आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
वार्माविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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ख्येयो भवति, विकल्पभेदापरिसंख्येयत्वात्' (च. वि. अ. १) और गुर्वादि गुणप्रधानता वादी कहते थे कि:—
‘धातवः पुनः शरीराः समान् गुणैः समान गुणभूषिष्टैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैर्गुडि प्राप्नुवन्ति, ह्यासंतु विपरीत गुणैर्विपरीतगुणभूषिष्टैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैः । तत्र इमे शरीरधातु गुणाः संख्या सामर्थ्य रूप कर्तारः । तद्यथा-गुरु लघु शीतोष्ण स्निग्ध रूक्ष मंद तीक्ष्ण स्थिर सर मृदु कठिन विषद पिच्छिल श्लक्ष्ण खर सूक्ष्म स्थूल सांद्र द्रवोः । तेषु ये
१ इसका अर्थ यह है कि गुर्वादिगुणसंबन्ध गुणप्रसादाख्य-धातु ही रसादि श्रुकांत धातुओं के घटक अथवा उत्पादक हैं (परिणामतत्त्वाहारगुणाः शरीरगुण भावमापद्येते) । क्योंकि इनके वैविध्य (संख्या) पर उनका वैविध्य, इनके सामर्थ्य पर उनका सामर्थ्य (कार्य) और इनकी आकृति पर उनकी आकृति अवलंबित है । सुश्रुतसंहिता में भी यह कहा गया है कि:—‘गुणा य उक्ता द्रव्येषु शरीरेष्वपि ते तथा । खानहृद्विक्षयास्तस्माद् द्रव्याणां द्रव्यहेतुकाः’ (सु. सू. अ. ४२)
२ सुश्रुत संहिता में गुर्वादिगुणों का विवेचन इस प्रकार है:— अतऊध्वे प्रवक्ष्यामि गुणानां कर्मे विस्तरम् । कर्माभिस्तनुमीयते नाना द्रव्याश्रया गुणाः ॥ ल्हादनःस्तंभनःशीतो मूच्छांतुट् स्वेद दाहाजित् । ऊष्णस्तीद्रिपरीतैः स्यात्वाचनश्च विशेषतः ॥ स्नेहमार्दवकृत् स्निग्धो बलवर्ण करस्तथा । सूक्ष्मस्तद्विपरीतस्याद्विशेषास्तंभनः खरः ॥
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आयुर्वेद-दर्शन
गुरुवस्ते लघुभिराहारगुणैरभ्यस्यमानैराप्यायते; लघवश्च हसति । लघवस्तु लघुभिराप्यायते गुरवश्च हसति । एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिः ' विपर्ययाद् हासः । ' ( च. शा. अ. ६ )
पिच्छिलो जीवनोवस्यः संधानः श्लेष्मलोगुरुः । विषदो विषरीतोऽस्मात्क्रेदशोषण रोपणः ॥ दाहपाककरस्तीदिणः स्नावणो मृदुरन्यथा । सादोपलेपबलकृद् गुरुस्तर्पणवृंशः ॥ लघुस्तद्विपरीतः स्यात्लेखनो रोपणस्तथा । दशाद्याः कर्मतः प्रोक्तास्तेषां कर्म विक्षोषणैः ॥ दक्षैवान्यान्प्रवक्ष्यामि द्रवार्दी स्ताश्रिषोधमे । द्रवः प्रक्रेदनः सांद्रः स्थूलः स्यात् बंधकारकः ॥ श्रूक्ष्णः पिच्छिल वञ्चयः कर्कशो विषदोयथा । सुखातुवर्धो सूक्ष्मश्च सुगंधो रोचनो मृदुः ॥ दुर्गंधो विषरीतोऽसमत् हृष्टासारचिकारकः । सरौऽनुलोमनः प्रोक्तो मर्दोयात्राकरः स्मृतः ॥ व्यवायी चार्विले देहं व्याप्यपाकाय कल्पते । विकारी विकसने धातुवर्धान्वमोक्षेत् । आशुकारीतथाद्युत्वाद्भावस्यंभसि तैलवत् ॥ सूक्ष्मस्तु सौक्ष्म्यात् सूक्ष्मेषु श्लोतस्त्वचनुरसरः स्मृतः । गुणाविंशतिरित्येवं यथावत्परिकीर्तताः ॥
इसमें मंद स्थिर और कठिन के बजाय सुगंध, दुर्गंध और मृदु का उल्लेख है ।
