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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

नीरोग तथा हर्ष युक्त करो तथा पर्यंक (पलंग) पर चढ़ाते हुए दीर्घ काल तक प्रदीप्त होते रहो. (४९) ते देवेभ्य आ वृश्चन्ते पापं जीवन्ति सर्वदा. क्रव्याद् यानग्निरन्तिकादश्व इवानुवपते नडम्.. (५०) जिन का पाप अश्व द्वारा घास को कुचलने के समान क्रव्याद अग्नि को कुचलता है, पाप से अपनी जीविका चलाने वाले वे पुरुष देवयान के घातक हैं. तू इस पशु धर्म पर चढ़. (५०) ये ऽ श्रद्ध्रा धनकाम्या क्रव्यादा समासते. ते वा अन्येषां कुम्भीं पर्यादधति सर्वदा.. (५१) जो मनुष्य धन की इच्छा से क्रव्याद अग्नि की सेवा करते हैं, वे पुरुष सदा दूसरों की रक्षा करते हैं. (५१) प्रेव पिपतिषति मनसा मुहुरा वर्तते पुनः. क्रव्याद् यानग्निरन्तिकादनुविद्वान् वितावति.. (५२) जिस पुरुष के पास आ कर क्रव्याद अग्नि तपती है, वह बारबार आवागमन के चक्र में पड़ा रहता है तथा अधोगति को प्राप्त होता है. (५२) अविः कृष्णा भागधेयं पशूनां सीसं क्रव्यादपि चन्द्रं त आहुः. माषाः पिष्टा भागधेयं ते हव्यमरण्यान्या गह्वरं सचस्व.. (५३) हे क्रव्याद अग्नि! काली भेड़, सीसा और चंद्रमा को तेरा भाग माना जाता है तथा पिसे हुए उरद भी तेरे हव्य रूप हैं. अतः तू फिर जंगल में पहुंच जा. (५३) इषीकां जरतीमिष्ट्वा तिल्पिञ्जं दण्डनं नडम्. तमिन्द्र इध्मं कृत्वा यमस्याग्निं निरादधौ.. (५४) पुरानी सींक, दंड, तिलों का ढेर तथा सरकंडे को इंद्र ने ईंधन बनाया और उस के द्वारा यम की इस अग्नि को पृथक् कर दिया. (५४) प्रत्यञ्चमर्कं प्रत्यर्पयित्वा प्रविद्वान् पन्थां वि ह्या विवेश. परामीषामसूनू दिदेश दीर्घेणायुषा समिमान्त्सृजामि.. (५५) गार्हपत्य अग्नि सूर्य को अर्पित हो कर देवयान मार्ग में प्रविष्ट हुई थी और जिन के प्राणों को नष्ट कर दिया, मैं उन यजमानों को चिर आयु से युक्त करता हूं. (५५) eBook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-३ देवता—स्वर्ग अग्नि

सूक्त-३ देवता—स्वर्ग अग्नि पुमान् पुंसो ऽ धि तिष्ठ चर्मेहि तत्र ह्वयस्व यतमा प्रिया ते. यावन्तावग्रे प्रथमं समेयथुस्तद् वां वयो यमराज्ये समानम्.. (१) हे पुरुषार्थ वाले पुरुष! तू इस पशु धर्म पर चढ़ जा. तू अपने प्रिय व्यक्तियों को भी बुला ले. पहले जितने पतिपत्नियों ने इस कार्य को किया, उन का और तुम्हारा समान फल हो. (१) तावद् वां चक्षुस्तति वीर्याणि तावत् तेजस्ततिधा वाजिनानि. अग्निः शरीरं सचते यदैधो ऽ धा पक्वान्मिथुना सं भवाथः.. (२) स्वर्ग में तुम्हारे शरीरों को यह अग्नि ही संचित करेगी. उस समय तुम पक्व ओदन के प्रभाव से इसी रूप में स्वर्ग में होओगे. तुम से उत्पन्न शिशु को भी दर्शन शक्ति तथा उसी प्रकार का तेज प्राप्त होगा. यह शब्दात्मक यज्ञ भी इसी प्रकार अग्नि के योग्य होगा. (२) समस्मिंल्लोके समु देवयाने सं स्मा समेतं यमराज्येषु. पूतौ पवित्रैरुप तद्ध्वयेथां यद्यद् रेतो अधि वां संबभूव.. (३) इस ओदन के प्रभाव से इस लोक में तुम दोनों साथ रहो. तुम यम मार्ग में तथा यह मेरे यज्ञ में साथ ही रहो. इन पवित्र यज्ञों को पूरा करने के कारण तुम पवित्र हो चुके हो. तुम ने जिसजिस कार्य के लिए संकेत किया, तुम उन कर्मों के फल प्राप्त करो. (३) आपसपुत्रासो अभि सं विशध्वमिमं जीवं जीवधन्याः समेत्य. तासां भजध्वममृतं यमाहुर्यमोदनं पचति वां जनित्री.. (४) हे पति और पत्नियो! तुम दीर्घरूपी जल हो. इस जीवन में धन्य होते हुए प्रवेश करो. तुम्हारा उत्पादन जल्द ही ओदन को पकाता है. तुम उसी जल के अमृतमय अंश का सेवन करो. (४) यं वां पिता पचति यं च माता रिप्रान्निर्मुक्त्यै शमलाच्च वाचः. स ओदनः शतधारः स्वर्ग उभे व्याप नभसी महित्वा.. (५) माता और पिता यदि वाणी जन्य पाप से अथवा अन्य पाप से निवृत्त होने के लिए ओदन पकाते हैं तो वह ओदन अपनी महिमा से स्वर्ग और द्यावा पृथ्वी में व्याप्त होता है. (५) उभे नभसी उभयांश्च लोकान् ये यज्वनामभिजिताः स्वर्गाः. तेषां ज्योतिष्मान् मधुमान् यो अग्रे तस्मिन् पुत्रैर्जरसि सं श्रयेथाम्.. (६) हे पति और पत्नी! यजमान आकाश और पृथ्वी पर तथा जिन लोकों में अधिकार पाते हैं, उन में जो प्रकाशित और मधुमय लोक है. उस लोक को अथवा पृथ्वी और स्वर्ग दोनों

