भारतकोश
आयुर्वेद का कमाल (रोगों के निदान में)

आयुर्वेद का कमाल (रोगों के निदान में)

Ayurved Ka Kamaal (Rogon Ke Nidan Mein)

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

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साहिब बन्दगी

नाम अथवा भक्ति को

कबीर साहिब जी ने तीन भागों में बाँटा

सगुण भक्ति, निर्गुण भक्ति, परा भक्ति सगुण भक्ति करे संसारा। निर्गुण योगेश्वर अनुसार॥ तुम दोनों के पार बताया। मेरो चित्त एको नहीं आया॥ आपने इन दोनों के पार बताया। दादू दयाल जी ने कहा-

कोई सगुण में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय। अटपट चाल कबीर की, मौसे कही न जाय॥

जाप मेरे अजपा मेरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, उसको काल न खाय॥

अंदर धुनें हैं। कुछ इसे सुरति शब्द अभ्यास भी कह रहे हैं और उनमें खो जाते हैं। कुछ धुनों को ही परमात्मा कह रहे हैं। पर इससे तृतीयतीत की अवस्था से पार नहीं जा सकते हैं। सबका अपना वजूद है। धुनें खत्म हो जाती हैं। फिर यह कौन-सा शब्द हुआ! यानी धुनात्मक शब्द भी नहीं है, वर्णनात्मक शब्द भी नहीं है। साहिब कह रहे हैं- 'सो तो शब्द विदेह॥' आवाज रहित धुन (Sound less sound)

है वो, क्योंकि - 'दो बिन होय न अधर अवाजा॥' आवाज दो के बिना नहीं होती और जहाँ आवाज है, वहाँ माया है।

हद टप्पे सो औलिया, बे-हद टप्पे सो पीर। हद-बेहद दोनों टप्पे, तिसका नाम कबीर॥