वार्योविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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इन विधानों पर से यह भली भांति स्पष्ट हो जाता है कि षड्रसवादी, ओषधि व अन्न का आस्वादों में वर्गीकरण करके उनके द्वारा वातपित्तश्लेष्माओं के तथा शारीरधातुओं के वृद्धि और ह्रास का होना स्वीकार करते थे। फिर भी उनका यह कथन था कि उक्त धातु साम्य अथवा वैषम्य रस गत गुणों के कारण होता है। इस पर से यह भी ज्ञात होता है कि षड्रसवादी, यद्यपि ओषधि अथवा अन्न संज्ञक सचेतन द्रव्यों का गुर्वादि गुणों में वर्गीकरण नहीं करते थे तथापि गुरुत्वादि स्वभावों का षड्रसों में अस्तित्व स्वीकार करते ही थे। इस पर गुर्वादि गुण प्रधानता वादियों का यह कथन था कि जब कि षड्रसों में गुरुत्वादि स्वभावों का अस्तित्व और उनके द्वारा साम्य वैषम्य का होना स्वीकार करना ही पड़ता है तब ओषधि व अन्न का इन गुणों में वर्गीकरण करना और उनको साम्य वैषम्य कर मानना ही उचित है।
पंचात्मक लोक पक्षीय दोनों प्रकार का वर्गीकरण करते थे फिरभी उनका अंतिम विश्लेषण पंचधात्वात्मक ही था और इसी हेतु से वे षडास्वादों की उत्पत्ति आकाशादिकों के न्यूनतातिरेक से प्रतिपादन करते थे। इनमें जो द्रव्य प्रधानतावादी थे वे द्रव्य को प्रधान मानते थे। उनका कथन था कि मधुरादि जिह्वा वैषयिक भाव, ( अर्थ ) गुरुत्वादि स्वभाव
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आयुर्वेद-दर्शन
और परादि प्रयत्नांत ये सब द्रव्य के गुण हैं। मधुरादि आस्वादों में जिन गुरुत्वादि गुणों का उल्लेख है वे आस्वादों में नहीं रहते (क्योंकि यह सिद्धांत है कि गुणों में गुण नहीं रहते) बल्कि आस्वादधिकरण द्रव्यों में रहते हैं। और आस्वादों में उनका उल्लेख भी इसी अभिप्राय से किया गया है। अग्नीषोम लोकपक्षियों के प्रति उनका यह भी कथन है कि भिन्न २ तंत्रकारों के भिन्न २ अभिप्राय रहते हैं उन अभिप्रायों को समझ बुझकर ही उनके विधानों का अर्थ लगाना चाहिए। ( च. सू. अ. २६ )
अग्नीषोमवादियों को इस तरह फटकारनेवाले चाहे धातु पंचकवादी ही क्यों न हों पर इसमें पुनर्वसु आत्रेय का भी अंग दिखाई देता है। और इसपर से यह भी ज्ञात होता है कि अग्नीषोमवादी अथवा त्रिधातु सिद्धांतवादी वार्योंविद जो कि षड्हरसों को गुर्वीदि गुणमूलक कहते थे; द्रव्य का प्राधान्यत्व स्वीकार नहीं करते थे। इस विवाद का रहस्य हम को तब तक ज्ञात नहीं होगा जब तक हम वार्योंविद के त्रिधातु सिद्धांत का और पुनर्वसु आत्रेय के अंतिम निर्णय का अभ्यास न करें।
त्रिधातु सिद्धांत का आरंभ
त्रिधातु सिद्धांत के सृष्टि विज्ञान में और षड्हरसवादियों के सृष्टिविज्ञान ( सूर्य, वायु, चंद्र इनसे क्रमशः ऋतु, रस, दोष देह व वल्ल की उत्पत्ति होती है ) में बाह्यतः
चार्योविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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सादृश्य है। चूंकि जबकि त्रिधातुसिद्धांत अग्नीषोमवाद का 'उत्तर रूप' है तब त्रिधातुसिद्धांत के विवेचन का आरंभ अग्नीषोमवाद के विवेचन से भी किया जा सकता है। किंतु आयुर्वेद क्षेत्र में इस सिद्धांत की प्रतिष्ठा श्लेष्मपित्तवात विषयक ज्ञान के भित्तिपर हुई है अतः हम भी त्रिधातुसिद्धांत के विवेचन का आरंभ श्लेष्मपित्तवात विषयक ज्ञानविहास से करते हैं।