लोकों को प्राप्त करो तथा संतान से संपन्न होते हुए वृद्धावस्था तक जीवित रहो। (६) प्राचींप्राचीं प्रदिशमा रभेथामेतं लोकं श्रद्दधानाः सचन्ते. यद् वां पक्वं परिविष्टमग्नौ तस्य गुप्तये दम्पती सं श्रयेथाम्.. (७) हे पति और पत्नी! तुम पूर्व की ओर बढ़ो. उस स्वर्ग पर श्रद्धालु जन ही चढ़ पाते हैं. तुम ने जो पका हुआ ओदन अग्नि पर रखा है उस की रक्षा के लिए खड़े रहो. (७) दक्षिणां दिशमभि नक्षमाणौ पर्यावर्तेथामभि पात्रमेतत्. तस्मिन् वां यमः पितृभिः संविदानः पक्वाय शर्म बहुलं नि यच्छात्.. (८) हे पति और पत्नी! तुम दक्षिण की ओर जा कर इस की प्रदक्षिणा करते हुए आओ. असमय पितरों से सहमत हुए यमराज तुम्हारे ओदन के लिए अनेक प्रकार के कल्याण प्रदान करें. (८) प्रतीची दिशामियमिद् वरं यस्यां सोमो अधिपा मृडिता च. तस्यां श्रयेथां सुकृतः सचेथामधा पक्वान्मिथुना सं भवाथः.. (९) पश्चिम दिशा में स्वामी और सुख देने वाला व्योम है, इसलिए यह दिशा श्रेष्ठ मानी जाती है. तुम इस दिशा में पके हुए ओदन को रख कर पुण्य कर्मों का फल प्राप्त करो. फिर इस पके हुए ओदन के प्रभाव से तुम दोनों स्वर्ग और पृथ्वी पर प्रकट होओ. (९) उत्तरं राष्ट्रं प्रजयोत्तरावद् दिशामुदीचीं कृणवन्नो अग्रम्. पाङ्क्तं छन्दः पुरुषो बभूव विश्वैर्विश्वाङ्गैः सह सं भवेम.. (१०) उत्तर दिशा प्रजाओं से युक्त है. यह श्रेष्ठ दिशा हम को श्रेष्ठता प्रदान करे. पंक्ति छंद ओदन के रूप में प्रकट होता है. हम भी पृथ्वी और स्वर्ग को अपने सभी अंगों सहित प्राप्त हों. (१०) ध्रुवेयं विराणनमो अस्त्वस्यै शिवा पुत्रेभ्य उत मह्यमस्तु. सा नो देव्यदिते विश्ववार इर्य गोपा अभि रक्ष पक्वम्.. (११) यह वरण करने योग्य तथा खंड न होने वाली पृथ्वी है. यह हमारे लिए सुख देने वाली हो. यह हमारे पुत्रों का मंगल करे तथा नियुक्त रक्षक के समान यह ओदन की रक्षा करे. (११) पितेव पुत्रानभि सं स्वजस्व नः शिवा नो वाता इह वान्तु भूमौ. यमोदनं पचतो देवते इह तन्नस्तप उत सत्यं च वेत्तु.. (१२) हे पृथ्वी! जिस प्रकार पिता अपने पुत्रों का आलिंगन करता है, उसी प्रकार तुम इस ओदन का आलिंगन करो. यहां मंगलमय वस्तु प्रवाहित हो. तुम हमारे ओदन को तपाओ तथा ebook converter DEMO Watermarks*

हमारे यथार्थ संकल्प को जानो. (१२) यद्यत् कृष्णः शकुन एह गत्वा त्सरन् विषक्तं बिल आससाद. यद्वा दास्या ३ र्द्रहस्ता समङ्क्त उलूखलं मुसलं शुम्भतापः.. (१३) कौवे ने कपट कर के इस में बिल बनाया हो अथवा दासी ने भीगे हुए हाथ से मूसल और उलूखल का स्पर्श कर लिया हो, तब भी यह मंगलकारक हो. (१३) अयं ग्रावा पृथुबुध्नो वयोधाः पूतः पवित्रैरप हन्तु रक्षः. आ रोह चर्म महि शर्म यच्छ मा दम्पती पौत्रमघं नि गाताम्.. (१४) यह दृढ़ पाषाण हवि धारण करने वाला है. यह शुद्ध हो कर राक्षसों को नष्ट करे. हे ओदन! तू चरम पर आता हुआ कल्याण करने वाला हो. इस दंपती के पौत्र को उन का पाप न छू सके. (१४) वनस्पतिः सह देवैर्न आगन् रक्षः पिशाचाँ अपबाधमानः. स उच्छ्रायैतै प्र वदाति वाचं तेन लोकां अभि सर्वांजयेम.. (१५) यह वनस्पति राक्षसों और पिशाचों को रोकती हुई हम को प्राप्त हुई है. वह हमें उच्च स्वर वाला तथा सभी लोकों पर विजय प्राप्त करने वाला बनाए. (१५) सप्त मेधान् पशवः पर्यगृह्णन् य एषां ज्योतिष्माँ उत यश्चकर्श. त्रयस्त्रिंशद् देवतास्तान्सचन्ते स नः स्वर्गमभि नेष लोकम्.. (१६) इन चावलों में जो पतला, परंतु अधिक चमकता हुआ है, ऐसे सात चावलों को लोगों ने पशु के समान ग्रहण किया है. यह तैंतीस देवताओं के द्वारा सेवन करने योग्य है. यह ओदन हम को स्वर्ग में पहुंचाए. (१६) स्वर्गं लोकमभि नो नयासि सं जायया सह पुत्रैः स्याम. गृह्णामि हस्तमनु मैत्वत्र मा नस्तारीन्निर्ऋतिर्मो अरातिः.. (१७) हे ओदन! तू हमें स्वर्ग में लिए जा रहा है. वहां हम स्त्रीपुरुषों सहित प्रकट हों. पाप देवता निर्ऋति और शत्रु वहां हम को अपने वश में न करें इसलिए तू अनुगमन कर. मैं तेरे हाथ को पकड़ रहा हूं. (१७) ग्राहिं पाप्मानमति ताँ अयाम तमो व्यस्य प्र वदासि वल्गु. वानस्पत्य उद्यतो मा जिहिंसीर्मा तण्डुलं वि शरीर्देवयन्तम्.. (१८) हे वनस्पति! तुम पाप से उत्पन्न होने वाले अंधकार को दूर करते हुए मधुर शब्द करती हो. हम अपने पापों से पार हो जाएं. यह वनस्पति मेरी हिंसा न करे और न मुझे देवमार्ग प्राप्त ebook converter DEMO Watermarks*

कराने वाले चावलों की हिंसा करे. (१८) विश्वव्यचा घृतपृष्ठो भविष्यन्त्सयोनिर्लोकमुप याह्येतम्. वर्षवृद्धमुप यच्छ शूर्पं तुषं पलावानाप तद् विनक्तु.. (१९) हे ओदन! तू घृतपृष्ठ अर्थात् घी की पीठ वाला हो कर मत आ. तू परलोक में हमारे साथ प्रकट होने के लिए हमारे पास आ और वर्षा ऋतु में प्रवृद्ध उपकरण वाले रूप को प्राप्त हो. वह तुझ से भूसी को अलग करे. (१९) त्रयो लोका: संमिता ब्राह्मणेन द्यौरेवासौ पृथिव्य१न्तरिक्षम्. अंशून् गृभीत्वान्वारभेथामा प्यायन्तां पुनरा यन्तु शूर्पम्.. (२०) आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी इन तीनों लोकों को ब्राह्मण प्राप्त कराता है. हे पति और पत्नी! तुम चावलों को फटकना आरंभ करो. यह धान उछालते हुए सूप को प्राप्त हो. (२०) पृथग् रूपाणि बहुधा पशूनामेकरूपो भवसि सं समृद्ध्या. एतां त्वचं लोहिनीं तां नुदस्व ग्रावा शुम्भाति मलग इव वस्त्रा.. (२१) हे धान! पशु विभिन्न रूपों वाले होते हैं, परंतु तू एक ही रूप वाला है. तू पाषाण के द्वारा अपनी भूसी का त्याग कर. (२१) पृथिवीं त्वा पृथिव्यामा वेशयामि तनू: समानी विकृता त एषा. यद्यद् द्युत्तं लिखितमर्पणेन तेन मा सुस्रोर्ब्रह्मणापि तद् वपामि.. (२२) हे मूसल! तू पृथ्वी का बना हुआ है. इसलिए तू पृथ्वी ही है. पृथ्वी की तथा तेरी देह एक समान है. इसलिए मैं पृथ्वी को ही पृथ्वी पर मार रहा हूं. हे ओदन! मूसल के प्राप्त होने से तेरे अंग में जो पीड़ा हो रही है, उस पीड़ा से तू भूसी से अलग हो कर छूट जा. मैं तुझे मंत्र द्वारा अग्नि को अर्पित करता हूं. (२२) जनित्रीव प्रति हर्यासि सूनुं सं त्वा दधामि पृथिवीं पृथिव्या. उखा कुम्भी वेद्यां मा व्यथिष्ठा यज्ञायुधैराज्येनातिषिक्ता.. (२३) माता जिस प्रकार अपने पुत्र को प्राप्त करती है, उसी प्रकार मैं मूसल रूपी पृथ्वी को पृथ्वी से मिलाता हूं. वेदी में भी ओखली रूपी कुंभी अर्थात् पकाने वाला पात्र है, इसलिए तू व्यथित मत हो. तू यज्ञ के आयुधों द्वारा घृत से युक्त की जा चुकी है. (२३) अग्नि: पचन् रक्षतु त्वा पुरस्तादिन्द्रो रक्षतु दक्षिणतो मरुत्वान्. वरुणस्त्वा दृंहाद्धरुणे प्रतीच्या उत्तरात् त्वा सोम: सं ददातै.. (२४) अग्नि पाचन अर्थात् पकाने के कर्म में तेरी रक्षक हो. इंद्र पूर्व से, मरुद्गण दक्षिण से, ebook converter DEMO Watermarks*

