अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
श्वेत चरणों वाली गौ हमारे शत्रुओं की उस सेना को शोक प्रदान करने के लिए जाए और हमारे बाणों से पीड़ित उस सेना पर टूट पड़े. हे न्यर्बुदि! सामने दिखाई देने वाली यह सेना आज युद्ध के समय मोह को प्राप्त हो जाए. (२०) मूढा अमित्र न्यर्बुदे जह्योषां वरंवरम्. अनया जहि सेनया.. (२१) हे न्यर्बुदि! तुम हमारे शत्रुओं को अपनी माया के कर्तव्य और अकर्तव्य जानने के लिए मूर्ख बना दो. तुम इस सेना के श्रेष्ठों को नष्ट कर दो. तुम्हारी कृपा से हमारी सेना विजय प्राप्त करे. (२१) यश्च कवची यश्चाकवचो ३ मित्रो यश्चाज्मनि. ज्यापाशैः कवचपाशैरज्मनाभिहतः शयाम्.. (२२) हमारा जो शत्रु कवच धारण किए है अथवा जो कवच रहित है, हमारे जो शत्रु रथ में बैठे हैं, वे अपनेअपने पाशों से बंधे हुए सो जाएं. (२२) ये वर्मिणो ये ऽ वर्माणो अमित्रा ये च वर्मिणः. सर्वांस्ताँ अर्बु दे हतांछ्वानो ऽ दन्तु भूम्याम्.. (२३) हमारे जो शत्रु कवच धारण करने वाले, कवचहीन और कवच के अतिरिक्त अन्य शस्त्र से रक्षा करने वाले साधन से युक्त हैं, हे न्यर्बुदि! तुम्हारे द्वारा मारे गए उन शत्रुओं को कुत्ते आदि मांसभक्षी पशु खाएं. (२३) ये रथिनो ये अरथा असादा ये च सादिनः. सर्वानदन्तु तान् हतान् गृध्राः श्येनाः पतत्रिणः (२४) हमारे जो शत्रु रथ में बैठे हैं, जो रथहीन हैं, जो घोड़े पर सवार हैं और जो बिना घोड़े वाले हैं, उन सब को गिद्ध, बाज तथा अन्य मांसभक्षी पक्षी खाएं. (२४) सहस्रकुणपा शेतामामित्री सेना समरे वधानाम्. विविद्धा ककजाकृता.. (२५) हमारे शत्रुओं की सेना हमारी सेना को प्राप्त कर के आयुध साधनों की युद्ध में भिड़ंत होने पर मरी हुई एवं अनगिनती लाशों वाली हो. (२५) मर्माविधं रोरुवतं सुपर्णैरदन्तु दुश्चितं मृदितं शयानम्. य इमां प्रतीचीमाहुतिममित्रो नो युयुत्सति.. (२६) शोभन पतन वाले बाणों के द्वारा मर्मस्थलों में विद्ध एवं अत्यधिक रोते हुए दुःखों से पूर्ण, चूर्ण किए हुए और धरती पर पड़े हुए शत्रु सैनिकों को गीदड़ आदि मांसभक्षी पशु खाएं. ebook converter DEMO Watermarks*
हमारा जो शत्रु हमारी इस आहुति को पा कर इस की गति प्रतिनिवृत्त कर के हमारे साथ युद्ध करना चाहता है, इस प्रकार के शत्रु को भी मांसभक्षी पशु खाएं. (२६) यां देवा अनुतिष्ठन्ति यस्या नास्ति विराधनम्. तयेन्द्रो हन्तु वृत्रहा वज्रेण त्रिषन्धिना.. (२७) जिस दधि मिश्रित भात की आहुति को देवगण वज्र बनाने का साधन बनाते हैं, जिस आयुध की असमानता नहीं है. उस आहुति द्वारा उत्पन्न वज्र से वृत्र असुर का वध करने वाले इंद्र इस शत्रु सेना का वध करें. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१ देवता—भूमि
बारहवां कांड सूक्त-१ देवता—भूमि सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति. सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु.. (१) पृथ्वी को धारण करने वाले ब्रह्म, तप, यज्ञदीक्षा तथा विशाल रूप में फैले हुए जल हैं. इस पृथ्वी ने भूत काल के जीवों का पालन किया था और भविष्य काल के जीवों का भी पालन करेगी. इस प्रकार की पृथ्वी हमें निवास के हेतु विस्तृत स्थान प्रदान करे. (१) असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु. नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः.. (२) जिस भूमि पर ऊंचे, नीचे तथा समतल स्थान हैं तथा जो अनेक प्रकार की सामर्थ्य वाली जड़ीबूटियों को धारण करती है, वह भूमि हमें सभी प्रकार तथा पूर्ण रूप से प्राप्त हो और हमारी सभी कामनाओं को पूर्ण करे. (२) यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः. यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु.. (३) यह पृथ्वी सागरों, नदियों, झरनों और सरोवरों के जल से सुशोभित है. इस पृथ्वी पर कृषि की जाती है, जिस से अन्न उत्पन्न होता है. उस अन्न से संसार के प्राणवान मनुष्य, पशु आदि तृप्ति पाते हैं. इस प्रकार की पृथ्वी हमें उस प्रदेश में प्रतिष्ठित करे, जहां पर रसदार फल उत्पन्न होते हैं. (३) यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः. या बिभर्ति बहुधा प्राणदेजत् सा नो भूमिर्गोष्वप्यन्ने दधातु.. (४) जिस पृथ्वी पर चार दिशाएं हैं, जिस पर अन्न उत्पन्न होता है और जिस पर किसान खेती करते हैं तथा जो सांस लेने वाले एवं गतिशील प्राणियों को धारण करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए दुधारू गाएं और अन्न धारण करे. (४) यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्. गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु.. (५)
हमारे पूर्व पुरुषों अर्थात् पूर्वजों ने जिस पृथ्वी पर अनेक प्रशंसनीय कार्य किए, जिस पृथ्वी पर देवों ने अत्याचारी दैत्यों के साथ संग्राम किया तथा जो पृथ्वी गायों, घोड़ों तथा पक्षियों को आश्रय प्रदान करने वाली है, वह पृथ्वी हमें तेज और ऐश्वर्य प्रदान करे. (५) विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो् निवेशनी. वैश्वानरं बिभ्रती भूमिरग्निमिन्द्रऋषभा द्रविणे नो दधातु.. (६) जो पृथ्वी वनों को धारण करने वाली तथा संसार के प्राणियों का भरणपोषण करने वाली है, जो पृथ्वी अपने सीने अर्थात् खदानों में स्वर्ण को धारण करती है तथा वैश्वानर अग्नि को आश्रय प्रदान करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए धन प्रदान करे. (६) यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानीं देवा भूमिं पृथिवीमप्रमादम्. सा नो मधु प्रियं दुहामथो उक्षतु वर्चसा.. (७) देवगण जाग्रत रहते हुए अथवा सावधान रहते हुए जिस पृथ्वी की रक्षा करते हैं, वह पृथ्वी हमें मधु, धन एवं बल से युक्त करे. (७) यार्णवे ऽ धि सलिलमग्र आसीद् यां मायाभिरन्वचरन् मनीषिणः. यस्या हृदयं परमे व्योमन्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः. सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे.. (८) जो पृथ्वी पहले सागर के जल में डूबी हुई थी, मनीषीजनों ने अनेक प्रकार के कार्य करते हुए, जिस पृथ्वी पर विचरण किया था, जिस का हृदय विशाल आकाश में स्थित है, वह मरण रहित पृथ्वी हमें श्रेष्ठ राष्ट्र, बल और दीप्ति प्रदान करे. (८) यस्यामापः परिचराः समानीरहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति. सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहामथो उक्षतु वर्चसा.. (९) जिस पृथ्वी पर बहता हुआ जल रात में और दिन में समान रूप से गमन करता है, ऐसी अधिक जल वाली पृथ्वी हमें दूध के समान सार रूप फलों तथा तेज से युक्त करे. (९) यामश्विनावमिमातां विष्णुर्यस्यां विचक्रमे. इन्द्रो यां चक्र आत्मने ऽ नमित्रां शचीपतिः. सा नो भूमिर्वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः.. (१०) अश्विनीकुमारों ने जिस पृथ्वी का निर्माण किया, विष्णु ने जिस पर पराक्रम का प्रदर्शन किया तथा इंद्र ने जिस पृथ्वी को अपने अधीन कर के शत्रुओं से हीन कर दिया, वह पृथ्वी अपना सार रूप जल मुझे उसी प्रकार पिलाए, जिस प्रकार माता पुत्र को दूध पिलाती है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तो ऽ रण्यं ते पृथिवि स्योनमस्तु.
गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तो ऽ रण्यं ते पृथिवि स्योनमस्तु. बभ्रुं कृष्णां रोहिणीं विश्वरूपां ध्रुवां भूमिं पृथिवीमिन्द्रगुप्ताम्. अजीतो ऽ हतो अक्षतो ऽ ध्यष्ठां पृथिवीमहम्.. (११) हे पृथ्वी! तेरे बर्फ से ढके हुए पर्वत एवं घने वन हमें सुख प्रदान करें. मैं इंद्र देव के द्वारा सुरक्षित पृथ्वी पर इस प्रकार प्रतिष्ठित रहूं कि न मेरा विनाश हो तथा न मैं किसी से परिचित होऊं. (११) यत् ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जास्तन्वःसंबभूवुः. तासु नो धेह्यभि नः पवस्य माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः. पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु.. (१२) हे पृथ्वी! तेरी नाभि अर्थात् मध्य भाग से सभी के शरीरों को पुष्ट करने वाले जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, मुझे उन्हीं के मध्य स्थित करो. भूमि मेरी माता है और मेघ मेरे पिता हैं. ये दोनों यज्ञ कर्म को पूर्ण करते हैं. (१२) यस्यां वेदिं परिगृह्णन्ति भूम्यां यस्यां यज्ञं तन्वते विश्वकर्माणः. यस्यां मीयन्ते स्वरवः पृथिव्यामूर्ध्वाः शुक्रा आहुत्याः पुरस्तात्. सा नो भूमिर्वर्धयद् वर्धमाना.. (१३) यज्ञ में आहुति देने से पूर्व ही जिस पृथ्वी पर लकड़ी के स्तंभ गाढ़े जाते हैं, वह पृथ्वी स्वयं वृद्धि को प्राप्त कर के हमें समृद्धिशाली बनाए. (१३) यो नो द्वेषत् पृथिवि यः पृतन्याद् यो ऽ भिदासान्मनसा यो वधेन. तं नो भूमे रन्धय पूर्वकृत्वरि.. (१४) हे पृथ्वी! हम से द्वेष करता हुआ जो सेना ले कर हमें क्षीण करना अथवा मारना चाहे, तुम हमारी रक्षा के लिए उस का विनाश कर दो. (१४) त्वज्जातास्त्वयि चरन्ति मर्त्यास्त्वं बिभर्षि द्विपदस्त्वं चतुष्पदः. तवेमे पृथिवि पञ्च मानवा येभ्यो ज्योतिरमृतं मर्त्येभ्य उद्यन्सूर्यो रश्मिभिरातनोति.. (१५) हे पृथ्वी! जो प्राणी तुम्हारे ऊपर जन्म लेते हैं, वे तुम्हारे ही ऊपर भ्रमण करते है. तुम जिन चार पैरों वाले पशुओं तथा दो पैरों वाले मनुष्यों का पोषण करती हो, उन के लिए सूर्य अपनी किरणों के द्वारा जीवन पर्यंत अमृतमयी ज्योति फैलाता है. (१५) ता नः प्रजाः सं दुहतां समग्रा वाचो मधु पृथिवि धेहि मह्यम्.. (१६) हे पृथ्वी! सूर्य की किरणें हमारे हेतु प्रजा अर्थात् संतान और सेवक वर्ग के अतिरिक्त ebook converter DEMO Watermarks*
सभी प्रकार की वाणी प्रदान करें. हे पृथ्वी! तुम मुझे मधुर पदार्थ प्रदान करो. (१६) विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं धर्मणा धृताम्. शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा.. (१७) हम ऐसी पृथ्वी पर सदा विचरण करते रहें जो ओषधियों को उत्पन्न करने वाली, संसार की ऐश्वर्य रूप, धर्म के द्वारा आश्रित कल्याणमयी एवं सुख देने वाली है. (१७) महत् सधस्थं महती बभूविथ महान् वेग एजथुर्वेपथुष्टे. महांस्तेवेन्द्रो रक्षत्यप्रमादम्. सा नो भूमे प्र रोचय हिरण्यस्येव संदृशि मा नो द्विक्षत कश्चन.. (१८) हे पृथ्वी! तू महती निवास भूमि है. तेरा वेग और कंपन भी भाव पूर्ण है. वे इंद्र तेरे रक्षक हैं. तू हमें सब का प्रिय बनाए. जिस प्रकार स्वर्ग सब को प्रिय होता है, उसी प्रकार हमारा द्वेषी कोई न हो अर्थात् हम सब के प्रिय बनें. (१८) अग्निर्भूम्यामोषधीष्वग्निमापो बिभ्रत्यग्निरश्मसु. अग्निरन्तः पुरुषेषु गोष्वश्वेष्वग्नयः.. (१९) जल अग्नि को धारण करता है. पृथ्वी में अग्नि है. जल में, पुरुष में, मेरे अश्वादि पशुओं में भी अग्नि है. (१९) अग्निर्दिव आ तपत्यग्नेर्देवस्योर्व १ न्तरिक्षम्. अग्निं मर्तास इन्धते हव्यवाहं घृतप्रियम्.. (२०) अग्नि देव स्वर्ग में तपते हैं, अंतरिक्ष में भी हैं और मरण धर्म वाले मनुष्य हमारी अग्नि को प्रदीप्त करते हैं. (२०) अग्निवासाः पृथिव्य सितज्ञूस्त्विषीमन्तं संशितं मा कृणोतु.. (२१) जिस धूम में अग्नि का वास है, उस धूम को जानने वाली पृथ्वी मुझे तेजस्वी बनाए. (२१) भूम्यां देवेभ्यो ददति यज्ञं हव्यमरंकृतम्. भूम्यां मनुष्या जीवन्ति स्वधयान्नेन मर्त्याः. सा नो भूमिः प्राणमायुर्दधातु जरदष्टिं मा पृथिवी कृणोतु.. (२२) पृथ्वी पर जो यज्ञ सुशोभित हैं, उन में देवों के हेतु हवि प्रदान की जाती है. इसी पृथ्वी पर मरणधर्मा जीव अन्न जल से अपना जीवन व्यतीत करते हैं. यह पृथ्वी हम को प्राण और आयु प्रदान करती हुई वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाला बनाए. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*