वातपित्त श्लेष्माओं का इतिहास
श्लेष्म, पित्त, वात, इनके विषय में सामान्यतः दो तरह से विचार किया जाता था; एक उन के शरीरगत उत्पत्ति स्वरूप कार्य आदि के विषय में और दूसरा उन के लोकगत अधिष्ठान स्वरूप कार्य आदि के विषय में।
प्रस्तुत में हम को इतना ही देखना है कि यज्जः पुरुषीय परिषद् के समय तक श्लेष्म पित्त वात विषयक ज्ञान में कितनी प्रगति हुई थी और वह किस क्रम से हुई थी। यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि इस समय हमारे सामने श्लेष्म पित्तवात विषयक जो कुछ भी साहित्य है वह एक तो नष्टावशेष मात्र एवं अपर्याप्त है, दूसरे उसमें भिन्न २ संप्रदायों के परस्पर विरोधी वक्तव्य भी शामिल हैं और तिसरे उनको संस्कार कर्ताओं ने इस तरह संकलित किया है कि उनमें जिधर उधर एकवाक्यता ही प्रतीत हो।
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आयुर्वेद-दर्शन
यह निश्चय से नहीं कहा जा सकता कि मनुष्य को श्लेष्मपित्तवात संज्ञक द्रव्यों का ज्ञान कब हुआ और कबसे उनके लिये श्लेष्म पित्त वात संज्ञाएँ प्रचलित हुईं। पर यह निश्चित है कि इनकी उत्पत्ति को जानने का यत्न सर्वे प्रथम षड्हरस वादियों ने किया। षड्हरस वादियों की दृष्टि से देहगत श्लेष्म पित्त वातों की उत्पत्ति अन्न के क्रमशः होनेवाले मधुर, अम्ल और कटु विषाकों से होती है। जैसा कि—
अन्नस्य शुक्तमात्रस्य षड्हरसस्य प्रपाकतः।
मधुरात्प्राक्फोद्ध्रावः फेनभूत उदीर्यते ॥
परंतु पच्यमानस्य विदग्धस्याम्लभावतः।
आशयाल्ल्यवमानस्यपित्तमच्छमुदीर्यते ॥
पकाशयंतु प्राप्तस्य शोण्यमाणस्य वनिह्ना।
परिपिंडित पक्वस्य वायुः स्यात् कटुभावतः।
( च. चि. अ. १९ )
किंतु आगे यह भी ज्ञात हुआ कि आमाशय (महा-स्रोत के चंडुक तक के भाग) में स्तुत होनेवाला उदकरूप श्लेष्मा, मधुरप्रपाक का धातुरस से संबंध होकर पैदा होता है अर्थात् वह धातुरस का ‘मल’ है। और पित्त भी रक्त का मल है। क्योंकि अम्लप्रपाक का रक्त के साथ संबंध होकर वह पैदा होता है। कटुप्रपाक (अन्नको जहां पिंडित अवस्था आती है वहां) से पैदा होनेवाले वायुको भी किट्ट का ‘मल’ कहा गया।
बायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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इनके स्वभावों ( गुणों ) का भी ज्ञान प्राप्त किया गया । यथा—
गुरुशीतमृदुस्निग्धमधुरस्थिर पिच्छिलाः । श्लेष्मणः प्रशमं यांति विपरीतगुणैर्गुणाः ॥ सस्नेहमुष्णंतीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु । विपरीत गुणैः पिचं द्रव्यैराशु प्रशाम्यति ॥ रूक्षः शीतो लघुःस्रह्मश्चलोऽथ विषदः स्वरः । विपरीत गुणद्रव्यैर्मारुतः संप्रशाम्यति ॥ (च.सू.अ.१)
यह ऊपर बतलाया गया है कि ये श्लेष्मपित्तवात जिन गुणों से युक्त हैं उनका वृद्धि-क्षय रसों अथवा रसगत गुणों के द्वारा किस प्रकार होता है ।
उस समय शारीर-धातुओं का वर्गीकरण किस प्रकार किया जाता था, उसमें श्लेष्मपित्तवातों का स्थान क्या था और उनके द्वारा शारीर-धातु में किस रीति से साम्यवैषम्य का होना माना जाता था इन सब बातों का भी विचार होना चाहिये । निम्नलिखित ' पहिले ' वर्गीकरण में इसका निदर्शन किया गया है । यथा—
पहिला वर्गीकरण.