वरुण पश्चिम से तथा सोम उत्तर दिशा की ओर से तेरी रक्षा करें. (२४) पूताः पवित्रैः पवन्ते अभ्राद् दिवं च यन्ति पृथिवीं च लोकान्. ता जीवला जीवधन्याः प्रतिष्ठाः पात्र आसिक्ताः पर्यग्निरिन्धाम्.. (२५) पुण्य कर्मों द्वारा शुद्ध हुए जल तुझे शुद्ध करने वाले हों. वे मेघों द्वारा आकाश में जाते और फिर पृथ्वी पर आ कर मनुष्यों की सेवा करते हैं. जल पृथ्वी से पुनः अंतरिक्ष में पहुंचते हैं तथा प्राणियों को सुखी करने वाले पात्र में स्थित होते हैं. अग्नि इन आसक्त होने वाले जलों को सभी ओर दीप्त करें. (२५) आ यन्ति दिवः पृथिवीं सचन्ते भूम्याः सचन्ते अध्यन्तरिक्षम्. शुद्धाः सतीस्ता उ शुम्भन्त एव ता नः स्वर्गमभि लोकं नयन्तु.. (२६) आकाश से आने वाले ये जल पृथ्वी की सेवा करते हैं तथा पृथ्वी से पुनः आकाश में पहुंचते हैं. ये पवित्र जल पवित्रता देने वाले हैं. ये जल हम को स्वर्ग की प्राप्ति कराएं. (२६) उतेव प्रभ्वीरुत संमितास उत शुक्राः शुचयश्चामृतासः. ता ओदनं दंपतिभ्यां प्रशिष्टा आपः शिक्षन्तीः पचता सुनाथाः.. (२७) ये जल श्वेत रंग वाले, दमकते हुए एवं अमृत के समान हैं. हे जलो! इस दंपती द्वारा डाले जाने पर ओदन को शुद्ध करते हुए पकाओ. (२७) संख्याता स्तोकाः पृथिवीं सचन्ते प्राणापानैः संमिता ओषधीभिः. असंख्याता ओप्यमानाः सुवर्णाः सर्वं व्यापुः शुचयः शुचित्वम्.. (२८) प्राण, अपान तथा समान स्वरूप ओषधियों से युक्त पृथ्वी का सेचन करते हैं और शोभन वर्ण वाले जीवों में प्रविष्ट असंख्य जल शुद्धता देते हुए प्राप्त होते हैं. (२८) उद्योधन्त्यभि वल्गन्ति तप्ताः फेनमस्यन्ति बहुलांश्च बिन्दून्. योषेव दृष्ट्वा पतिमुत्वियायैतैस्तण्डुलैर्भवता समापः.. (२९) ताप देने पर ये जल शब्द करते हैं तथा बूंदों को उड़ाते हुए युद्ध सा करते हैं. हे जलो! जिस प्रकार पति को देख कर पत्नी उस से मिल जाती है, उसी प्रकार तुम ऋतु में होने वाले यज्ञ के निमित्त चावलों में मिल जाओ. (२९) उत्थापय सीदतो बुध्न एनानद्भिरात्मानमभि सं स्पृशन्ताम्. अमासि पात्रैरुदकं यदेतन्मितास्तण्डुलाः प्रदिशो यदीमाः.. (३०) हे ओदन की अधिष्ठात्री देवी! मूसल की जड़ से व्यथित होते हुए इन चावलों को उठाओ. ये जल से मिलें. हे यजमान! तू जल को पात्रों द्वारा नाप रहा है. इधर ये चावल भी ebook converter DEMO Watermarks*

प्र यच्छ पर्शुं त्वरया हरौषमहिंसन्त ओषधीर्दान्तु पर्वन्.

नप गए हैं. इन्हें जल में डालने की अनुज्ञा प्रदान कर. (३०) प्र यच्छ पर्शुं त्वरया हरौषमहिंसन्त ओषधीर्दान्तु पर्वन्. यासां सोमः परि राज्यं बभूवामन्युता नो वीरुधो भवन्तु.. (३१) कलछी को चलाओ और जो चावल पक चुके हैं, उन्हें ले लो. ये किसी की हिंसा न करते हुए प्रत्येक पर्व में ओषधि रूपी फल प्राप्त करें. जिन लताओं का राजा सोम है, ये लताएं मोक्ष करने वाली हों. (३१) नवं बर्हिरोदनाय स्तृणीत प्रियं हृदश्वक्षुषो वल्ववस्तु. तस्मिन् देवाः सह दैवीर्विशन्तिवमं प्राश्नन्त्वृतुभिर्निषद्य.. (३२) ओदन रखने के लिए नवीन कुशा फैला दो. यह कुशा का आसन हृदय और नेत्रों को सुंदर लगे. देवता उस पर अपनी पत्नियों सहित विराजमान होते हुए इस ओदन का सेवन करें. (३२) वनस्पते स्तीर्णमा सीद बर्हिरग्निष्टोमैः संमितो देवताभिः. त्वष्ट्रेव रूपं सुकृतं स्वधित्दैना एहाः परि पात्रे ददृश्राम्.. (३३) हे वनस्पति! कुशा बिछा दी है. तुम उस पर बैठो. देवताओं ने तुम्हें अग्नि सोम के समान समझा है. स्वधिति ने उसे त्वष्टा के समान शोभन रूप दिया है. वह अब पात्रों में दिखाई देता है. (३३) षष्ट्यां शरत्सु निधिपा अभीच्छात् स्वः पक्वेनाभ्यश्ववातै. उपैनं जीवन् पितरश्च पुत्रा एतं स्वर्गं गमयान्तमग्नेः.. (३४) इस निधि का रक्षक यजमान इस पके हुए ओदन के भक्षण का फल स्वर्ग में साठ वर्ष पश्चात प्राप्त करे. हे यश के अभिमानी देव! तुम इस यजमान को स्वर्ग प्राप्त कराते हुए इस के पितरों, पुत्र आदि को भी इस के समीप रखो. (३४) धर्ता ध्रियस्व धरुणे पृथिव्या अच्युतं त्वा देवताश्च्यावयन्तु. तं त्वा दम्पती जीवन्तौ जीवपुत्रावुद् वासयातः पर्यग्निधानात्.. (३५) हे ओदन! तू धारण करने वाला है. इसलिए भूमि के स्थान में प्रतिष्ठित हो. तू अच्युत है, देवता तुझे च्युत न करें. जीवित पुत्रों वाले पतिपत्नी तुझे धान के द्वारा पुष्ट करें. (३५) सर्वान्त्समागा अभिजित्य लोकान् यावन्तः कामाः समतीतृपस्तान्. वि गाहेथामायवनं च दविरिकस्मिन् पात्रे अध्युद्धरैनम्.. (३६) हे ओदन! तू सभी लोकों पर विजय प्राप्त करता हुआ आ. तू हमारी सभी इच्छाओं को ebook converter DEMO Watermarks*

