं. (५) सूक्त-२ देवता—गंधर्व अप्सराएं दिव्यो गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यो विश्वीड्यः. तं त्वा यौमि ब्रह्मणा दिव्य देव नमस्ते अस्तु दिवि ते सधस्थम्.. (१) दिव्य सूर्य पृथ्वी आदि लोकों का पालनकर्ता है. समस्त प्रजाओं के द्वारा वही अकेला नमस्कार करने एवं स्तुति के योग्य है. हे दिव्य सूर्य देव! मैं ब्रह्म के रूप में आप की आराधना करता हूं. आप को मेरा नमस्कार है. आप का आवास स्वर्ग में है. (१) दिवि स्पृष्टो यजतः सूर्यत्वगवयाता हरसो दैव्यस्य. मृडाद् गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यः सुशेवाः.. (२) आकाश में स्थित, यज्ञ करने योग्य, सूर्य के समान वर्ण वाले एवं देव संबंधी क्रोध को नष्ट करने वाले गंधर्व हमें सुखी बनाएं. वे पृथ्वी आदि लोकों के स्वामी, एकमात्र नमस्कार करने योग्य एवं शोभन सुख देने वाले हैं. (२) अनवद्याभिः समु जग्म आभिरप्सरास्वपि गन्धर्व आसीत्. समुद्र आसां सदनं म आहुर्यतः सद्य आ च परा च यन्ति.. (३) सूर्यरूपी गंधर्व निंदा के अयोग्य किरणों रूपी अप्सराओं से मिल गया था. समुद्र इन अप्सराओं का निवास स्थान कहा गया है, जहां से ये सूर्योदय के साथ ही यहां आती हैं और सूर्यास्त के साथ चली जाती हैं. (३) अभ्रिये विद्युन्नक्षत्रिये या विश्वावसुं गन्धर्वं सचध्वे. ताभ्यो वो देवीर्नम इत् कृणोमि.. (४) हे आकाश में जन्म लेने वाली, प्रकाशयुक्त एवं नक्षत्र रूपिणी किरणो! तुम में से जो विश्वावसु गंधर्व अर्थात् चंद्रमा के साथ संयुक्त होती हैं, हे दिव्य किरणो! मैं तुम्हारे लिए नमस्कार करता हूं. (४) याः क्लन्दास्तमिषीचयो ऽ क्षकामा मनोमुहः. ebook converter DEMO Watermarks*

अदो यदवधावत्यवत्कमधि पर्वतात्.

ताभ्यो गन्धर्वपत्नीभ्यो ऽ प्सराभ्यो ऽ करं नमः.. (५) जो किरणें मनुष्य को रुलाने वाली, शक्ति संपन्न, इंद्रियों को निष्क्रिय करने की इच्छुक एवं मन को मोहने वाली हैं, उन गंधर्व पत्नी अप्सराओं को मैं नमस्कार करता हूं. (५) सूक्त-३ देवता—स्राव-विरोधी ओषधि अदो यदवधावत्यवत्कमधि पर्वतात्. तत् ते कृणोमि भेषजं सुभेषजं यथाससि.. (१) मुंजवान पर्वत से उतर कर जो मूंज धरती पर वर्तमान है, हे मूंज! तेरे उस अग्रभाग से मैं ओषधि बनाता हूं, क्योंकि तू उत्तम जड़ीबूटी है. (१) आदङ्गा कुविदङ्गा शतं या भेषजानि ते. तेषामसि त्वमुत्तममनास्रावमरोगणम्.. (२) हे ओषधि! प्रयोग के तुरंत बाद रोग समाप्त करो एवं बहुत से रोगों का विनाश करो. तुम से संबंधित अनगिनत जड़ीबूटियां हैं, उन में तुम उत्तम हो. तुम अतिसार आदि रोग दूर करने वाली एवं इन के मूल कारणों का विनाश करने वाली हो. (२) नीचैः खनन्त्यसुरा अरुस्राणमिदं महत्. तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्.. (३) प्राणों का अपहरण करने वाले राक्षस एवं शरीर को निर्बल बनाने वाले रोग विशाल घाव के पकने के स्थान को नीचे से विदीर्ण करते हैं, यह महती ओषधि उस