विविधमश्रित पीत लीढ खादितं जंतोर्हितमभिसंभु- क्षित बलेन यथा स्वेनोष्मणा सन्मयविषच्यमानं, कालवदन-
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आयुर्वेद-दर्शन
वस्थित सर्वं धातुपाकम्, अनुपहत सर्वं धातुप्रमाश्रुतस्रोतः केवलं शरीरसुपचयबलवर्णं सुखाद्युपायोजयति, शरीरधातून्जयति ।
धातवो हि धात्वाहाराः प्रकृतिमनुकुर्यते । तत्र आहारप्रसादाख्यो रसः किट्ठं च मलाख्यमभिनिवर्तते । किट्टात् स्वेद-मूत्रपुरीष, वातपित्तश्लेष्माणः, कर्णाक्षिनासिकास्य लोमकूप प्रजननमलाः, केशशमश्रुलोमनखाद्यश्चावयवाः पुज्यंति । पुज्यंति हि आहाररसात् रसरुधिरमांस मेदोऽस्थिमज्जशुक्रौजांसि । पंचेन्द्रियद्रव्याणि ‘धातुप्रसादं’ संज्ञकानि, शरीरसंविधंधपिच्छाद्यश्चावयवाः । ते सर्व एव धातवो मलाख्याः प्रसादाख्याश्च रसमलाभ्यां पुज्यंतः स्वमानमनुवर्तते यथा वयः शरीरम् ।
एवं रसमलौ स्वप्रमाणवस्थितौ आश्रयस्य समधातवो धातुसाम्यमनुवर्तयतः । निमित्ततस्तु क्षीणवृद्धानां प्रसादाख्यानां धातुनां वृद्धिक्षयार्थान् आहारमूलाभ्यां रसः साम्यमुत्पादयत्यायोग्याय । किट्ठं च मलानाम् । एवमेव स्वमानातिरिक्ताश्रोतसर्निणः शीतोष्णपर्ययगुणैश्वोपचर्यमाणा मलाः शरीरधातुसाम्यकराः समुपलभ्यते । तेषां तु मलप्रसादाख्यानां धातूनां स्रोतांस्ययन मुखानि । यथा स्वं तानि यथा विभागेन यथा स्वम् धातून् आपूरयति । ( च, सू. अ. २८ )
इध वर्गीकरणं मे उर्द्धी वातपित्तश्लेष्माश्वो का उल्लेख है जो विपाकजन्य और ‘मल’ हैं । और इसी हेतु से
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उनको मल वर्ग में रखना है। वातपित्तश्लेष्माविषयक उक्त कल्पना यद्यपि संकुचित है फिर भी एक समय एवंगुण-विशिष्ट-वातपित्तश्लेष्माओं को हेतुसंक्षेप में प्रधान माना जाता था। उपलब्ध ग्रंथों में कई अंश ऐसे हैं जिनमें इन मल संज्ञक वातपित्तश्लेष्माओं का ही विवेचन है।
किंतु तदुत्तरकाल में श्लेष्मापित्त्वाताविषयक ज्ञान अधिक व्यापक हुआ। उक्त वर्गीकरण के कर्ता, श्लेष्मापित्त्वात् शब्दों से मलों को ही संबोधित करते थे अतः वे ओज, ऊष्मा व धातु-प्रसाद को 'प्रसाद' वर्ग में रखते थे। किंतु तदुत्तरकालीन संप्रदायों को यह अभीष्ट नहीं था। वे श्लेष्मापित्त्वातों में ओज, ऊष्मा व धातुप्रसाद का समावेश कर के उनकी सिर्फ 'प्रकृपित' अवस्था को ही मलवर्ग में रखना चाहते थे। किंतु उनके इस समन्वय को जानने के पूर्व यह जानना अत्यावश्यक है कि उस समय ओज, ऊष्मा व धातुप्रसाद के विषय में किस प्रकार का ज्ञान था। अतः अब उस पर विचार करें।
ओज, तेज, व धातुप्रसाद.
आयुर्वेद में ओज के सामान्यतः तीन प्रकार उपलब्ध होते हैं, (१) शुक्रमल, (२) पर, और (३) अपर।
(१) शुक्रमल संज्ञक ओजः—यह शुक्र का अंश विशेष है। बागभट इसको शुक्र का मल कहते हैं। (बा. शा.