पूरी तरह तृप्त कर. कलछी को घुमाते हुए पतिपत्नी ओदन को निकाल कर पात्र में स्थित करें. (३६) उप स्तृणीहि प्रथय पुरस्ताद् घृतेन पात्रमभि धारयैतत्. वाश्रेवोस्त्रा तरुणं स्तनस्युमिमं देवासो अभिहिङ्कृणोत.. (३७) तुम इसे परोस कर फैलाओ तथा इस में घी डालो. हे देवगण! दूध पीने वाले को देख कर दुधारू गाएं दूध पीने वाले बछड़े को देखकर शब्द करती हुई जिस प्रकार उस की ओर दौड़ती हैं, उसी प्रकार इस तैयार ओदन की ओर तुम शब्द करो. (३७) उपास्तरीकरो लोकमेतमुरुः प्रथतामसमः स्वर्गः. तस्मिञ्छ्रयातै महिषः सुपर्णो देवा एनं देवताभ्यः प्र यच्छान्.. (३८) हे यजमान! ओदन परोस कर तुम ने इस लोक को वश में कर लिया है. उस के प्रभाव से स्वर्ग के यही ओदन तुझे अधिक बढ़े हुए प्राप्त हों. हे पति और पत्नी! यह सुंदर महिमा वाला और गमनशील ओदन तुम्हें स्वर्ग को प्राप्त कराए. देवता इस यजमान को देवों के समीप पहुंचा दें. (३८) यद्यज्जाया पचति त्वम् परः परः पतिर्वा जाये त्वत् तिरः. सं तत् सृजेथां सह वां तदस्तु संपादयन्तौ सह लोकमेकम्.. (३९) हे जाया! तू इस ओदन को पकाती है. यदि तू अपने पति से पहले चली जाए तो तुम दोनों स्वर्ग में मिल जाना. तुम दोनों एक लोक में रहो तथा यह ओदन भी वहां तुम्हारे पास रहे. (३९) यावन्तो अस्याः पृथिवीं सचन्ते अस्मत् पुत्राः परि ये संबभूवुः. सर्वांस्तां उप पात्रे ह्रयेथां नाभिं जानानाः शिशवः समायान्.. (४०) हे यजमान! तुम अपनी पत्नी और सब पुत्रों को इस पात्र के पास बुलाओ. वे बालक अपनी नाभि (केंद्र) को जानते हुए यहां आएं (४०) वसोर्या धारा मधुना प्रपीना घृतेन मिश्रा अमृतस्य नाभयः. सर्वास्ता अव रुन्धे स्वर्गः षष्ट्यां शरत्सु निधिपा अभीच्छात्.. (४१) वसुयुक्त ओदन की मधु के द्वारा मोटी बनी हुई धाराएं घी से मिली हुई हैं. स्वर्ग अमृत की थाली के समान है. स्वर्ग इन को रोकता है. वसु की धाराएं निधि की रक्षक हैं. मनुष्य साठ वर्ष की अवस्था में इन की इच्छा करे. (४१) निधिं निधिपा अभ्येनमिच्छादनीश्वरा अभितः सन्तु ये ३ न्ये. अस्माभिर्दत्तो निहितः स्वर्गस्त्रिभिः काण्डैस्त्रीन्त्स्वर्गानिरुक्षत्.. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*

यजमान को इस निधि की कामना करनी चाहिए. हमारे द्वारा दिया हुआ भात धरोहर के रूप में है. यह ओदन स्वर्गगामी होता हुआ अपने तीनों कांडों सहित स्वर्ग में पहुंचे. (४२) अग्नी रक्षस्तपतु यद् विदेवं क्रव्यात् पिशाच इह मा प्र पास्त. नुदाम एनमप रुध्मो अस्मदादित्या एनमङ्गिरसः सचन्ताम्.. (४३) जो राक्षस मेरे कर्म फल में बाधा पहुंचाते हैं. ये अग्नि देव उन्हें बाधित करें अर्थात् रोकें. क्रव्याद और पिशाच हमारा शोषण न करें. इस राक्षस को यहां आने से रोकते हुए हम भागते हैं. आंगिरस और सूर्य इस राक्षस को वश में करें. (४३) आदित्येभ्यो अङ्गिरोभ्यो मध्विदं घृतेन मिश्रं प्रति वेदयामि. शुद्धहस्तौ ब्राह्मणस्यानिहत्यैतं स्वर्गं सुकृतावपीतम्.. (४४) मैं यह घृत युक्त मधु आंगिरसों तथा आदित्यों के हेतु निवेदित करता हूं. ब्राह्मण के पवित्र हाथ फल के रूप में इस ओदन को स्वर्ग में पहुंचाएं. (४४) इदं प्रापमुत्तमं काण्डमस्य यस्माल्लोकात् परमेष्ठी समाप. आ सिञ्च सर्पिर्घृतवत् समङ्ग्ध्येष भागो अङ्गिरसो नो अत्र.. (४५) प्रजापति ने जिस दिखाई देते हुए कांड के द्वारा फल प्राप्त किया था. उस उत्तम कांड को मैं ने भी प्राप्त कर लिया है. इसे घृत से सींचो. यह घृत युक्त भाग हम अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों का है. (४५) सत्याय च तपसे देवताभ्यो निधिं शेवधिं परि दद्म एतम्. मा नो द्यूते ऽ व गान्मा समित्यां मा स्मान्यस्मा उत्सृजता पुरा मत्.. (४६) सत अर्थात् स्थायी फल के निमित्त हम यह ओदन रूप धरोहर देवताओं को सौंपते हैं. परस्पर कर्म के आदानप्रदान रूप द्यूत में तथा समिति में भी यह हम से अलग न हो. इसे अन्य पुरुषों का भोज्य मत बनाओ. (४६) अहं पचाम्यहं ददामि ममेदं कर्मन् करुणे ऽ धि जाया. कौमारो लोको अजनिष्ट पुत्रो ३ न्वारभेथां वय उत्तरावत्.. (४७) पाक क्रिया करने वाला मैं ही इस का दान कर रहा हूं. हे यज्ञात्मक कर्म! इस कार्य में मेरे साथ मेरी पत्नी भी सहयोग कर रही है. हमारे घर में कुमार अवस्था वाला एक पुत्र है. हम इस उत्तम कर्म रूप यज्ञान्न के पाक तथा दान आदि कर्मों को उसके कल्याण के हेतु करते हैं. (४७) न किल्बिषमत्र नाधारो अस्ति न यन्मित्रैः समममान एति. अनूनं पात्रं निहितं न एतत् पक्तारं पक्वः पुनरा विशाति.. (४८) ebook converter DEMO Watermarks*