यस्ते गन्धः पृथिवि संबभूव यं बिभ्रत्योषधयो यमापः. यं गन्धर्वा अप्सरसश्च भेजिरे तेन मा सुरभिं कृणु मा नो द्विक्षत कश्चन.. (२३) हे पृथ्वी! तेरी जिस गंध को ओषधियां और जल धारण करते हैं, जिस का सेवन गंधर्व और अप्सराएं करती हैं, तू मुझे उसी गंध से सुशोभित बना. कोई मेरा वैरी न रहे. (२३) यस्ते गन्धः पुष्करमाविवेश यं संजभुः सूर्याया विवाहे. अमर्त्याः पृथिवि गन्धमग्रे तेन मा सुरभिं कृणु मा नो द्विक्षत कश्चन.. (२४) हे पृथ्वी! तुम्हारी जो गंध कमल में है, जिस गंध को सूर्य के विवाहोत्सव में मरणधर्मा जीवों को धारण किया था, उस गंध से मुझे सुगंधित बना. मुझ से द्वेष करने वाले कोई न रहे. (२४) यस्ते गन्धः पुरुषेषु स्त्रीषु पुंसु भगो रुचिः. यो अश्वेषु वीरेषु यो मृगेषूत हस्तिषु. कन्यायां वर्चो यद् भूमे तेनास्माँ अपि सं सृज मा नो द्विक्षत कश्चन.. (२५) हे पृथ्वी! तुम्हारी जो गंध स्त्रीपुरुषों में, घोड़ों में, वीरों में, मृग में, हाथी में तथा कन्या में है, मुझे उन सब की गंध से संपन्न बना. मुझ से द्वेष करने वाला कोई न रहे. (२५) शिला भूमिरश्मा पांसुः मा भूमिः संधृता धृता. तस्यै हिरण्यवक्षसे पृथिव्या अकरं नमः.. (२६) जो पृथ्वी शिला, भूमि, पत्थर और धूल के रूपों को धारण करती है, ऐसी पृथ्वी हिरण्यवक्षा अर्थात् सोने के सीने वाली है. मैं उस पृथ्वी को नमस्कार करता हूं. (२६) यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा. पृथिवीं विश्वधायसं धृतामच्छावदामसि.. (२७) वनस्पतियां उत्पन्न करने वाले वृक्ष जिस भूमि पर अडिग रूप में खड़े रहते हैं, वे वृक्ष औषधालय के रूप में सब की सेवा करते हैं. ऐसी धर्म आश्रिता पृथ्वी की हम स्तुति करते हैं. (२७) उदीराणा उतासीनास्तिष्ठन्तः प्रक्रामन्तः. पद्भ्यां दक्षिणसव्याभ्यां मा व्यथिष्महि भूम्याम्.. (२८) हम अपने दाएं अथवा बाएं पैर से चलते हुए, बैठते अथवा खड़े होते हुए कभी व्यथित न हों. (२८) ebook converter DEMO Watermarks*
विमृग्वरीं पृथिवीमा वदामि क्षमां भूमिं ब्रह्मणा वावृधानाम्. ऊर्जं पुष्टं बिभ्रतीमन्नभागं घृतं त्वाभि नि षीदेम भूमे.. (२९) धर्मरूपिणी, परम पवित्रा तथा मंत्रों के द्वारा बढ़ने वाली पृथ्वी की मैं स्तुति करता हूं. हे पृथ्वी! तू पोषक अन्न और बल को धारण करने वाली है. मैं तुझ पर घृत की आहुति देता हूं. (२९) शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु यो नः सेदुरप्रिये तं नि दध्मः. पवित्रेण पृथिवि मोत् पुनामि.. (३०) पवित्र जल हमारी देह को सींचे. हमारे शरीर पर हो कर जाने वाले जल शत्रु को प्राप्त हों. हे पृथ्वी! मैं अपनी देह को पवित्र जल के द्वारा पवित्र करता हूं. (३०) यास्ते प्राचीः प्रदिशो या उदीचीर्यास्ते भूमे अधराद् याश्च पश्चात्. स्योनास्ता मह्यं चरते भवन्तु मा नि पप्तं भुवने शिश्रियाणः.. (३१) हे पृथ्वी! तुम्हारी पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्चिम रूप चारों दिशाएं मुझे विचरण की शक्ति प्रदान करें. इस लोक में रहता हुआ मैं गिरने न पाऊं. (३१) मा नः पश्चान्मा पुरस्तान्नुदिष्ठा मोत्तरादधरादुत. स्वस्ति भूमे नो भव मा विदन् परिपन्थिनो वरीयो यावया वधम्.. (३२) हे पृथ्वी! तू मेरे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों ओर खड़ी रहे. मुझे दस्यु प्राप्त न करे. तू विशाल हिंसा से मुझे बचाती हुई मंगल करने वाली हो. (३२) यावत् ते ऽ भि विपश्यामि भूमे सूर्येण मेदिना. तावन्मे चक्षुर्मा मेष्टोत्तरामुत्तरां समाम्.. (३३) मैं जब तक तुझे सूर्य के सामने देखता रहूं, तब तक मेरे देखने की शक्ति नष्ट न हो. (३३) यच्छयानः पर्यावर्ते दक्षिणं सव्यमभि भूमे पार्श्वम्. उत्तानास्त्वा प्रतीचीं यत् पृष्टीभिरधिशेमहे. मा हिंसीस्तत्र नो भूमे सर्वस्य प्रतिशीवरि.. (३४) हे पृथ्वी! सोता हुआ मैं करवट लूं अथवा सीधा हो कर सोऊं, उस समय कोई मेरी हिंसा न करे. (३४) यत् ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु. मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्.. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे पृथ्वि! मैं तेरे जिस स्थल को खोदूं वह शीघ्र ही पहले जैसा हो जाए. मैं तेरे मर्म को पूर्ण करने में समर्थ नहीं हूं. (३५) ग्रीष्मस्ते भूमे वर्षाणि शरद्धेमन्तः शिशिरो वसन्तः. ऋतवस्ते विहिता हायनीरहोरात्रे पृथिवि नो दुहाताम्.. (३६) हे पृथ्वि! ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत—ये छह ऋतुएं तथा दिन, रात और वर्ष—ये सब हम को फल देने वाले हों. (३६) याप सर्पं विजमाना विमृग्वरी यस्यामासन्नग्नयो ये अप्स्व१न्तरः. परा दस्यून् ददती देवपीयूनिन्द्रं वृणाना पृथिवी न वृत्रम्. शक्राय दध्रे वृषभाय वृष्णे.. (३७) जो पृथ्वी सूर्य के हिलने पर कांपती है, विद्युत के रूप में जल में रहने वाली अग्नि जिस पृथ्वी में भी निवास करती है, जिस ने वृत्रासुर को त्याग कर इंद्र का वरण किया था, जो देव हिंसकों के लिए फल देने वाली नहीं होती तथा जो पुष्ट और शक्तिशाली पुरुष के अधीन रहती है. (३७) यस्यां सदोहविर्धाने यूपो यस्यां निमीयते. ब्रह्माणो यस्यामर्चन्त्यृग्भिः साम्ना यजुर्विदः. युज्यन्ते यस्यामृत्विजः सोममिन्द्राय