बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः १०९
अनु०--मूत्र, मल, रक्त, रेतस् आदि से दूषित होने पर इन चमसों या यज्ञ पात्रों का त्याग कर देना चाहिए ॥ ३२ ॥
उपहतानामित्यध्याहारः। प्रभृतीत्यनेन श्लेष्मादिसङ्ग्रहः। ननु ग्रहचमसानामध्येवंभूतानां जुह्वादिबदुत्सर्गे प्राप्ते किमर्थं प्रयत्नः ? उच्यते—'यथाहि-सोमसंयोगाच्चमसो मध्ये उच्यते' इति दृष्टान्तबलात्। ग्रहचमसानां मूत्रादिसंसर्गेऽपि सोमसंयोग एव शुद्धिकारणमित्याशङ्कानिराकरणार्थो यत्नः ॥ ३२ ॥
प्रथमप्रश्ने चतुर्दशः खण्डः
मृन्मयानां पात्राणाम् ॥
मृन्मयानां पात्राणामुच्छिष्टसमन्वारब्धानामवकूलनम् ॥ १ ॥
अनु०—अपवित्र व्यक्तियों के स्पर्श से अशुद्ध हुए, मिट्टी के पात्रों को कुश की अग्नि में दिखाना चाहिए ॥ १ ॥
आज्यस्थाल्यादीनामुच्छिष्टसमन्वारब्धानां अवकूलनं कुशाग्निना स्पर्शः ॥ १ ॥
उच्छिष्टलेपोपहतानां पुनर्द्दहनम् ॥ २ ॥
मूत्रपुरीषलोहितरेतःप्रभृत्युपहतानामुत्सर्गः ॥ ३ ॥
अनु०—उच्छिष्ट के लेप से युक्त पात्रों को पुनः जलाना चाहिए ॥ २ ॥
अनु०—मूत्र, पुरीष, रक्त, रेतस् आदि से दूषित हुए मिट्टी के पात्रों को फेंक दे ॥ ३ ॥
अतिरोहितमेव ॥ २-३ ॥
तैजसानां पात्राणां पूर्ववत्परिमृष्टानां प्रक्षालनम् ॥ ४ ॥
परिमार्जनद्रव्याणि गोशकृन्मृद्भस्मेति ॥ ५ ॥
अनु०—धातु के बने पात्रों के अपवित्र व्यक्तियों द्वारा छुए जाने पर रगड़ कर धोये ॥ ४ ॥
अनु०—उसको रगड़ने में प्रयुक्त की जाने वाली वस्तुएँ हैं : गाय का गोबर, मिट्टी और भस्म आदि ॥ ५ ॥
तैजसानां हिरण्मयादीनां उच्छिष्टसमन्वारब्धानां गोशकृन्मृद्भस्मभिः परिमृज्य प्रक्षालनम् ॥ ४-५ ॥
मूत्रपुरीषलोहितरेतःप्रभृत्युपहतानां पुनः करणम् ॥ ६ ॥