इस कर्म में किसी प्रकार का हेरफेर नहीं है. इस का कोई अन्य आधार भी नहीं है. यह अपने मित्रों के साथ मिल कर भी नहीं आता है. यह जो पूर्ण पात्र रखा गया है, वही पकाने वाले को पुनः प्राप्त हो जाता है. (४८) प्रियं प्रियाणं कुणवाम तमस्ते यन्तु यतमे द्विषन्ति. धेनुरनड्‌वान् वयोवय आयदेव पौरुषेयमप मृत्युं नुदन्तु.. (४९) हे यजमान! प्रिय से भी प्रिय फल वाले कर्म को भी हम तेरे लिए करते हैं. तेरे द्वेषी पुरुष नरक के रूप अंधकार की करे. गौ, बैल, अन्न, आयु और पुरुषार्थ ये हमारे समीप आते हुए अपमृत्यु आदि को दूर भगाएं. (४९) समग्नयो विदुरन्यो अन्यं य ओषधीः सचते यश्च सिन्धून्. यावन्तो देवा दिव्या ३ तपन्ति हिरण्यं ज्योतिः पचतो बभूव.. (५०) ओषधियों का भक्षण करने वाले अग्नि तथा जलों के सेवन कर्ता अग्नि एकदूसरे को जानते हैं. उन के अतिरिक्त अन्य अग्नि भी इस कर्म को जानते हैं. देवताओं के तप, सुवर्ण तथा चमचमाते हुए अन्य पदार्थ पाक कर्म करने वाले को प्राप्त होते हैं. (५०) एषा त्वचां पुरुषे सं बभूवानग्नाः सर्वे पशवो ये अन्ये. क्षत्रेणात्मानं परि धापयाथो ऽ मोतं वासो मुखमोदनस्य.. (५१) ये पशु चर्म से आच्छादित दिखाई पड़ते हैं. इन की त्वचा पहले पुरुष में थी. हे पति और पत्नी! तुम अपने को क्षमा तेज से संपन्न करो तथा इस भात के मुख को ढक दो. (५१) यदक्षेषु वदा यत् समित्यां यद्वा वदा अनृतं वित्तकाम्या. समानं तन्तुमभि संवसानौ तस्मिन्सर्वं शमलं सादयाथः.. (५२) द्यूत कर्म में अथवा युद्ध में धन प्राप्ति की अभिलाषा से तुम ने जो मिथ्या भाषण किया है, समस्त तंतुओं से बने इस वस्त्र से ढकते हुए अग्नि में उस दोष को प्रविष्ट कर दो. (५२) वर्षं वनुष्वापि गच्छ देवांस्त्वचो धूमं पर्युत्पातयासि. विश्वव्यचा घृतपृष्ठो भविष्यन्सयोनिलोर्कमुप याह्येतम्.. (५३) हे ओदन! तू फल की वर्षा करने वाला हो. तू देवताओं के पास जा कर अपनी त्वचा को धुएं के समान उछालना. तू घृत पृष्ठ होता हुआ अनेक प्रकार से पूजित हो कर तथा समान उत्पत्ति वाला बन कर इस पुरुष को स्वर्ग में प्राप्त हो. (५३) तन्वं स्वर्गो बहुधा वि चक्रे यथा विद आत्मन्नन्यवर्णांम्. अपाजैत् कृष्णां रुशतीं पुनानो या लोहिनी तां ते अग्नौ जुहोमि.. (५४) ebook converter DEMO Watermarks*

यह ओदन स्वर्ग में अपनेआप को उसी प्रकार अनेक आकार वाला बना लेने में समर्थ है. जिस प्रकार आत्मा ज्ञानी को अनेक प्रकार का बना देता है तथा कालिमा को शुद्ध करता जाता है, उसी प्रकार मैं तेरे रूप को अग्नि में होम करता हूं. (५४) प्राच्यै त्वा दिशे ३ग्नये ऽ धिपतये ऽ सिताय रक्षित्र आदित्यायेषुमते. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतो:. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सहं सं भवेम.. (५५) हम तुझे पूर्व दिशा, अग्नि, काले सर्प और आदित्य को दान करते हैं. तू हमारे यहां से जाने तक इस पुरुष की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक हम को माननीय रूप में प्राप्त कराओ. हमारी वृद्धावस्था ही इसे मृत्यु प्रदान करें. हम इस पके हुए ओदन सहित स्वर्ग वासी होते हुए आनंद को प्राप्त करें. (५५) दक्षिणायै त्वा दिश इन्द्राय ऽ धिपतये तिरश्चिराजये रक्षित्रे यमायेषुमते. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतो:. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (५६) हम तुझे दक्षिण दिशा, इंद्र, तिरश्री सर्प और यम को प्रदान करते हैं. तू हमारे यहां से जाने तक इस की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक हम भाग्य रूप में प्राप्त करें. हमारी वृद्धावस्था इसे मृत्यु प्रदान करे. (५६) प्रतीच्यै त्वा दिशे वरुणाय ऽ धिपतये पृदाकवे रक्षित्रे ऽ न्नायेषुमते. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतो:. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (५७) हम तुझे पश्चिम दिशा, वरुण, पृदाकू सर्प तथा वरुणधारी अन्न को प्रदान करते हैं. तू हमारे यहां से प्रस्थान करने तक इस की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक भाग्य रूप में हमें प्राप्त करा. हमारी वृद्धावस्था ही इसे मृत्यु प्रदान करे और मरने पर हम इस पके हुए ओदन सहित स्वर्ग में जा कर आनंद प्राप्त करें. (५७) उदीच्यै त्वा दिशे सोमायाधिपतये स्वजाय रक्षित्रे ऽ शन्या इषमत्यै. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतो:. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (५८) हम तुझे उत्तर दिशा, सोम, स्वज नामक सर्प एवं अशनि को प्रदान करते हैं. तू हमारे ebook converter DEMO Watermarks*