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आधुनिक दर्शन
अ. ३ श्लो. ६४ ) इसको बुद्धि-बल-वर्धक माना जाता है । इसकी रक्षा के लिये त्रव्याचर्य का विधान है । वर्तमान वैज्ञानिक भी इसका शुक्र संबंधी अवयवों से सूत [ अंतः सूत ] होना, इसके द्वारा बुद्धिद्रिय [ Nervous system नाडी संस्था ] का पोषण होना और इससे उपरिहृष लक्षणों [ मूछे, गंभीर स्वर इ० ] का पैदा होना स्वीकार करते हैं ।
२ पर ओजः—इस के विषय में यह कहा गया है किः-
यत् सारमादौ गर्भस्य यत्तद्रभैरसाद्रसः ।
संवर्तमानं हृदयं समाविशति यत्पुराः ॥ (च.सू.अ.३०)
पर ओज, गर्भ का 'आद्य सार' है । (अर्थात् शुक्रार्तव अथवा बीज Spermatozoon फल Ovum संज्ञक अणु अवयवों Cells का और उनके संयोग से बननेवाले 'गर्भांकुर' Fertilized Ovum का मूलघटक है । 'इसको जीवनायतनौजस्' Nucleo protein कहते हैं । यह शरीर गत समस्त 'अणु-अवयवों' में रहता है । ) यह गर्भरस का अर्थात् 'कलल' का भी सारभूत द्रव्य है । यह सर्व प्रथम हृदय में प्रविष्ट होता है और इस कारण ही हृदय, अन्य इंद्रियों के पहिले अपने कार्य में सम्यक् प्रवृत्त होता है ।
यस्यनाशाचतु नाशोस्ति 'धारि' यत् हृदयाश्रितम् ।
( च. सू. अ.३० )
वायोर्विद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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इसका जो हृदयस्थ अंश है वह सत्व, शरीर व आत्मा के संयोग को धारण करता है। अतः इसके नाश से जीवित ही नष्ट होजाता है।
प्रथमे जायते ह्योजः शरीरेऽस्मिन् शरीरिणाम् ।
सर्विर्वेणं मधुरसं लाजगंधि प्रजायते ॥ (च. सू. अ. १७)
प्राणियों के प्रथम शरीर में अर्थात् 'गर्भाकुर' में यह ची के सहस्र, मीठा, और धान के लावा के सहस्र गंधवाला रहता है। किंतु
हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तभीषत्सपीतकम् ।
आजः शरीरं संख्यातं तन्नाशान्ना विनश्यति ॥
(च. सू. अ. १७)
जो पर आज हृदय में रहता है और जिसके नाश से जीवित नष्ट होता है वह सुरखी मायल पीला रहता है।
(३) अपर ओजः— इसके विषय में यह कहा गया है किः—
आजोचहा शरीरेऽस्मिन् विधम्यंते समंततः ।
येनौजसा वर्तयति ग्रीणिताः सर्वजंतवः ॥
यत् शरीरं रस स्नेहः प्राणायत्र प्रतिष्ठिताः ।
यं दत्ते सर्व भूतानां जीवितं नावतिष्ठते ॥
(च. सू. अ. ३०)
१ इन अंशों को हमने जानबूझ कर आगे पीछे किया है।
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आयुर्वेद-दर्शन
जिस अपर ओज के कारण शरीरावयव तृप्त होकर प्राणी जीवित रहते हैं; जो धातुरस का सारभूत पदार्थ ( पोषक द्रव्य, Protein ) है; ( प्रायः इसी हेतु धातु-रस को भी ' रसश्वैजः संख्यातः ' इस तरह ओज कहने की प्रथासी पड गई ) जिसमें प्राणों ( सत्व, शरीर, आत्मा अथवा सत्व रज तम वायु अग्नि सोम और आत्मा ) का वास्तव्य रहता है और जिसके बिना प्राणियों का जीवित रह नहीं सकता उसको ओजोवहा ( धमनियाँ ) शरीर में चारों ओर पहुंचाती हैं।
यह अन्न से प्राप्त होता है और इसी की विशुद्ध अवस्था को पर ओज कहते हैं।
ओज के उक्त विवेचन में उसके सामान्यतः तीन कार्यों का उल्लेख है; शरीर को तृप्त करना, प्राणों के संयोग को धारण करना अर्थात ही ' संबद्ध ' करना और उस संयोग को बनाये रखना अर्थात जीवन को कायम रखना। तदनुसार क्षीणौजस् पुरुष के लक्षणों के विषय में यह कहा गया है कि:-
बिभेति दुर्बलोऽभीक्षणं ध्यायति न्यथितेन्द्रियः ।
दुच्छायो दुर्भना रुक्षः क्षामश्चैवोजसः क्षये ॥
( च. सू. अ. १७ )
इस पर से यह ज्ञात होगा कि ओज का मुख्य कार्य 'संबंध-विधान' है चाहे फिर वह अवयवों का हो अथवा प्राणों का।
वाचोविद् का रसवाद और त्रिधातुसिद्धांत
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अवयवों के सुसंबद्ध रहने से शरीर में बल रहता है और जब यह संबंध शिथिल होता है तब शरीर दुर्बल होता है। और यह दोनों बातें ओज के अस्तित्व और अभाव पर अवलंबित हैं। इसी हेतु से यह कहा गया है कि:—
देहस्यावयवस्तेन व्याप्तो भवति देहिनाम् ।
तदभावाच्च शीर्यते शरीराणि शरीरिणाम् ॥ (सु. सं.)