का समूल विनाश करती है तथा अतिसार आदि रोगों को जड़ से मिटा देती है. (३) उपजीका उद्भरन्ति समुद्रादधि भेषजम्. तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमशीशमत्.. (४) बांमी बनाने वाली दीमक पृथ्वी के नीचे स्थित जलराशि से रोग निवारक जड़ीबूटी को उखाड़ती है. वह अतिसार आदि रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करने वाली है. (४) अरुस्राणमिदं महत् पृथिव्या अध्युद्भृतम्. तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्.. (५) घाव को पकाने वाली यह जड़ीबूटी अर्थात् मिट्टी खेत से खोद कर लाई गई है. यह अतिसार रोगों की ओषधि है और उन्हें शांत करती है. (५) शं नो भवन्त्वप ओषधयः शिवाः. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-४ देवता—जंगिड़ मणि

इन्द्रस्य वज्रो अप हन्तु रक्षस आराद् विसृष्टा इषवः पतन्तु रक्षसाम्.. (६) ओषधियों के रूप में प्रयोग किए जाते हुए जल एवं ओषधियां हमारे रोगों को शांत करने वाले हैं. इंद्र का वज्र रोग उत्पन्न करने वाले राक्षसों का विनाश करे. मनुष्यों को पीड़ा पहुंचाने के निमित्त प्रयुक्त राक्षसों के रोग रूपी बाण हम से दूर गिरें अर्थात् रोग हम से दूर रहें. (६) सूक्त-४ देवता—जंगिड़ मणि दीर्घायुत्वाय बृहते रणायारिष्यन्तो दक्षमाणाः सदैव. मणिं विष्कन्धदूषणं जङ्गिडं बिभृमो वयम्.. (१) हम दीर्घ जीवन के लिए तथा महान् रमणीय कर्म के लिए राक्षस, पिशाच आदि को भगाने वाली इस मणि को धारण करते हैं, जो वाराणसी में प्रसिद्ध जंगिड़ वृक्ष से बनती है. इस के कारण हम हिंसित न होते हुए अपना पालन करते हैं. (१) जङ्गिडो जम्भाद् विशराद् विष्कन्धाद् द अभिशोचनात्. मणिः सहस्रवीर्यः परि णः पातु विश्वतः.. (२) असीमित सामर्थ्य वाली जंगिड़ मणि राक्षस के दांतों द्वारा खाए जाने से, शरीर के खंडखंड हो कर बिखरने से, रोग आदि रूप विघ्नों से, उचित अनुचित कार्य के सोचविचार से एवं जम्हाई आदि सब से हमें बचाएं. (२) अयं विष्कन्धं सहते ऽ यं बाधते अत्रिणः. अयं नो विश्वभेषजो जङ्गिडः पात्वंहसः.. (३) जंगिड़ वृक्ष से निर्मित यह मणि दूसरों को पराजित करती है, कृत्या आदि भक्षकों को नष्ट करती है तथा समस्त रोगों की ओषधि है. यह जंगिड़ मणि हमें पाप से बचाए. (३) देवैर्दत्तेन मणिना जङ्गिडेन मयोभुवा. विष्कन्धं सर्वा रक्षांसि व्यायामे सहामहे.. (४) अग्नि आदि देवों के द्वारा दी हुई एवं सुख देने वाली जंगिड़ मणि से हम विघ्न करने वाले सभी राक्षसों को अपने घूमनेफिरने के प्रदेश में पराजित करते हैं. (४) शणश्च मा जङ्गिडश्च विष्कन्धादभि रक्षताम्. अरण्यादन्य आभृतः कृष्या अन्यो रसेभ्यः.. (५) मणि को बांधने वाले सूत्र का कारण सन एवं यह जंगिड़ मणि मुझ को विघ्नों से बचाएं. इन में से एक अर्थात् जंगिड़ मणि वन से लाई गई है और अन्य अर्थात् कृषि से संबंधित सन ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-५ देवता—इंद्र