यहां से प्रस्थान करने तक इस की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक भाग्य के रूप में हमें प्राप्त करा. हमारी वृद्धावस्था इसे मृत्यु प्रदान करे. मरने पर हम इस पके हुए ओदन के साथ स्वर्ग में आनंद प्राप्त करें. (५८) ध्रुवायै त्वा दिशे विष्णवे ऽ धिपतये कल्माषग्रीवाय रक्षित्र ओषधीभ्य इषुमतीभ्यः. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतोः. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (५९) हे ओदन! हम तुझे ध्रुव अर्थात् नीचे की ओर वाली दिशा, उस के अधिपति विष्णु, संरक्षण कर्ता कल्माष ग्रीव नामक सर्प और इषुमन्ती ओषधियों को देते हैं. तुम हमारे जाने के समय तक इस की रक्षा करो. उसे हमारे कर्मों के फल स्वरूप जीर्ण अवस्था प्राप्त कराओ. जीर्णावस्था इसे मृत्यु को सौंपे. इस पके हुए अन्न के साथ हम पुनः उत्पन्न होंगे. (५९) ऊर्ध्वायै त्वा दिशे बृहस्पतये ऽ धिपतये श्वित्राय रक्षित्रे वर्षायिषुमते. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतोः. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (६०) हम तुझे ऊर्ध्व दिशा, बृहस्पति, सर्प और इषुमान वर्ष को देते है. हमारे यहां से प्रस्थान करने तक तू इस की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक हमारे भाग्य के रूप में प्राप्त करा. वृद्धावस्था मृत्यु प्रदान करे. मरने पर हम इस सुपक्व ओदन सहित स्वर्गगामी हों तथा वहां आनंद प्राप्त करें. (६०) सूक्त-४ देवता—वशा ददामीत्येव ब्रूयादनु चैनामभुत्सत्. वशां ब्रह्मभ्यो याचद्भ्यस्तत् प्रजावदपत्यवत्.. (१) मैं मांगने वाले ब्राह्मणों को देता हूं, ऐसा कह कर उत्तर दे, फिर वे ब्राह्मण कहें कि यह कर्म यजमान को संतान आदि से संपन्न कराने वाला हो. (१) प्रजया स वि क्रीणीते पशुभिश्चोप दस्यति. य आर्षेयेभ्यो याचद्भयो देवानां गां न दित्सति.. (२) जो पुरुष ऋषियों सहित मांगने वाले ब्राह्मणों को देवताओं के निमित्त गोदान नहीं करता, वह अपनी संतान विक्रय करने वाला होता हुआ पशुओं से हीन हो जाता है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

कूट्यास्य सं शीर्यन्ते श्लोणया काटमर्दति. बण्डया दह्यन्ते गृहाः काणया दीयते स्वम्.. (३) वशा गौ के कूटा अर्थात् बिना सींगों वाले अंग के कारण दान न करने वाले के पदार्थ समाप्त हो जाते हैं. दान न करने वाला लकड़ी से गाय के सींगों के स्थान को पीड़ित करता है. बंडी अर्थात् बिना सींगों वाली गाय देने से उस के घर का नाश हो जाता है तथा कानी गाय देने से धन चला जाता है. (३) विलोहितो अधिष्ठानाच्छक्नो विन्दति गोपतिम्. तथा वशायाः संविद्धं दुरदभ्ना ह्युच्यसे.. (४) बिना ब्यायी हुई गौ दुर्दमना कहती है. गौ के स्वामी को वशा के अधिष्ठान अर्थात् रहने के स्थान से विलोहित शक्ति और संविद्य अर्थात् रक्त ज्वर प्राप्त होता है. (४) पदोरस्या अधिष्ठानाद् विक्लिन्दुर्नार्म विन्दति. अनामनात् सं शीर्यन्ते या मुखेनोपजिघ्रति.. (५) गौ के स्वामी को वशा अर्थात् बिना ब्यायी गाय के पांवों के स्थान से विक्किंदु नाम की विपत्ति मिलती है. उस के सूंघने से बिना जाने ही उस के पदार्थ नष्ट हो जाते हैं. (५) यो अस्याः कर्णावास्कुनोत्या स देवेषु वृश्चते. लक्ष्म कुर्व इति मन्यते कनीयः कृणुते स्वम्.. (६) वशा गौ के कानों को दुःख देने वाला देवताओं पर प्रहार करता है. जो अपनेआप को इस गाय के कंधों पर चिह्न न करने वाला मानता है, वह अपनेआप को छोटा बना लेता है. (६) यदस्याः कस्मै चिद् भोगाय बालान् कश्चित् प्रकृन्तति. ततः किशोरा म्रियन्ते वत्सांश्च घातुको वृकः.. (७) किसी भोग के निमित्त इस वशा गाय के बालों को काटने से काटने वाले का युवा पुत्र मृत्यु को प्राप्त होता है तथा उस के पुत्रों का संहार शृगाल अर्थात् सियार करते हैं. (७) यदस्या गोपतौ सत्या लोम ध्वाङ्क्षो अजीहिडत्. ततः कुमारा म्रियन्ते यक्ष्मो विन्दत्यनामनात्.. (८) गौ के स्वामी की उपस्थिति में यदि गाय के बालों को कौआ नौचता है तो उस के पुत्र मर जाते हैं तथा वह स्वयं क्षय रोग को प्राप्त होता है. (८) यदस्याः पल्पूलनं शकृद् दासी समस्यति. ebook converter DEMO Watermarks*

ततो ऽ परूपं जायते तस्माद्व्येष्यदेनसः.. (९) यदि गाय के गोबर आदि को दासी फेंकती है तो गाय का स्वामी उस पाप से नहीं छूट पाता तथा कुरूप हो जाता है. (९) जायमानाभि जायते देवान्त्सब्राह्मणान् वशा. तस्माद् ब्रह्मभ्यो देयैषा तदाहुः स्वस्य गोपनम्.. (१०) वशा अर्थात् तुरंत ब्यायी हुई गाय देवताओं और ब्राह्मणों के लिए ही प्रकट होती है. इसलिए ब्राह्मणों को उस का दान देना ही अपनी रक्षा करना है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं. (१०) य एनां वनिमायन्ति तेषां देवकृता वशा. ब्रह्मज्येयं तदब्रुवन् य एनां निप्रियायते.. (११) जो लोग गाय को परम प्रिय समझते हुए उस की सेवा करते हैं उन के लिए यह ब्रह्मज्या होती है, ऐसा विद्वानों का कथन है. (११) य आर्षेयेभ्यो याचद्भ्यो देवानां गां न दित्सति. आ स देवेषु वृश्चते ब्राह्मणानां च मन्यवे.. (१२) जो देवताओं की गाय को ऋषि पुत्रों वाले ब्राह्मणों को नहीं देना चाहता है, वह ब्रह्म कोप के कारण देवताओं के द्वारा नाश को प्राप्त होता है. (१२) यो अस्य स्याद् वशा ऽ भोगो अन्यामिच्छेत तर्हि सः. हिंस्ते अदत्ता पुरुषं याचितां च न दित्सति.. (१३) यदि वशा अर्थात् तुरंत ब्यायी हुई गाय उस के स्वामी के लिए उपभोग योग्य हो तो वह अन्य गाय की कामना करे. जो पुरुष याचक को वशा गाय का दान नहीं देता है तो यह दान न की हुई वशा गौ उसे नष्ट कर देती है. (१३) यथा शेवधिर्निहितो ब्राह्मणानां तथा वशा. तामेतदच्छायन्ति यस्मिन् कस्मिंश्च जायते.. (१४) वशा गाय ब्राह्मणों की धरोहर के समान होती है. यह गाय वास्तव में ब्राह्मणों की ही है. वह चाहे जिस के घर में प्रकट हो जाए, ये ब्राह्मण गोस्वामी के सामने आ कर इस गाय को मांगते हैं. (१४) स्वमेतदच्छायन्ति यद् वशां ब्राह्मणा अभि. यथैनानन्यस्मिन् जिनीयादेवास्या निरोधनम्.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