ओज के कारण देह के समस्त अवयव आपस में सुसंबद्ध हैं किंतु जब वह क्षीण होता है तब शरीरावयव असंबद्ध फलतः शिथिल रहते हैं। ओज की विलंसन, व्यापद् और क्षय संज्ञक अवस्थाओं में भी संधिविश्लेषण को प्रधान लक्षण माना जाता है।
ओजगत इस धर्म को आयुर्वेद में 'बल' कहते हैं। बल-संज्ञक इस धर्म को आरंभ में ओज से अभिन्न माना जाता था। अतः कुछ संप्रदाय ओज को ही 'तत्त्वल्लोजस्त-देव बलमुच्यते' (सु. सं.) इस तरह बल शब्द से संबोधित करते थे। किंतु जो संप्रदाय बल के तत्त्वतः पृथक् अस्तित्व का अनुभव करने लगे थे वे इस का अलग ही विवेचन करते थे। उनका कहना था कि 'बलेन स्थिरोपचित मांसता सर्वे चेषास्वप्रतीघातः स्वरवर्णप्रसादो बाह्यानामाभ्यंतर्णा च करणानामात्मकार्ये प्रतिपत्तिर्भवति'। इसी तरह वे बल के
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आयुर्वेद-दर्शन
व्यापद् विस्मसन और क्षय लक्षणों का भी पृथक् ही विवेचन करते थे । चरक-संहितांतर्गत बल-लक्षण भी यहां ध्यान में रखना चाहिये । जैसा कि:—
त्रिविधं बलमिति । सहजं, कालजं, युक्तिक्तं च । सहजं यत् शरीर सत्वयोः प्राकृतम् । कालकृतं, ऋतुविभागजं वयः कृतं च । युक्तिक्तं, पुनस्तद्यदाहारचेष्टा योगजम् ।
[ च. सू. अ. ११ ]
ऊष्मा को भी पहिले वर्गीकरण के समय मल-संज्ञक पित्त से पृथक् माना जाता था । क्योंकि पहिले वर्गीकरण में 'ऊष्मा' को अन्न के विविध अंशों तथा शारीरधातुओं में रहनेवाला और अंतराग्नि से संशुद्धित होकर अपने २ अंशों तथा धातुओं का पाचन करनेवाला 'पदार्थ विशेष' सिद्ध किया गया है । इस तरह उस समय इस पदार्थ को अग्नि-संशुद्धित व पाचन-कर्ता स्वीकार करते हुए भी अग्नि और मलसंज्ञक पित्त दोनों से अलग ही रक्खा जाता था ।
कुछ संप्रदाय 'ऊष्मा' शब्द का 'ताप' के अर्थ में प्रयोग करते थे जैसा कि 'मात्रामात्रात्त्वमूष्मणः' (च. सू. अ. १२) इसमें किया गया है । अतः इस पदार्थ को 'तेज' शब्द से भी संबोधित किया जाने लगा । जैसा कि 'ओजस्तेजोऽप्ययः प्राणा श्रोत्रा देहाग्नि हेतुकाः' (च.चि.अ. १९) इसमें कहा गया है । सुश्रुत-संहिता
ब्रायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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में इस को 'तेज' शब्द से ही संबोधित किया है और उसका ओज व बल के सहस्र विवेचन किया है। यथा:-
तेजोऽप्योभ्रयं क्रमशः पञ्चमानानां धातूनाम भिनिर्वृत्तामंत- रस्थं स्नेहजातं वसाल्यं क्षीणां विशेषतो भवति। तेन मार्दव सौकुमार्यं श्रुद्धरपोभतोत्साहदृष्टिस्थितिपात्तिकीतिद्वितीयो भवति। (सु. सू. अ. १५)
अर्थात् तेज भी क्रमशः परिपाचित होनेवाले धातुओं से निकलनेवाला 'वसा'ल्य स्नेह समुदाय है। यह अग्नि-गुणात्मक होकर स्त्रियों में विशेष (विशिष्ट प्रकार का) रहता है। इस से तनुमार्दव, सुकुमारपन, रोम में मृदुता व अल्पता, उत्साह, दृष्टिस्थिति, पाचन, कांति इ. रहते हैं।
शरीरगत स्नेहजात को पाश्चात्य Fats अथवा Lipoids कहते हैं। इसी का एक उत्तम प्रकार Lecithin है। यह रक्त के श्वेत कणों में, अंडे में और भिन्न २ शरीररसों में विशेषतः अणुअवयवों के जीवनरस में रहता है। आयुर्वेदांतर्गत उक्त वसाल्य तेज भी इस से अतिरिक्त वस्तु नहीं है। नव्य-विज्ञान-दृष्ट्या भी यह अग्निगुणात्मक है। क्योंकि प्राणवायु, के संबंध से इसका व्यवहन होना और उससे ऊष्मा या ताप की वृद्धि होना विज्ञान सम्मत है। स्त्रियों में अर्थात् स्त्रियों के 'फल' में यह विशेष प्रकार का होता है। गर्भांकुर में