रस से लाया गया है. (५) कृत्यादूषिरयं मणिरथो अरातिदूषिः. अथो सहस्वान् जङ्गिडः प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६) यह मणि दूसरों के द्वारा किए गए जादूटोने से उत्पन्न पीड़ा की निवारक एवं शत्रुओं को नष्ट करने वाली है. शक्ति संपन्न यह जंगिड़ मणि हमारी आयु को बढ़ाए. (६) सूक्त-५ देवता—इंद्र इन्द्र जुषस्व प्र वहा याहि शूर हरिभ्याम्. पिबा सुतस्य मतेरिह मधोश्चकानश्चारुर्मदाय.. (१) हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र! तुम हम पर प्रसन्न हो जाओ एवं हमें मनचाहा फल प्रदान करो. हे शूर इंद्र! अपने घोड़ों की सहायता से तुम मेरे यज्ञ में आओ तथा इस यज्ञ में निचोड़े गए सोमरस को पियो. यह सोमरस प्रशंसनीय एवं मधुर है. पीने पर यह सोमरस तृप्ति और उत्तम मादकता का कारण बनता है. (१) इन्द्र जठरं नव्यो न पृणस्व मधोर्दिवो न. अस्य सुतस्य स्व १ र्णोप त्वा मदाः सुवाचो अगुः.. (२) हे इंद्र! तुम नवीन के समान सोमरस से अपना पेट उसी प्रकार भर लो जिस प्रकार स्वर्ग के अमृत से पूर्ण करते हो. इस निचोड़े गए सोमरस के मद से संबंधित उत्तम स्तुति तथा स्वर्ग के समान आनंद तुम्हें यहां भी प्राप्त हो. (२) इन्द्रस्तुराषाण्मित्रो वृत्रं यो जघान यतीन्र्. बिभेद वलं भृगुर्न ससहे शत्रून् मदे सोमस्य.. (३) शत्रु विनाशक एवं समस्त प्राणियों के मित्र इंद्र ने वृत्र राक्षस को आसुरी प्रजाओं के समान मार डाला. जिस प्रकार यज्ञ करते हुए अंगिरा गोत्रीय भृगुओं के यज्ञ का आधार गौ का हरण करने वाले बल नामक असुर को मार डाला था, उसी प्रकार इंद्र ने वृत्र का हनन किया. इंद्र ने सोमरस के मद में शत्रुओं को पराजित किया. (३) आ त्वा विशन्तु सुतास इन्द्र पृणस्व कुक्षी विद्धि शक्र धियेह्या नः. श्रुधी हवं गिरो मे जुषस्वेन्द्र स्युग्भिर्मत्स्वेह महे रणाय.. (४) हे इंद्र! निचोड़ा गया सोमरस तुम्हारे उदर में प्रवेश करे. तुम इस से अपनी दोनों कोखों को भर लो. तुम हमारा आह्वान सुन कर यहां आओ तथा हमारी स्तुतियां सुनो एवं उन्हें स्वीकार करो. हे इंद्र! तुम इस यज्ञ में अपने मित्र मरुत् आदि देवों के साथ सोमरस पी कर तृप्त बनो तथा हमारे यज्ञकर्म को संपन्न बनाओ. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत् पर्वतानाम्.. (५)

इन्द्रस्य नु प्रा वोचं वीर्याणि यानि चकार प्रथमानि वज्री. अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत् पर्वतानाम्.. (५) मैं वज्रधारी इंद्र के उन वीरता पूर्ण कार्यों का वर्णन करता हूं जो उन्होंने पूर्व काल में किए हैं. उन्होंने वृत्रासुर का हनन किया तथा उस के बाद उस के द्वारा रोके गए जल को निकाल दिया एवं पर्वतों से निकलने वाली नदियों को बहाया. (५) अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष. वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः.. (६) पर्वत पर सोते हुए इस वृत्रासुर का इंद्र ने वध