पातवे.. (३८) जिस पृथ्वी पर यज्ञ मंडप की रचना होती है, जिस पर यूप खड़े किए जाते हैं. जिस पृथ्वी पर ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा देव पूजन और इंद्र को सोमपान कराने का कार्य होता है. (३८) यस्यां पूर्वे भूतकृत ऋषयो गा उदानृचुः. सप्त सत्रेण वेधसो यज्ञेन तपसा सह.. (३९) जिस पृथ्वी पर प्राणियों की रचना करने वाले ऋषियों ने सप्त सूत्रों वाले ब्रह्मयोग और स्तुति रूपी वाणियों से देव पूजन किया था. (३९) सा नो भूमिरा दिशतु यद्धनं कामयामहे. भगोः अनुप्रयुङ्क्तामिन्द्र एतु पुरोगवः.. (४०) वह भूमि हमारा चाहा हुआ धन प्रदान करे. भग हम को प्रेरणा देने वाले हों तथा इंद्र हमारे आगे चलने वाले हों. (४०) यस्यां गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां मर्त्या व्यैलबाः. युध्यन्ते यस्यामाक्रन्दो यस्यां वदति दुन्दुभिः. ebook converter DEMO Watermarks*
सा नो भूमिः प्र णुदतां सपत्नानसपत्नं मा पृथिवी कृणोतु.. (४१) जिस पृथ्वी पर मनुष्य नाचते और गाते हैं, जिस पर रुदन होता है और दुंदुभि बजती है, वह पृथ्वी मुझे शत्रुहीन बनाए. (४१) यस्यामन्नं व्रीहियवौ यस्या इमाः पञ्च कृष्टयः. भूम्यै पर्जन्यपत्न्यै नमोऽस्तु वर्षमेदसे.. (४२) जिस पृथ्वी पर गेहूं और जौ जैसे अन्न पैदा होते हैं, जिस पर पांच प्रकार की खेतियां होती हैं, वर्षा द्वारा पुष्ट की जाने वाली पृथ्वी को नमस्कार है. (४२) यस्याः पुरो देवकृताः क्षेत्रे यस्या विकुर्वते. प्रजापतिः पृथिवीं विश्वगर्भामाशामाशां रण्यां नः कृणोतु.. (४३) देवताओं द्वारा बनाए गए हिंसक पशु जिस पृथ्वी पर अनेक प्रकार की क्रीड़ाएं करते हैं, जो पूरे संसार को अपने में धारण करती है, उस पृथ्वी की दिशाओं को प्रजापति हमारे लिए मंगलमय करें. (४३) निधिं बिभ्रती बहुधा गुहा वसु मणिं हिरण्यं पृथिवी ददातु मे. वसूनि नो वसुदा रासमाना देवी दधातु सुमनस्यमाना.. (४४) निधियों को धारण करने वाली पृथ्वी मुझे गुफा, स्वर्ण, मणि आदि धन प्रदान करे. धन प्रदान करने वाली पृथ्वी हम पर प्रसन्न होती हुई वरदायिनी बने. (४४) जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम. सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती.. (४५) अनेक धर्मों और अनेक भाषाओं वाले मनुष्यों को धारण करने वाली पृथ्वी अडिग धेनु के समान मेरे लिए धन की हजारों धाराओं को दुहाए. (४५) यस्ते सर्पो वृश्चिकस्तृष्टदंश्मा हेमन्तजब्धो भृमलो गुहा शये. क्रिमिर्जिन्र्वत् पृथिवि यद्यदेजति प्रावृषि तन्नः सर्पन्मोप सृपद् यच्छिवं तेन नो मृड.. (४६) हे पृथ्वी! तुम में जो सर्प निवास करते हैं, उन का दंश प्यास लगाने वाला है. तुम में जो बिच्छू हैं, वे हेमंत ऋतु में डंक नीचे किए हुए गुफा में शयन करते हैं. वर्षा ऋतु में प्रसन्नता पूर्वक विचरण करने वाले ये प्राणी अर्थात् सांप और बिच्छू मेरे समीप न आएं. (४६) ये ते पन्थानो बहवो जनायना रथस्य वर्त्मानसच्व यातवे. यैः संचरन्त्युभये भद्रपापास्तं पन्थानं जयेमानमित्रमतस्करं यच्छिवं तेन ebook converter DEMO Watermarks*
नो मृड.. (४७) हे पृथ्वी! मनुष्यों के चलने के और रथ आदि के चलने के जो मार्ग हैं, उन मार्गों पर धर्मात्मा और पापात्मा दोनों प्रकार के मनुष्य चलते हैं. जो मार्ग चोरों और शत्रुओं से हीन है, उसी कल्याणमय मार्ग के द्वारा तुम हमें सुखी बनाओ. (४७) मत्वं बिभ्रती गुरुभृद् भद्रपापस्य निधनं तितिक्षुः. वराहेण पृथिवी संविदाना सूकराय वि जिहीते मृगाय.. (४८) पुण्य एवं पाप कर्म करने वालों के शवों को तथा शत्रु को भी धारण करने वाली जिस पृथ्वी को वाराह खोज रहे थे, वह पृथ्वी उन वाराह को ही प्राप्त हुई थी. (४८) ये त आरण्याः पशवो मृगा वने हिताः सिंहा व्याघ्राः पुरुषादश्चरन्ति. उलं वृकं पृथिवि दुच्छुनामित ऋक्षीकां रक्षो अप बाधयास्मत्.. (४९) जो व्याघ्र आदि हिंसक पशु घूमते हैं, उन को और व्रक अर्थात् भेड़ियों, भालुओं और राक्षसों को हम से दूर कर के बाधा पहुंचाओ. (४९) ये गन्धर्वा अप्सरसो ये चारायः किमीदिनः. पिशाचान्त्सर्वा रक्षांसि तानस्मद् भूमे यावय.. (५०) हे पृथ्वी! गंधर्व, अप्सरा, राक्षस, मांसभक्षी, पिशाच आदि को हम से दूर करो. (५०) यां द्विपादः पक्षिणः संपतन्ति हंसाः सुपर्णाः शकुना वयांसि. यस्यां वातो मातरिश्वैयते रजांसि कृण्वंश्च्यावयंश्च वृक्षान्. वातस्य प्रवामुपवामनु वात्यर्चिः.. (५१) जिस पृथ्वी पर दो पांवों वाले पक्षी हंस, कौवे, गिद्ध आदि घूमते हैं, जिस पृथ्वी पर वायु धूल उड़ाती और वृक्षों को गिराती है तथा वायु के तीक्ष्ण होने पर अग्नि भी उस के साथ चलती है. (५१) यस्यां कृष्णमरुणं च संहिते अहोरात्रे विहिते भूम्यामधि. वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता सा नो दधातु भद्रया प्रिये धामनिधामनि.. (५२) जिस पृथ्वी पर काले और लाल दिनरात मिले रहते हैं, जो पृथ्वी वर्षा से ढकी रहती है, वह पृथ्वी सुंदर चित्त वृत्ति से हमें प्रिय स्थान प्राप्त कराए. (५२) द्यौश्च म इदं पृथिवी चान्तरिक्षं च मे व्यचः. अग्निः सूर्य आपो मेधां विश्वे देवाश्च सं ददुः.. (५३) ebook converter DEMO Watermarks*