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आयुर्वेद-दर्शन
परओज का जितना महत्त्व है उतना ही फलगत तेज का है । यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि शुक्रमलसंज्ञक ओज, जिस तरह पुरुष के शुक्र संबंधी अवयवों से अंतःस्रुत होता है उसी तरह स्त्रियों के फल संबंधी अवयवों ( अंतःफल Ovary अथवा फलकोष Graafian follicles ) से भी एक प्रकार के स्निग्ध द्रव्य का अंतःस्रुत होना संभवनीय माना जाता है । दृष्टि-स्थिति-विधायक तेज, तेजोजल [ इसका 'तेजोजलाश्रितवाहाम्' सु. अ. उ. १ इस तरह उल्लेख है । इसको पाश्चात्य Aqueous Humours कहते हैं ] में रहता है । दीप्तिकांतिकर तेज, मांसधरात्त्वक के केश-गृहों के नीचे वाले पिंडों में रहता है ।
इस तेज के भी व्यापद् विस्मसन-क्षयसंज्ञक विकारों का अलग विवेचन उपलब्ध होता है ।
धातु-प्रसाद को पहिले वर्गीकरण में पंचेंद्रियों का द्रव्य कहा गया है और उसके अनेक होने का भी स्वीकार किया गया है । वर्तमान समय के वैज्ञानिकों को इसके श्वेत और धूसर दो प्रकार उपलब्ध हुए हैं । इंद्रियव्यापकस्पर्श-नेंद्रिय अथवा नाडीसंस्था Nervous system इन्हीं की बनी हुई है । पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय, अर्तीन्द्रिय, बुद्धीन्द्रिय इनकी रचना इन्हीं द्रव्यों की है । इस तरह यह धातुप्रसाद, ज्ञान
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व चेष्टा दोनों का वाहक है। पहिले वर्गीकरण में इसका उल्लेख शारीर प्रसादधातु में किया है।
यह मानी हुई बात है कि ओज, ऊष्मा [ तेज ] और धातुप्रसाद इनके विषय का इतना ज्ञान बहुत समय के अन्वेषण का फल है। अतः पहिले वर्गीकरण वालों को इन के विषय में कितना ज्ञान था यह तो तर्क से ही जानना उचित है। किंतु यह तो स्पष्ट ही है कि वे इनको जानते थे और इनको वातपित्तश्लेष्माओं से अलग रखते थे। पर जो संप्रदाय इनका वात्पित्तश्लेष्माओं में समन्वय करना चाहते थे और इनकी सिर्फ कृपित अवस्था को ही 'मल' वर्ग में रखना चाहते थे उनके विधानोंपर अब विचार करना चाहिये।
ओज तेज ऊष्माओं का श्लेष्मपित्तवातों में समन्वय
षड् रसवादी, मधुरप्रपाकजन्य और रसविकृतिरूप उदक को पिच्छिल कहते ही थे। सचेतन द्रव्यों को गुर्वादि संज्ञाओं से संबोधित करनेवाले संप्रदायों की दृष्टि में यह पैच्छिल्य एक सचेतन द्रव्य प्रतीत हुआ। इसका वे समस्त शरीर में विविधरूप में अनुभव करते थे। और इसीके द्वारा अवयवों का जुड़े हुए या लिपटे हुए रहना प्रमाणित करते थे। क्योंकि प्रत्येक संधि में इसका किसी न किसी रूप में अस्तित्व प्रतीत होगा था। और इसकी
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आयुर्वेद-दर्शन
विकृत अवस्था में संधि शैथिल्य का होना भी पाया गया था। इनकी दृष्टि इस द्रव्य के श्लेषण धर्म पर अधिक थी। इस श्लेषणधर्म को ये 'बल' कहते थे और उनको इस बल का ओजगत बल के साथ अभिन्नत्व प्रतीत हो गया था। परिणाम यह हुआ कि वे इस द्रव्य में और ओज में भी अभिन्नत्व प्रस्थापित करने लगे। जैसा कि:—
प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते ।