किया. वृत्र के पिता त्वष्टा ने इंद्र के लिए सुगमता से चलाया जाने वाला तथा तेज धारों वाला वज्र बनाया. इस के बाद जल सागर की ओर इस प्रकार बहने लगा, जिस प्रकार रंभाती हुई गाएं दौड़ती हैं. (६) वृषायमाणो अवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत् सुतस्य. आ सायकं मघवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजामहीनाम्.. (७) बैल के समान आचरण करते हुए इंद्र ने प्रजापति के पास से सोम रूपी अन्न प्राप्त किया. उस ने तीन सोम यागों में निचोड़े गए सोमरस का पान किया. इस के पश्चात इंद्र ने अपना शत्रुघातक वज्र हाथ में लिया एवं असुरों में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए वृत्र की हत्या की. (७) सूक्त-६ देवता—अग्नि समास्त्वाग्न ऋतवो वर्धयन्तु संवत्सरा ऋषयो यानि सत्या. सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन विश्वा आ भाहि प्रदिशश्चतस्रः.. (१) हे अग्नि! संवत्सर, ऋषिगण एवं पृथ्वी आदि तत्त्व तुम्हारी वृद्धि करें. इन सब के द्वारा बढ़े हुए तुम प्रकाश युक्त शरीर से दीप्त बनो तथा पूर्व आदि चार दिशाओं को और आग्नेय आदि चार विदिशाओं अर्थात् दिशा कोणों को प्रकाशित करो. (१) सं चेध्यस्वाग्ने प्र च वर्धयेममुच्च तिष्ठ महते सौभाग्य. मा ते रिषन्नुपसत्तारो अग्ने ब्रह्माणस्ते यशसः सन्तु मान्ये.. (२) हे अग्नि! तुम स्वयं दीप्त बनो एवं इस यजमान की इच्छाएं पूर्ण करते हुए इसे समृद्ध बनाओ एवं उस के सौभाग्य के हेतु उत्साहित बनो. तुम्हारे सेवक ऋत्विज् आदि नष्ट न हों. हे अग्नि! तुम्हारे ऋत्विज् ब्राह्मण ही यशस्वी हैं, अन्य नहीं. (२) त्वामग्ने वृणते ब्राह्मणा इमे शिवो अग्ने संवरणे भवा नः. सपत्नहाग्ने अभिमातिजिद् भव स्वे गये जागृह्यप्रयुच्छन्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि! हम ब्राह्मण तुम्हारी आराधना करते हैं. तुम हमारे प्रमादों को शांत करते हुए अथवा छिपाते हुए वर्तमान रहो. हे अग्नि! शत्रुओं को पराजित एवं पापों का विनाश करो. तुम प्रमाद न करते हुए अपने घर में जागृत रहो. (३) क्षत्रेणाग्ने स्वेन सं रभस्व मित्रेणाग्ने मित्रधा यतस्व. सजातानां मध्यमेष्ठा राज्ञामग्ने विहव्यो दीदिहीह.. (४) हे अग्नि देव! तुम अपने बल से संयुक्त बनो. हे मित्र का पोषण करने वाले अग्नि! तुम मित्र भाव से उपकार करने वाले बनो. तुम अपने समान उत्पन्न ब्राह्मणों में मध्यस्थ एवं क्षत्रियों में यज्ञ हो. हे अग्नि! इस प्रकार के तुम, इस यज्ञ में प्रकाशित हो जाओ. (४) अति निहो अति सृधो ऽ त्यचित्तीरति द्विषः. विश्वा ह्यग्ने दुरिता तर त्वमथास्मभ्यं सहवीरं रयिं दाः.. (५) हे अग्नि! तुम इंद्रियों के विषयों से उत्पन्न दोषों को, पाप बुद्धि वाले मनुष्यों को, देह का शोषण करने वाले रोगों को एवं हमारे शत्रुओं को समाप्त करो. तुम हमें समस्त पापों से पार करो तथा हमारे लिए पुत्र, पौत्र आदि से युक्त धन प्रदान करो. (५) सूक्त-७ देवता—वनस्पति अघद्विष्टा देवजाता वीरुच्छपथयोपनी. आपो मलमिव प्राणैक्षीत् सर्वान् मच्छपथाँ अधि.. (१) पाप का विनाश करने वाली, देवों के द्वारा बनाई गई एवं पाप का निवारण करने वाली दूर्वा मुझ से सभी पापों को इस प्रकार धो कर दूर कर दे, जिस प्रकार पानी मैल को धो डालता है. (१) यश्च सापत्नः शपथो जाम्याः शपथश्च यः. ब्रह्मा यन्मन्युतः शपात् सर्वं तन्नो अधस्पद्म्.. (२) द्वेष करने वाले शत्रु से संबंधित एवं बहन से संबंधित जो आक्रोश है तथा ब्राह्मण ने क्रोधित हो कर जो शाप दिया है—ये तीनों प्रकार के शाप मेरे पैर के नीचे रहें. (२) दिवो मूलमवततं पृथिव्या अध्युत्ततम्. तेन सहस्रकाण्डेन परि णः पाहि विश्वतः.. (३) हे मणि! हमें स्वर्ग की जड़ के समान विस्तृत एवं पृथ्वी के ऊपर विस्तृत असीमित पाप से बचाओ और सभी प्रकार से हमारी रक्षा करो. (३) परि मां परि मे प्रजां परि णः पाहि यद् धनम्. ebook converter DEMO Watermarks*

अरातिर्नो मा तारीन्मा नस्तारिषुरभिमातयः.. (४) हे मणि! मेरी, मेरी संतान की एवं मेरे धन की रक्षा करो. शत्रु हमारा अतिक्रमण न करे अर्थात् हमें पराजित न करे. हमारी हत्या करने के इच्छुक पिशाच आदि हमारी हिंसा न करें. (४) शप्तारमेतु शपथो यः सुहार्त्तेन नः सह. चक्षुर्मन्त्रस्य दुर्हर्दः पृष्टीरपि शृणीमसि.. (५) मुझे दिया हुआ शाप उसी के पास लौट जाए, जिस ने मुझे शाप दिया है. जो पुरुष शोभन हृदय वाला है, उस मित्र के साथ हम सुखी रहें. हम चुगली करने वाले दुष्ट हृदय वाले की आंखों एवं पसली की हड्डी को नष्ट करते हैं. (५) सूक्त-८ देवता—यक्ष्मा, कुष्ठ आदि उदगातां भगवती विचृतौ नाम तारके. वि क्षेत्रियस्य मुञ्चतामधमं पाशमुत्तमम्.. (१) तेजस्वी एवं बंधन से छुड़ाने वाले तारे उदित हों. वे तारे पुत्र, पौत्र आदि के शरीर में होने वाले यक्ष्मा, कुष्ठ आदि रोगों एवं उन के फंदों से हमें छुड़ाएं जो हमारे शरीर के नीचे एवं ऊपर के भागों में हैं. (१) अपेयं रात्र्युच्छत्वपोच्छन्त्वभिकृत्वरीः. वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु.. (२) यह प्रातःकाल के समीप वाली रात उसी प्रकार हमारे शरीर से व्याधियों को समाप्त करे, जिस प्रकार प्रकाश के कारण अंधकार का विनाश होता है. रोग की शांति करते हुए आदित्य देव आएं. निश्चित ओषधि भी रोग का विनाश करे. (२) बभ्रोरर्जुनकाण्डस्य यवस्य ते पलाल्या तिलस्य तिलपिञ्ज्या. वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु.. (३) मटमैले वर्ण के अर्जुन वृक्ष के काठ से, जौ की भूसी से एवं तिल की मंजरी से निर्मित मणि तेरा रोग दूर करे. क्षेत्रिय व्याधियों, अतिसार, यक्ष्मा आदि का विनाश करने वाली ओषधि समस्त रोगों को दूर करे. (३) नमस्ते लाङ्गलेभ्यो नम ईषायुगेभ्यः. वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु.. (४) हे रोगी! तेरे रोग को शांत करने के लिए मैं बैल जुते हुए हलों को एवं हरण तथा जुए