आकाश, पृथ्वी, अंतरिक्ष, अग्नि, सूर्य, जल, मेघ तथा सब देवताओं ने मुझे चलने की शक्ति प्रदान की है. (५३) अहमस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम्. अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहि:.. (५४) मैं पृथ्वी पर शत्रु का तिरस्कार करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हूं. मैं अपने शत्रुओं के सामने जा कर उन्हें दबाऊं. मैं हर दिशा में रहने वाले शत्रु को भलीभांति वश में कर लूं. (५४) अदो यद् देवि प्रथमाना पुरस्ताद् देवैरुक्ता व्यसर्पो महित्वम्. आ त्वा सुभूतमविशत् तदानीमकल्पयथाः प्रदिशश्चतस्रः.. (५५) हे पृथ्वी! तुम्हारे विस्तृत होने से पहले देवताओं ने तुम से विस्तार वाली होने को कहा था. उस समय तुम में भूतों ने प्रवेश किया. तभी चार दिशाएं बनाई गईं. (५५) ये ग्रामा यदरण्यं याः सभा अधि भूम्याम्. ये संग्रामाः समितयस्तेषु चारु वदेम ते.. (५६) पृथ्वी पर जो गांव, जंगल और सभाएं हैं, जो युद्ध की मंत्रणाएं हैं तथा जो युद्ध होते हैं, हे भूमि! हम उन सब में तेरी वंदना करते हैं. (५६) अश्व इव रजो दुधुवे वि तान् जनान् य आक्षियन् पृथिवीं यादजायत. मन्द्राग्रेत्वरी भुवनस्य गोपा वनस्पतीनां गृभिरोषधीनाम्.. (५७) पृथ्वी में उत्पन्न हुए पदार्थ पृथ्वी पर ही रहते हैं तथा अश्व के समान उस पर धूल उड़ाते हैं. यह भूमि भद्रा और उर्वरा हैं. यह वनस्पतियों तथा ओषधियों के प्रभाव से लोक का पालन करने वाली है. (५७) यद् वदामि मधुमत् तद् वदामि यदीक्षे तद् वनन्ति मा. त्विषीमानस्मि जुतिमानवान्यान् हन्मि दोधतः.. (५८) मैं जो कुछ कहूं, वह मधुर हो, मैं जिसे देखूं, वही मेरा प्रिय हो जाए. मैं यशस्वी और वेग वाला बनूं. मैं दूसरों का रक्षक होता हुआ उन का संहार करूं जो मुझे कंपित करें. (५८) शन्तिवा सुरभिः स्योना कीलालोध्नी पयस्वती. भूमिरधि ब्रवीतु मे पृथिवी पयसा सह.. (५९) सुख और शांति प्रदान करने वाली, अन्न और दूध देने वाली, दूध के समान सार पदार्थों वाली होती हुई पृथ्वी मेरे पक्ष में रहे. (५९) यामन्वैच्छद्धविषा विश्वकर्मान्तर्णवे रजसि प्रविष्टाम्. ebook converter DEMO Watermarks*
भुजिष्यं १ पात्रं निहितं गुहा यदाविर्भोगे अभवन्मातृमद्भ्यः.. (६०) विश्वकर्मा ने हवि द्वारा पृथ्वी को राक्षसों के चक्कर से निकालने की इच्छा की थी. तब गुप्त रहने वाला भुजिष्य पात्र अर्थात् अन्न उपभोग के सामान दिखाई पड़ने लगा. (६०) त्वमस्यावपनी जनानामदितिः कामदुघा पप्रथाना. यत् त ऊनं तत् त आ पूरयाति प्रजापतिः प्रथमजा ऋतस्य.. (६१) हे पृथ्वी! तुम कामनाओं को पूर्ण करने वाली हो. तुम इस विश्व की क्षेत्र रूपी विस्तार वाली हो. तुम्हारे कम होने वाले भाग को प्रजापति पूरा करते हैं. (६१) उपस्थास्ते अनमीवा अयक्ष्मा अस्मभ्यं सन्तु पृथिवि प्रसूताः. दीर्घं न आयुः प्रतिबुध्यमाना वयं तुभ्यं बलिहृतः स्याम.. (६२) हे पृथ्वी! तुम में रहने वाले हमारे लोग यक्ष्मा रोग रहित रहें. हम अपनी दीर्घ आयु से युक्त हो कर तुम्हें हवि देने वाले बनें. (६२) भूमे मातर्नि धेहि मा भद्रया सुप्रतिष्ठितम्. संविदाना दिवा कवे श्रियां मा धेहि भूत्याम्.. (६३) हे पृथ्वी माता! मुझे मंगलमय प्रतिष्ठा प्रदान करो. हे विश! मुझे लक्ष्मी और विभूति में स्थित रखती हुई स्वर्ग प्रदान कराओ. (६३) सूक्त-२ देवता—अग्नि तथा मृत्यु नडमा रोह न ते अत्र लोक इदं सीसं भागधेयं त एहि. यो गोषु यक्ष्मः पुरुषेषु यक्ष्मस्तेन त्वं साकमधराङ् परेहि.. (१) हे क्रव्याद अग्नि! तू नड अर्थात् सरकंडे पर आरोहण कर. जो यक्ष्मा रोग मनुष्यों में अथवा जो यक्ष्मा गौ में है, तू उस के साथ यहां से दूर चली जा. तू अपने भाग्य की सीमा पर आ. (१) अघशंसदुःशंसाभ्यां करेणानुकरेण च. यक्ष्मं च सर्वं तेनेतो मृत्युं च निरजामसि.. (२) पाप और दुर्भावनाओं का नाश करने वाले कर तथा अनुकर से मैं यक्ष्मा रोग को पृथक् करता हूं. मैं मृत्यु को भी दूर भगाता हूं. (२) निरितो मृत्युं निर्ऋतिं निररातिमजामसि. यो नो द्वेष्टि तमद्ध्यग्ने अक्रव्याद् यमु द्विष्मस्तमु ते प्र सुवामसि.