स चैवोजः स्मृतः काये सचपाप्मोप दिश्यते ॥
( सु. सू. अ. १७ )
इस पर से व्यक्त होता है। इसमें प्रकृत अवस्थापन्न पिच्छिल-गुण श्लेष्मा को बलोत्पादक (अथवा बल) और उसकी विकृतावस्था को मल (अथवा मलवर्गीय) कहा गया है। सिवाय श्लेष्मा को ओज कहकर यह व्यक्त किया है कि ओज, श्लेष्मा का ही प्रकार है। सारांश पहिले वर्गीकरण के समय जिस ओज को श्लेष्मा से भिन्न माना जाता था उसका तदुत्तर काल में श्लेष्म शब्द में ही समावेश किया जाने लगा। अब जब कि ओज का घटक श्लेष्मा ही सिद्ध हुआ तब ओजगत बल को भी श्लेष्मा का धर्म मानना तर्कसंगत था। किंतु इस बल के विषय में हम आगे चलकर देखेंगे कि तदुत्तर काल में इस बल को वायु का प्रकार कहने लग गये थे।
बायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त
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वर्तमान वैज्ञानिकों के मत से 'मुट्रुश्लेष्म' Mucin और कफकल्प Mucoids ओज के प्रकार माने जाते हैं। तदनुसार 'अणुश्लेष्म' Inter Cellular material 'कल्ल-श्लेष्म,' Jelly Like Tissue (जिसको कि आयुर्वेद में भी 'खेटभूतः' च. शा. अ. ४ अर्थात् श्लेष्मा कहा गया है, ) 'धातु श्लेष्म,' Areolar Tissus 'संधिश्लेष्म' Synovia आदि पदार्थों को ओज के प्रकार कहते हैं। किंतु उक्त आयुर्वेदिक संप्रदायों की दृष्टि में श्लेष्मा ही मूल-भूत 'गुण' है और उसीके प्रकार कफकल्प और ओजस् द्रव्य हैं।
ऊष्मा अथवा तेज संज्ञक वसाख्य द्रव्य का भी 'पित्त' शब्द में अंतर्भाव किया गया। जैसा कि:—
पित्तादेवोष्मणः पक्तिर्नराणासुपजायते।
तच्च पित्तं प्रकुपितं विकारान्कुस्तेवहन् ॥
(च. सू. अ. १७)
इस पर से व्यक्त होता है। यहां प्रकरणानुरोध से 'पित्तादेवोष्मणः' का अर्थ 'पित्तसंज्ञकवसाख्यद्रव्य' है। क्योंकि पहिले श्लोक में जिस कदर ओज संज्ञक सचेतन द्रव्य को श्लेष्मा में समन्वित करने का यत्न किया गया है उसी तरह इस श्लोक में वसाख्य सचेतन द्रव्य को पित्त में समन्वित करने
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आयुर्वेद-दर्शन
का यत्न हुआ है। पहिले वर्गीकरण में इस तेजसंज्ञक वसा को ही ‘अंतराग्नि से संयुक्त होनेवाला ऊष्मा’ कहा गया। और उसको अम्लप्रपाकजन्य पित्त से अलग रक्खा। किंतु तदुत्तर काल में ऐसा कि उक्त श्लोक पर से विदित होता है; पित्त शब्द को अधिक व्यापक बनाया गया और उसमें ऊष्मा या तेज संज्ञक वसा का भी समन्वय किया गया।
इस वसाख्य पित्त का प्राणवायु के संबंध से प्रवचन होकर ताप की वृद्धि होना विज्ञानसम्मत है। संभव है कि यह बात भी ऋषियों के ध्यान में आ चुकी हो और तदनुसार वे ऊष्मा शब्द से ‘ताप’ को संबोधित कर के उसका पित्त शब्द में ही अंतर्भाव करने लगे हों। क्योंकि ‘पित्तादेवोष्मणः’ का उक्तानार्थ ‘पित्तसंज्ञक ताप’ होता है और वह भी अभिप्रेत है।
शरीरगत ऊष्मा चाहे तेजसंज्ञक वसा हो अथवा ताप हो पहिले वर्गीकरण के अनुसार अन्न में (यहां मूल में ‘यथास्वम्’ इतना ही कहा है। प्रत्येक संप्रदाय इसका अर्थ अपने २ वर्गीकरण के अनुसार कर सकता है। उदाहरणार्थ षड्दरसवादी अन्न को षडास्वादों में विभक्त करते थे तदनुसार अन्नगत ऊष्मा षड्विध होगा किंतु कुछ संप्रदाय अन्न का पृथिव्यादि धातुपंचक या भतपंचक में विश्लेषण करते थे तदनुसार ऊष्मा भी भौम-आप्य इत्यादि प्रकारों से पंचविध होगा।)