आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंवार्माविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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ख्येयो भवति, विकल्पभेदापरिसंख्येयत्वात्' (च. वि. अ. १) और गुर्वादि गुणप्रधानता वादी कहते थे कि:—
‘धातवः पुनः शरीराः समान् गुणैः समान गुणभूषिष्टैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैर्गुडि प्राप्नुवन्ति, ह्यासंतु विपरीत गुणैर्विपरीतगुणभूषिष्टैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैः । तत्र इमे शरीरधातु गुणाः संख्या सामर्थ्य रूप कर्तारः । तद्यथा-गुरु लघु शीतोष्ण स्निग्ध रूक्ष मंद तीक्ष्ण स्थिर सर मृदु कठिन विषद पिच्छिल श्लक्ष्ण खर सूक्ष्म स्थूल सांद्र द्रवोः । तेषु ये
१ इसका अर्थ यह है कि गुर्वादिगुणसंबन्ध गुणप्रसादाख्य-धातु ही रसादि श्रुकांत धातुओं के घटक अथवा उत्पादक हैं (परिणामतत्त्वाहारगुणाः शरीरगुण भावमापद्येते) । क्योंकि इनके वैविध्य (संख्या) पर उनका वैविध्य, इनके सामर्थ्य पर उनका सामर्थ्य (कार्य) और इनकी आकृति पर उनकी आकृति अवलंबित है । सुश्रुतसंहिता में भी यह कहा गया है कि:—‘गुणा य उक्ता द्रव्येषु शरीरेष्वपि ते तथा । खानहृद्विक्षयास्तस्माद् द्रव्याणां द्रव्यहेतुकाः’ (सु. सू. अ. ४२)
२ सुश्रुत संहिता में गुर्वादिगुणों का विवेचन इस प्रकार है:— अतऊध्वे प्रवक्ष्यामि गुणानां कर्मे विस्तरम् । कर्माभिस्तनुमीयते नाना द्रव्याश्रया गुणाः ॥ ल्हादनःस्तंभनःशीतो मूच्छांतुट् स्वेद दाहाजित् । ऊष्णस्तीद्रिपरीतैः स्यात्वाचनश्च विशेषतः ॥ स्नेहमार्दवकृत् स्निग्धो बलवर्ण करस्तथा । सूक्ष्मस्तद्विपरीतस्याद्विशेषास्तंभनः खरः ॥