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे क्रव्याद अग्नि! हम पाप देवता निर्ऋति और मृत्यु को दूर करते हैं. हम अपने शत्रुओं को भी दूर करते हैं. जो हमारे शत्रु हैं, हम उन्हें तुम्हारी ओर भेजते हैं. तुम उन का भक्षण करो. (३) यद्यग्निः क्रव्याद् यदि वा व्याघ्र इमं गोष्ठं प्रविवेशान्योकाः. तं माषाज्यं कृत्वा प्र हिणोमि दूरं स गच्छत्वप्सुषदोऽप्यग्नीन्.. (४) यदि क्रव्याद अग्नि ने अथवा व्याघ्र ने हमारे गोष्ठ में प्रवेश किया है तो मैं उसे माष अर्थात् उरद आज्य द्वारा दूर करता हूं. (४) यत् त्वा क्रुद्धाः प्रचक्रुर्मन्युना पुरुषे मृते. सुकल्पमग्ने तत् त्वया पुनस्त्वोद्दीपयामसि.. (५) पुरुष की मृत्यु के कारण क्रोधित हुए प्राणियों ने तुम्हें प्रदीप्त किया. वह कार्य पूर्ण हो गया, इसीलिए हम ने तुम्हें तुम से ही प्रदीप्त किया है. (५) पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसवः पुनर्ब्रह्मा वसुनीतिरग्ने. पुनस्त्वा ब्रह्मणस्पतिराधाद् दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (६) हे अग्नि! वसु, ब्रह्मणस्पति, ब्रह्म, रुद्र, सूर्य और वसुनीति ने तुम्हें सौ वर्ष का जीवन प्राप्त करने के लिए पुनः प्रदीप्त किया था. (६) यो अग्निः क्रव्यात् प्रविवेश नो गृहमिमं पश्यन्नितरं जातवेदसम्. तं हरामि पितृयज्ञाय दूरं स घर्ममिन्धां परमे सधस्थे.. (७) अन्य अग्नियों को देखने के लिए यदि क्रव्याद अग्नि हमारे घर में प्रविष्ट हुआ है तो पितृयज्ञ करने के लिए मैं उसे दूर भगाता हूं. वह पाप नाश में स्थित हो धर्म को बढ़ाए. मैं क्रव्याद अग्नि को दूर भगाता हूं. वह पाप को साथ लेता हुआ यज्ञ के स्थान को प्राप्त हो. जातवेद अग्नि यहां प्रतिष्ठित हो कर देवों के लिए हवि वहन करे. (७) क्रव्यादमग्निं प्र हिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः. इहायमितरो जातवेदा देवो देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्.. (८) उक्थ के प्रशंसक क्रव्याद अग्नि को मैं पितृयान मार्ग से भेजता हूं. हे क्रव्याद! तू पितरों में ही प्रबुद्ध हो और वहीं जागता रह. देवयान मार्ग द्वारा तू यहां दुबारा मत आ. (८) क्रव्यादमग्निमिषितो हरामि जनान् दृहन्तं वज्रेण मृत्युम्. नि तं शास्मि गार्हपत्येन विद्वान् पितॄणां लोके अपि भागो अस्तु.. (९) मैं अपने मंत्र रूप वज्र से क्रव्याद अग्नि को दूर करता हूं. गार्हपत्य अग्नि के द्वारा मैं eBook converter DEMO Watermarks*
उस अग्नि का शासन करता हूं. यह पितरों का भाग होता हुआ, उन के लोक में स्थित हो. (९) क्रव्यादमग्निं शशमानमुक्थ्यं १ प्र हिणोमि पथिभिः पितृयाणैः. मा देवयानैः पुनरा गा अत्रैवैधि पितृषु जागृहि त्वम्.. (१०) उक्थ प्रशंसक क्रव्याद अग्नि को मैं पितृयान मार्ग में भेजता हूं. हे क्रव्याद! तू पितरों में ही बढ़ और वहीं जागता रह. देवयान मार्ग द्वारा तू यहां दुबारा मत आ. (१०) समिन्धते संकसुकं स्वस्तये शुद्धा भवन्तः शुचयः पावकाः. जहाति रिप्रमत्येन एति समिद्धो अग्निः सुपुना पुनाति.. (११) पवित्रता प्रदान करने वाले अग्नि देव शुद्ध होने के लिए शवभक्षक अग्नि को प्रदीप्त करते हैं. वह अग्नि अपने पाप का त्याग करता हुआ जाता है. उसे यह पवित्र अग्नि शुद्ध करते हैं. (११) देवो अग्निः संकसुको दिवस्पृष्ठान्यारुहत्. मुच्यमानो निरेणसो ऽ मोगस्माँ अशस्त्याः.. (१२) शव भक्षक अग्नि स्वयं पाप से मुक्त होते हैं और अमंगल से हमारी रक्षा करके स्वर्ग पर जाते हैं. (१२) अस्मिन् वयं संकसुके अग्नौ रिप्राणि मृज्महे. अभूम यज्ञियाः शुद्धाः प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (१३) इस शव भक्षक अग्नि में हम पापों को शुद्ध करते हैं. हम शुद्ध हो गए. अब यह अग्नि हम को पूर्ण आयु वाला बनाए. (१३) संकसुको विकसुको निर्ऋथो यश्च निस्वरः. ते ते यक्ष्मं सवेदसो दूराद् दूरमनीनशन्.. (१४) यक्ष्मा रोग को जानने वाले जो संघात्मक, विघातक और शब्दरहित अग्नि हैं, वे यक्ष्मा के साथ ही सुदूर चले गए और वहां जा कर नष्ट हो गए. (१४) यो नो अश्वेषु वीरेषु यो नो गोष्वजाविषु. क्रव्यादं निर्णुदामसि यो अग्निर्जर्नयोपनः.. (१५) जो क्रव्याद हमारे अश्वों, गायों, बकरियों तथा वीरपुत्र, पौत्रादि में प्रविष्ट हुआ है, उसे हम दूर भगाते हैं. (१५) अन्येभ्यस्त्वा पुरुषेभ्यो गोभ्यो अश्वेभ्यस्त्वा. ebook converter DEMO Watermarks*
निः क्रव्यादं नुदामसि यो अग्निर्जीवितयोपनः.. (१६) जो क्रव्याद जीवन का क्रम बिगाड़ने वाला है, उसे हम मंत्र बल से दूर भगाते हैं. हे क्रव्याद अग्नि! हम तुझे मनुष्यों, गायों और घोड़ों से दूर भगाते हैं. (१६) यस्मिन् देवा अमृजत यस्मिन् मनुष्या उत. तस्मिन् घृतस्तावौ मृष्ट्वा त्वमग्ने दिवं रुह.. (१७) हे अग्नि! जिस में देवता और मनुष्य शुद्ध होते हैं, उस में शुद्ध हो कर तू भी स्वर्ग को जा. (१७) समिद्धो अग्नं आहुत स नो माभ्यपक्रमीः. अत्रैव दीदिहि द्यवि ज्योक् च सूर्य दृशे.. (१८) हे गार्हपत्य अग्नि! तुम हमारा त्याग मत करो. तुम भलीभांति प्रदीप्त हो रही हो. तुम में आहुतियां दी जा रही हैं. तुम चिरकाल तक सूर्य के दर्शन कराने के लिए प्रदीप्त रहो. (१८) सीसे मृड्ढवं नडे मृड्ढवमग्नौ संकसुके च यत्. अथो अव्यां रामायां शीर्षक्तिमुपबर्हणे.. (१९) हे पुरुषो! तुम सिर के रोग को सीसे में, नड नाम की घास में और काली भेड़ में