वशा गाय के सामने आने वाले ब्राह्मण अपने ही धन के समान उस के पास जाते हैं. इन्हें वर्जित करना अर्थात् इन्हें रोकना गाय के स्वामी को हानि पहुंचाता है. (१५) चरेदेवा त्रैहायणादविज्ञातगदा सती. वशां च विद्यान्नारद ब्राह्मणास्तर्ह्येष्याः.. (१६) हे नारद! यह धेनु अविजात गद अर्थात् रोग को न जानती हुई तीन वर्ष तक विचरण करे अथवा घास आदि खाए. यजमान इस के बाद इस धेनु को वशा मानता हुआ ब्राह्मणों की खोज करे. (१६) य एनामवशामाह देवानां निहितं निधिम्. उभौ तस्मै भवाशर्वौ परिक्रम्येषुमस्यतः.. (१७) यह वशा इन देवताओं की धरोहर के रूप में है. इस वशा को जो मनुष्य अवशा कहता है वह भव और शर्व के बाणों का लक्ष्य बनता है. (१७) यो अस्या ऊधो न वेदाथो अस्या स्तनानुत. उभयेनैवास्मै दुहे दातुं चेदशकद् वशाम्.. (१८) जो मनुष्य इस वशा के थनों और ऊधस अर्थात् ऐन को जानता हुआ इस का दान करता है, यह वशा उसे अपने थनों और उन दोनों के द्वारा फल देने वाली होती है. (१८) दुरदभ्नैनामा शये याचितां च न दित्सति. नास्मै कामाः समृध्यन्ते सामदत्त्वा चिकीर्षति.. (१९) जो मांगने पर उस वशा का दान नहीं करता है, उस को दुर्द्म्न अर्थात् वश में न आने वाली दशा जकड़ लेती है. जो उसे अपने पास ही रखना चाहता है, उस की इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं. (१९) देवा वशामयाचन् मुखं कृत्वा ब्राह्मणम्. तेषां सर्वेषामददद्धेडं न्येति मानुषः.. (२०) ब्राह्मण को अपना मुख बना कर देवता वशा को मांगते हैं. इसे न देने वाला मनुष्य उन के क्रोध का लक्ष्य बनता है. (२०) हेडं पशूनां न्येति ब्राह्मणेभ्यो ऽ ददद् वशाम्. देवानां निहितं भागं मर्त्यश्चेन्निप्रियायते.. (२१) जो पुरुष देवताओं की धरोहर रूप भाग को अपना अत्यंत प्रिय समझता है, वह ब्राह्मणों को वशा का दमन करने के कारण पशुओं का क्रोध प्राप्त करता है. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*

यदन्ये शतं याचेयुर्ब्राह्मणा गोपतिं वशाम्. अथैनां देवा अब्रुवन्नेवं ह विदुषो वशा.. (२२) गौ के स्वामी से चाहे अन्य सैकड़ों ब्राह्मण वशा की याचना करें, पर वशा विद्वान् की होती है, ऐसी देवों की उक्ति है. (२२) य एवं विदुषे ऽ दत्त्वाथान्येभ्यो ददद् वशाम्. दुर्गा तस्मा अधिष्ठाने पृथिवी सहदेवता... (२३) जो पुरुष विद्वान् को गौ न देता हुआ, अन्य ब्राह्मण को देता है, उस के लिए पृथिवी देवताओं सहित दुर्गम हो जाती है. (२३) देवा वशामयाचन् यस्मिन्नग्रे अजायत. तामेतां विद्यान्नारदः सह देवैरुदाजत... (२४) जिस के सामने वशा प्रकट होती है, देवता उस से वशा मांगते हैं. यह जान कर नारद भी देवताओं सहित वहां पहुंच गए. (२४) अनपत्यमल्पपशुं वशा कृणोति पूरुषम्. ब्राह्मणैश्च याचितामथैनां निप्रियायते... (२५) ब्राह्मणों के द्वारा मांगी गई वशा को जो पुरुष अत्यंत प्रिय मानता हुआ नहीं देता है, वही वशा उसे संतानहीन तथा अन्य पशुओं वाला बना देती है. (२५) अग्नीषोमाभ्यां कामाय मित्राय वरुणाय च. तेभ्यो याचन्ति ब्राह्मणास्तेष्वा वृश्चते ऽ ददत्... (२६) ब्राह्मण सोम के लिए, अग्नि के लिए, काम के लिए और मित्रावरुण के लिए वशा को मांगते हैं. वशा न देने पर ये वशा के स्वामी को काटते हैं. (२६) यावदस्या गोपतिर्नोपशृणुयादृचः स्वयम्. चरेदस्य तावद् गोषु नास्य श्रुत्वा गृहे वसेत्... (२७) गौ का स्वामी जब तक गौ के संबंध में कोई संकल्प न करे, तब तक वह उस की गायों में विचरे, फिर उस के घर में वास न करे. (२७) यो अस्या ऋच उपश्रुत्याथ गोष्वचीचरत्. आयुश्च तस्य भूतिं च देवा वृश्चन्ति हीडिताः... (२८) जो संकल्प रूप वाणी के पश्चात भी अपनी गायों में विचरण करता है, वह देवताओं का अपमान करता है और देवताओं द्वारा ही अपनी आयु और ऐश्वर्य को नष्ट करने वाला होता है. ebook converter DEMO Watermarks*

(२८) वशा चरन्ती बहुधा देवानां निहितो निधिः. आविष्कृणुष्व रूपाणि यदा स्थाम जिघांसति... (२९) देवताओं की निधि रूप वशा अनेक प्रकार से विचरण करती हुई जब स्थान को नष्ट करना चाहती है, तब विभिन्न रूपों को प्रकट करती है. (२९) आविरात्मानं कृणुते यदा स्थाम जिघांसति. अथो ह ब्रह्मभ्यो वशा याच्याय कृणुते मनः... (३०) जब वशा अपने स्थान का नाश करने की इच्छा करती है, तब वह ब्राह्मणों के द्वारा मांगे जाने की इच्छा करती हुई अनेक रूपों को प्रकट करती है. (३०) मनसा सं कल्पयति तद् देवाँ अपि गच्छति. ततो ह ब्रह्माणो वशामुपप्रयन्ति याचितुम्... (३१) वशा जब इच्छा करती है, तब उस की इच्छा देवताओं के पास जाती है. तब ब्राह्मण वशा को मांगने के लिए उस के पास आते हैं. (३१) स्वधाकारेण पितृभ्यो यज्ञेन देवताभ्यः. दानेन राजन्यो वशाया मातुर्हेडं न गच्छति... (३२) पितरों के लिए स्वधा करने से, देवताओं के विभिन्न यज्ञ करने से तथा वशा का दान करने से क्षत्रिय अपनी माता का क्रोध प्राप्त नहीं करता है. (३२) वशा माता राजन्यस्य तथा संभूतमग्रशः. तस्या आहुरनर्पणं यद् ब्रह्मभ्यः प्रदीयते.. (३३) वशा क्षत्रिय की माता है. वशाओं का समूह पहले प्रकट हुआ था. ब्राह्मणों को वशा का दान करने से पहले उस वशा को अनर्पण अर्थात् अर्पण न की हुई कहा जाता है. (३३) यथाज्यं प्रगृहीतमालुम्पेत् स्रुचो अग्नये. एवा ह ब्रह्मभ्यो वशामग्नय आ वृश्चते ऽ ददत्.. (३४) ग्रहण किया हुआ घृत जिस प्रकार स्रुवा से अग्नि के लिए पृथक् होता है, उसी प्रकार अग्नि का ध्यान करते हुए ब्राह्मण के लिए वशा का दान करना चाहिए. (३४) पुरोडाशवत्सा सुदुघा लोके ऽ स्मा उप तिष्ठति. सास्मै सर्वान् कामान् वशा प्रददुषे दुहे... (३५) ebook converter DEMO Watermarks*