शुद्ध करो. (१९) सीसे मलं सादयित्वा शीर्षक्तिमुपबर्हणे. अव्यामसिकन्यां मृष्ट्वा शुद्धा भवत यज्ञियाः.. (२०) हे पुरुषो! सिर के रोग को तकिए में स्थापित करो. मल को सीसे में तथा काली भेड़ में शुद्ध कर के स्वयं शुद्ध बनो. (२०) परं मृत्यो अनु परेहि पन्थां यस्त एष इतरो देवयानात्. चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमीहेमे वीरा बहवो भवन्तु.. (२१) हे मृत्यु! तू देवयान से भिन्न मार्ग में जा. तू दर्शन और श्रोत्र शक्तियों से युक्त है. इसलिए तू सुन ले कि हमारे बहुत से वीर पुत्र बढ़ते रहेंगे. (२१) इमे जीवा वि मृतैराववृत्रन्नभूद् भद्रा देवहूतिर्नो अद्य. प्राञ्चो अगाम नृत्यये हसाय सुवीरासो विदथमा वदेम.. (२२) ये प्राणी मृत्यु को दूर करने वाली शक्ति से युक्त हो गए. हम सुंदर वीरों से संपन्न हो कर नृत्य, गान, हास्य में रत हैं. हम यज्ञ की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि देवताओं को आहुति देना कल्याणकारी है. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*
शतं जीवन्तः शरदः पुरूचीस्तिरो मृत्युं दधतां पर्वतेन.. (२३)
इमं जीवेभ्यः परिधिं दधामि मैषां नु गादपरो अर्थमेतम्. शतं जीवन्तः शरदः पुरूचीस्तिरो मृत्युं दधतां पर्वतेन.. (२३) हे मनुष्यो! तुम अपनी मृत्यु को पत्थर से दबाओ. मैं तुम्हें पत्थर रूपी कवच देता हूं. उसे कोई अन्य प्राप्त न करे. तुम सौ वर्षों तक जीवित रहो. (२३) आ रोहतायुर्जरसं वृणाना अनुपूर्वं यतमाना यति स्थ. तान् वस्त्वष्टा सुजनिमा सजोषाः सर्वमायुर्नयतु जीवनाय.. (२४) हे मनुष्यो! तुम वृद्धावस्था की दीर्घ आयु को प्राप्त करो. तुम सुंदर जन्म वाले और मान प्रीति वाले हो. त्वष्टा तुम्हें दीर्घ जीवन के हेतु पूर्ण आयु प्रदान करें. (२४) यथाहान्यनुपूर्वं भवन्ति यथर्तव ऋतुभिर्यन्ति साकम्. यथा न पूर्वमपरो जहात्येवा धातुरायूंषि कल्पयैषाम्.. (२५) जिस प्रकार ऋतुएं एक के पीछे दूसरी आती हैं, जैसे दिन एक के पीछे दूसरे आते हैं, जैसे बाद वाला पहले का त्याग नहीं करता, हे माता! उसी प्रकार प्रकार इन्हें आयुष्मान बनाओ. (२५) अश्मन्वती रीयते सं रभध्वं वीरयध्वं प्र तरता सखायः. अत्रा जहीत ये असन् दुरेवा अनमीवानुत्तरेमाभि वाजान्.. (२६) हे मनुष्यो! यह नदी पाषाणों से युक्त बह रही है. वीरतापूर्वक इस नदी के पार हो जाओ. अपने पापों को तुम इसी नदी में डाल दो. इस के बाद हम रोग निवारक वेगों को प्राप्त करें. (२६) उत्तिष्ठता प्र तरता सखायो ऽ श्मन्वती नदी स्यन्दत इयम्. अत्रा जहीत ये असन्नशिवाः शिवान्तस्योनानुत्तरेमाभि वाजान्.. (२७) हे मित्रो! हे मित्रो! उठो और तैरना आरंभ करो. पत्थरों वाली सरिता तेजी से बह रही है. जो अकल्याणकारी हैं. उन्हें हम यहीं पर त्याग दें. हम नदी को पार करके सुख देने वाले अन्नों की प्राप्ति करें. (२७) वैश्वदेवी वर्चस आ रभध्वं शुद्धा भवन्तः शुचयः पावकाः. अतिक्रामन्तो दुरिता पदानि शतं हिमाः सर्ववीरा मदेम.. (२८) हे पवित्र देवों वाली अग्नियो! तुम शुद्ध होने के समय सब देवताओं का स्तवन करो. ऋग्वेद के पदों से पापों को लांघते हुए हम सौ हेमन्तों तक पुत्रादि सहित आनंदित रहें. (२८) उदीचीनैः पथिभिर्वायुमद्भिरतिक्रामन्तो ऽ वरान् परेभिः. ebook converter DEMO Watermarks*
त्रिः सप्त कृत्व ऋषयः परेता मृत्युं प्रत्यौहन् पदयोपनेन.. (२९) परलोक गमन में वायु से पूर्ण उत्तरायण मार्ग में जाने वाले ऋषियों ने निकृष्ट मार्गों को लांघा था. उन्होंने मृत्यु को भी इक्कीस बार पार किया था. (२९) मृत्योः पदं योपयन्त एत द्राघीय आयुः प्रतरं दधानाः. आसीना मृत्युं नुदता सधस्थे ऽ थ जीवासो विदथमा वदेम.. (३०) मृत्यु के लक्ष्य को भ्रमित करने वाले ऋषि आयु से परिपूर्ण हैं. तुम भी इस मृत्यु को भगाओ. फिर हम जीवन में यज्ञ की स्तुति करें. (३०) इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषां सं स्पृशन्ताम्. अनश्रवो अनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे.. (३१) ये स्त्रियां सुंदर पतियों से युक्त रहें. ये विधवा न हों. ये अश्रुओं से रहित और घृत से युक्त हों. ये सुंदर अलंकारों को धारण करने वाली हों तथा संतानोत्पत्ति के हेतु मनुष्य योनि में ही रहें. (३१) व्याकरोमि हविषाहेमतौ तौ ब्रह्मणा व्य१हंकल्पयामि. स्वधां पितृभ्यो अजरां कृणोमि दीर्धेणायुषा समिमान्त्सृजामि.. (३२) मैं उन दोनों को मंत्र शक्ति के द्वारा सामर्थ्य वाला बनाता हूं. मैं पितरों की स्वधा को जीर्णता युक्त करता हुआ उन्हें दीर्घ आयु वाला बनाता हूं. (३२) यो नो अग्निः पितरो हृत्स्व १ न्तराविवेशामृतो मर्त्येषु. मय्यहं तं परि गृह्णामि देवं मा सो अस्मान् द्विक्षत मा वयं मत्.. (३३) हे पितरो! नष्ट न होने वाले फल को देने वाले अग्नि हमारे हृदय में विराजमान हैं. वे हम सब से द्वेष करने वाले न हों. हम भी उन के प्रति द्वेष न करें. (३३) अपावृत्य गार्हपत्यात् क्रव्यादा प्रेत दक्षिणा. प्रियं पितृभ्य आत्मने ब्रह्मभ्यः कृणुता प्रियम्.. (३४) हे प्राणियो! मंत्रों के द्वारा इस गार्हपत्य अग्नि से दूर हटो तथा क्रव्याद अग्नि से दक्षिण दिशा को जाओ. वहां तुम्हारे लिए और पितरों के लिए जो प्रिय हो, वही कार्य करो. (३४) द्विभागधनमादाय प्र क्षिणात्यवर्त्या. अग्निः पुत्रस्य ज्येष्ठस्य यः क्रव्यादनिराहितः.. (३५) जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को नहीं छोड़ता, वह अपने ज्येष्ठ पुत्र को तथा अपने धन को लेता हुआ क्षय का पात्र होता है. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*
यत् कृषते यद् वनुते यच्च वस्नेन विन्दते. सर्वं मर्त्यस्य तन्नास्ति क्रव्याच्चेदनिराहितः.. (३६) जो पुरुष क्रव्याद अग्नि का सेवन करना न छोड़े, उस की कृषि, सेवनीय वस्तु, बहुमूल्य वस्तु आदि जो उस के पास है, वे शून्य के समान रह जाती हैं. (३६) अयज्ञियो हतवर्चा भवति नैनेन हविरत्तवे. छिनत्ति कृष्या गोर्धनाद् यं क्रव्यानुवर्त्त.. (३७) जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को नहीं छोड़ता, वह यज्ञ करने का अधिकारी नहीं रहता. उस का तेज नष्ट हो जाता है तथा आहूत अर्थात् बुलाए गए देवता उस के पास नहीं आते. (३७) मुहुर्गृध्यैः प्र वदत्यार्तिं मर्त्यो नीत्य. क्रव्याद् यानग्निरन्तिकादनुविद्वान् वितावति.. (३८) क्रव्याद अग्नि जिस के पास रह कर ताप देता है, वह पुरुष अत्यंत व्यथा को प्राप्त होता है. आवश्यक वस्तुओं के समेत उसे बारबार दीन वचन कहने पड़ते हैं. (३८) ग्राह्या गृहाः सं सृज्यन्ते स्त्रिया यन्म्रियते पतिः. ब्रह्मैव विद्वानेष्यो ३ यः क्रव्यादं निरादधत्.. (३९) जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को पूर्ण रूप से ग्रहण करता है, उस के लिए घर कारागार के समान बन जाता है और स्त्री का पति मृत्यु को प्राप्त होता है. उसे विद्वान् मनुष्य का आदेश मानना चाहिए. (३९) यद् रिप्रं शमलं चकृम यच्च दुष्कृतम्. आपो मा तस्माच्छुम्भन्त्वग्नेः संकसुकाच्च यत्.. (४०) हम जो पाप कर चुके हैं, उस पाप से तथा शव भक्षक अग्नि के स्पर्श के दोष से मुझे जल बचाएं. (४०) ता अधरादुदीचीराववृत्रन् प्रजानतीः पथिभिर्देवयानैः. पर्वतस्य वृषभस्याधि पृष्ठे नवाश्चरन्ति सरितः पुराणीः.. (४१) जल देव मार्ग के द्वारा दक्षिण से उत्तर को जाते हैं तथा नवीन बन कर वर्षा के रूप पर्वत पर नदी का रूप धारण कर लेते हैं. (४१) अग्ने अक्रव्यान्निः क्रव्यादं नुदा देवयजनं वह.. (४२) हे गार्हपत्य अग्नि! तुम क्रव्याद अग्नि को हम से दूर करो तथा देव पूजन की सामग्री को वहन करो. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*
इमं क्रव्यादा विवेशायं क्रव्यादमन्वगात्. व्याघ्रौ कृत्वा नानानं तं हरामि शिवापरम्.. (४३) इस पुरुष ने क्रव्याद अग्नि का अपने घर में प्रवेश कर लिया है तथा यह उसी का अनुगामी हो गया है. मैं उन दोनों को बाधक के समान मानता हूं तथा इस क्रव्याद अग्नि को अलग करता हूं. (४३) अन्तर्धिर्देवानां परिधिर्मनुष्याणामग्निार्हपत्य उभयानन्तरा श्रितः.. (४४) देवताओं के भीतरी और मनुष्यों के परिधि रूप गार्हपत्य अग्नि देवताओं और मनुष्यों के मध्यस्थ हैं. (४४) जीवानामायुः प्र तिर त्वमग्ने पितॄणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृताः. सुगार्हपत्यो वितपन्नरातिमुषामुषां श्रेयसीं धेह्यस्मै.. (४५) हे अग्नि! तुम जीवितों की आयु की वृद्धि करो तथा मृतकों को देवलोक में भेजो. गार्हपत्य अग्नि शत्रुओं को जलाएं. हे गार्हपत्य अग्नि! तुम मंगलमयी उषा को हम में प्रतिष्ठित करो. (४५) सर्वानग्ने सहमानः सपत्नानैषामूर्जं रयिमस्मासु धेहि.. (४६) हे अग्नि! तुम सब शत्रुओं को वश में करते हुए उन के बल और धन को हम में प्रतिष्ठित करो. (४६) इममिन्द्रं वह्निं पप्रिमन्वारभध्वं स वो निर्वक्षद् दुरितादवद्यात्. तेनाप हत शरमापतन्तं तेन रुद्रस्य परि पातास्ताम्.. (४७) इन ऐश्वर्य वाली अग्नि का स्तवन करो. ये तुम्हें पाप से मुक्त करें. उन के द्वारा तुम रुद्र के बाण को दूर हटाते हुए अपनी रक्षा करो. (४७) अनडुवाहं प्लवमन्वारभध्वं स वो निर्वक्षद् दुरितादवद्यात्. आ रोहत सवितुर्नावमेतां षड्भिरुर्वीभिरमतिं तरेम.. (४८) हवि रूप माता की वाहक अग्नि का स्तवन करो. वे पाप से तुम्हारी रक्षा करें. अग्नि सविता की नौका पर चढ़ कर छह देवियों के द्वारा हमें बुद्धि से बचाएंगे. (४८) अहोरात्रे अन्वेषि बिभ्रत क्षेम्यस्तिष्ठन् प्रतरणः सुवीरः. अनातुरान्तसुमनसस्तल्प बिभ्रज्जयोगेव नः पुरुषगन्धिरेधि.. (४९) हे गार्हपत्य अग्नि! तुम दिन और रात के आश्रय रूप होते हुए हमें प्राप्त हो. तुम कल्याणप्रद होते हुए हमें पुत्र, पौत्रादि से युक्त करते हो. तुम्हारी आराधना सुगम है. तुम हमें ebook converter DEMO Watermarks*