सुंदरता और सुख से दुहाने वाली वशा इस लोक में यजमान के पास रहती है. यजमान जब वशा का दान करता है तो वह उसे सभी अभीष्ट प्रदान करती है. (३५) सर्वान् कामान् यमराज्ये वशा प्रददुषे दुहे. अथाहुरनारिकं लोकं निरुन्धानस्य याचिताम्... (३६) यह वशा यम के राज्य में दाता की सभी कामनाओं को पूरा करने वाली है. मांगी हुई वशा के न देने पर नरक प्राप्त होता है, ऐसा विद्वानों का कथन है. (३६) प्रवीयमाना चरति क्रुद्धा गोपतये वशा. वेहतं मा मन्यमानो मृत्योः पाशेषु बध्यताम्.. (३७) क्रोध में भरी हुई वशा गाय अपने स्वामी को खाती हुई सी घूमती है. वह कहती है कि मुझ गर्भघातिनी को अपनी जानने वाला मूर्ख मृत्यु के बंधनों में पड़े. (३७) यो वेहतं मन्यमानो ऽ मा च पचते वशाम्. अप्यस्य पुत्रान् पौत्रांश्च याचयते बृहस्पतिः. (३८) यह वशा अन्य गायों में ताप बढ़ाती हुई घूमती है. यदि इस का स्वामी इसे दान नहीं करता तो वह उस के लिए विष का दोहन करती है. (३८) महदेषाव तपति चरन्ती गोषु गौरपि. अथो ह गोपतये वशाददुषे विषं दुहे.. (३९) जो गर्भघातिनी वशा को अपनी मानता है या उस का पाचन करता है, बृहस्पति उस के पुत्र, पौत्र आदि को लेने की इच्छा करते हैं. (३९) प्रियं पशूनां भवति यद् ब्रह्मभ्यः प्रदीयते. अथो वशायास्तत् प्रियं यद् देवत्रा हविः स्यात्.. (४०) ब्राह्मणों को वशा का दान कर देने पर वशा का स्वामी पशुओं का प्रिय होता है. वशा देवताओं को हवि के रूप में प्रदान की जाती है. (४०) या वशा उदकल्पयन् देवा यज्ञादुदेत्य. तासां विलिप्त्यं भीमामुदाकुरुत नारदः.. (४१) यज्ञों से लौट कर देवताओं ने वशा का निर्माण किया, तब नारद ने अधिक घी वाली और विशालकाय वशा को स्वीकार किया. (४१) तां देवा अमीमांसन्त वशेया ३ मवशेति. तामब्रवीन्नारद एषा वशानां वशतमेति.. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*

उस समय देवताओं ने यह कहा कि यह वशा अवशा है अर्थात् इस पर किसी का अधिकार नहीं है. नारद ने उसे वशाओं में परम वशा अर्थात् सब से वही वशा बनाया. (४२) कति नु वशा नारद यास्त्वं वेत्थ मनुष्यजाः. तास्त्वा पृच्छामि विद्वांसं कस्या नाश्नीयादब्राह्मणः.. (४३) हे नारद! तुम ऐसी कितनी गायों को जानने वाले हो जो मनुष्यों में प्रकट होती हैं. तुम विद्वान् हो, इसी कारण मैं तुम से पूछता हूं. अब्राह्मण वशा के प्राशन अर्थात् खाने से बचे. (४३) विलिप्त्या बृहस्पते या च सूतवशा वशा. तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम्.. (४४) हे बृहस्पत! जो अब्राह्मण ऐश्वर्य चाहे वह विलिप्ती अर्थात् विशेष प्रयोजनों में लिप्त सूतवशा और वशा का भोजन न करे. (४४) नमस्ते अस्तु नारदानुष्ठु विदुषे वशा. कतमासां भीमतमा यामदत्त्वा पराभवेत्.. (४५) हे नारद! तुम्हें नमस्कार है. वशा विद्वान् की स्तुति के अनुकूल ही है. इन में भयंकर वशा कौन सी है, जिस का दान न करने पर पराजय प्राप्त होती है. (४५) विलिप्ती या बृहस्पते ऽ थो सूतवशा वशा. तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम्.. (४६) हे बृहस्पति! ऐश्वर्य की प्रार्थना करने वाला अब्राह्मण विलिप्ती और सूत वशा और वशा का भोजन न करे. (४६) त्रीणि वै वशाजातानि विलिप्ती सूतवशा वशा. ताः प्र यच्छेद ब्रह्मभ्यः सो ऽ नाव्रस्कः प्रजापतौ.. (४७) वशाओं के तीन भेद होते हैं—विलिप्ती, सूत वशा और वशा. इन्हें ब्राह्मणों को दान कर दे तो वह प्रजापति को क्रोध उत्पन्न करने वाला नहीं होता है. (४७) एतद् वो ब्राह्मणा हविरिति मन्वीत याचितः. वशां चेदेनं याचेयुर्या भीमाददुषो गृहे.. (४८) दान करने वाले के घर में यदि भीमा वशा है तो उस वशा की याचना करने पर यह कहे कि हे ब्राह्मणो! यह तुम्हारे लिए हवि है. (४८) देवा वशां पर्यवदन् न नो ऽ दादिति हीडिताः. ebook converter DEMO Watermarks*

एताभिर्ऋग्भिर्भेदं तस्माद् वै स पराभवत्.. (४९) क्रोधित देवताओं ने वशा से कहा कि इस यजमान ने हम को दान नहीं किया, यह दान न करने वाला इसी कारण पराजित होता है. (४९) उतैनां भेदो नाददाद् वशामिन्द्रेण याचित:. तस्मात् तं देवा आगसो ऽ वृश्चन्नहमुत्तरे.. (५०) इंद्र के प्रार्थना करने पर भी यदि वशा का दान न करे तो उस से इस पाप के कारण देवता अहंकार व्याप्त कर के उसे मिटा देते हैं. (५०) ये वशाया अदानाय वदन्ति परिरापिण:. इन्द्रस्य मन्यवे जाल्मा आ वृश्चन्ते आचित्या.. (५१) जो लोग वशा का दान न करने का परामर्श देते हैं, वे मूर्ख लोग इंद्र के कोप के कारण स्वयं नष्ट हो जाते हैं. (५१) ये गोपतिं पराणीयाथाहुर्र्मा ददा इति. रुद्रस्यास्तां ते हेतिं परि यन्त्यचित्त्य.. (५२) जो लोग वशा गौ के स्वामी से उस का दान न करने के लिए कहते हैं, वे मूर्ख इंद्र के आयुध वज्र के लक्ष्य बनते हैं. (५२) यदि हुतां यद्यहुताममा च पचते वशाम्. देवान्त्सब्राह्मणानृत्व्वा जिह्मो लोकान्निर्र्ऋच्छति.. (५३) हुत अर्थात् दान में दी गई या अहुत अर्थात् दान में न दी गई वशा का पालन करने वाला देवता और ब्राह्मणों का अपमान करने वाला होता है. वह इस लोक में बुरी गति प्राप्त करता है. (५३) सूक्त-५ देवता—ब्रह्मगवी श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्तर्ते श्रिता.. (१) तप के द्वारा विरचित तथा परब्रह्म में आश्रित इस धेनु को ब्राह्मण ने यम से प्राप्त किया है. (१) सत्येनावृता श्रिया प्रावृता यशसा परीवृता.. (२) यह धेनु सत्य, संपत्ति और यश से परिपूर्ण है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*